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Covid-19 : दिसंबर तक वैक्सीन का दावा राजनीतिक स्टंट के सिवा कुछ भी नहीं
Mon, 24 Aug 2020 10:07 PM IST
गौरव पाण्डेय
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Mon, 24 Aug 2020 10:07 PM IST
सार
- स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने दिसंबर तक वैक्सीन आ जाने की संभावना व्यक्त की है
- आईआईटी की पूर्व छात्रों की काउंसिल ने कहा वैक्सीन की प्रतिस्पर्धा ठीक नहीं
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : पिक्साबे
विस्तार
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने दिसंबर 2020 तक कोविड-19 वैक्सीन आ जाने की संभावना व्यक्त की है। जबकि आईआईटी एलुमिनाई काउंसिल के अध्यक्ष रवि शर्मा ने इसे लोगों की जिंदगी के साथ बड़ा खिलवाड़ बताया है। आईआईटी एलुमिनाई काउंसिल ने कोविड-19 वैक्सीन तैयार करने की प्रतिस्पर्धा से भी अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। रवि शर्मा का कहना है कि कोई भी वैक्सीन बिना एक परीक्षण श्रृंखला और गहन अध्ययन के नहीं लाई जानी चाहिए। ऐसा किया जाना लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ होगा।
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राजनीतिक स्टंट के सिवा कुछ भी नहीं
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के चिकित्सक डॉ. आनंद कृष्णन ने रवि शर्मा से इत्तेफाक रखते हुए कहा कि साल के अंत तक कोविड-19 की वैक्सीन विकसित करने का दावा राजनीतिक स्टंट के सिवा कुछ भी नहीं है। डॉ. कृष्णन का कहना है कि राजनेता इस तरह के बयान देते रहते हैं। अभी देश में जितनी भी वैक्सीन का काम चल रहा है, एक-दो को छोड़कर कोई भी फेज-1 और फेज-2 को पार नहीं कर पाई है।
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डॉ. कृष्णन का कहना है कि वैक्सीन को विकसित करने में अच्छा खासा समय लगता है। उसके प्रभाव और दुष्प्रभाव का अध्ययन बहुत आवश्यक है। यह कई चरण के व्यापक परीक्षण से ही संभव हो सकता है। उन्होंने बताया कि वैक्सीन का असर तो महीने भर में पता चल जाता है। शरीर में एंटीबॉडी विकसित होने लगती है। दो महीने में वैक्सीन के असर दिखाई देने लगता है, लेकिन इसके दुष्प्रभाव सामने आने में कम से कम छह महीने लग जाते हैं।
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वैक्सीन का मतलब अरबों का कारोबार है
डॉ. कृष्णन कहते हैं कि कोविड-19 की वैक्सीन का मतलब है कि अरबों रुपये का कारोबार। इसलिए होड़ मची हुई है। रूस ने तो अपनी वैक्सीन को लॉन्च भी कर दिया है। रवि शर्मा भी इसकी पुष्टि करते हैं। रवि शर्मा का कहना है कि अकेले भारत में ही करीब 30 करोड़ लोगों को वैक्सीन की आवश्यकता होगी।
वह कहते हैं कोविड-19 संक्रमण के इलाज के लिए मेरे विचार में अभी सरकार को प्लाज्मा थेरेपी व अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अधिकतम तीन करोड़ लोगों को ही ऐसे इलाज के जरूरत होगी। केंद्र सरकार को चाहिए उसे देश को वैक्सीन की होड़ का हिस्सा बनने से बचाना चाहिए।
'समझ में नहीं आता कि इतनी जल्दी क्यों है?'
आईसीएमआर के एक वैज्ञानिक ने कहा कि वह इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोलना चाहते। उन्हें पता है कि वैक्सीन विकसित करने के नाम पर बहुत कुछ ठीक नहीं हो रहा है। एम्स के अन्य चिकित्सक ने कहा कि उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि कोविड-19 की वैक्सीन को लेकर इतनी जल्दबाजी क्यों मची हुई है। इस तरह से खोखला दावा क्यों किया जा रहा है।
देश के एक जाने-माने चिकित्सक का कहना है कि वैक्सीन विकसित करने के मानक से जैसे कोई लेना-देना ही नहीं है। डॉ. कृष्णन का कहना है कि लोग वैक्सीन का दावा भले कर रहे हैं, लेकिन इसमें से कौन सी वैक्सीन सफल हो पाएगी, कहा नहीं जा सकता। किस वैक्सीन का कितना दुष्प्रभाव होगा, अभी यह भी नहीं कहा जा सकता। मेरे विचार में यहां काफी संवेदनशीलता की जरूरत है।
आईआईटी एलुमिनाई काउंसिल ने खड़े किए हाथ
आईआईटी एलुमिनाई काउंसिल ने वैक्सीन को विकसित करने से अपने हाथ खड़े कर लिए हैं। इस काउंसिल में रवि शर्मा के अलावा आईआईटी खडगपुर के केमिकल इंजीनियर अशोक सिंह, फोर्टिस हेल्थ केयर के पूर्व चेयरमैन और मालार अस्पताल के वर्तमान चेयरमैन दलजीत सिंह समेत देश भर के करीब 25 हजार आईआईटियन सदस्य हैं। आईआईटी एलुमिनाई काउंसिल के विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 की वैक्सीन विकसित करने के लिए फोल्डेड प्रोटीन सिमुलेशन, एंटीबॉडी जिनोम लाइब्रेरी क्रिएशन और एंटीबॉडी के लक्षणों की व्यापक पहचान जरूरी होगी। यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं है।
28 साल में नहीं आ पाई एचआईवी की वैक्सीन
आईआईटी एलुमिनाई काउंसिल का कहना है कि 28 साल से अधिक हो गए हैं। 100 अरब डालर से अधिक के खर्च के बाद भी अभी तक एचआईवी एड्स की वैक्सीन विकसित नहीं हो पाई है। रवि शर्मा का कहना है कि एक वैक्सीन को विकसित करने के लिए कई चरण होते हैं। इसके क्लीनिकल ट्रायल से लेकर अन्य में ही कई साल लग जाते हैं। इसके लिए बड़ी संख्या में पहले जानवर पर फिर, संक्रमितों पर परीक्षण किया जाता है। वैक्सीन के दुष्प्रभाव का अध्ययन किया जाता है।
शर्मा के अनुसार दुष्प्रभाव सामने आने में वैक्सीन लगाने के छह महीने से लेकर दो तीन साल तक लग जाते हैं। आईआईटी एलुमिनाई काउंसिल के अध्यक्ष का कहना है कि अभी भारत में कोविड-19 की वैक्सीन को विकसित करने के लिए न तो पर्याप्त वैज्ञानिक डाटा उपलब्ध है और न ही संक्रमितों पर व्यापक शोध हो पाया है। क्लिनिकल अध्ययन की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हो सकी है। ऐसे में वैक्सीन के विकास का दावा करना गाड़ी के पीछे घोड़ा बांधना या दिन में तारे दिखाने जैसा है।