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CJI: सेवानिवृत्ति से पहले बोले सीजेआई चंद्रचूड़- आत्म-चिंतन अहम; जस्टिस खन्ना बोले- न्याय सुलभ बनाने का प्रयास
Tue, 05 Nov 2024 09:20 PM IST
बशु जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: बशु जैन
Updated Tue, 05 Nov 2024 09:20 PM IST
सार
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट की तीन पुस्तक 'राष्ट्र के लिए न्याय: भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 75 वर्षों पर चिंतन', 'भारत में कारागार: कारागार नियमावली का मानचित्रण और सुधार एवं भीड़भाड़ कम करने के उपाय' और 'विधि विद्यालयों के माध्यम से कानूनी सहायता: भारत में कानूनी सहायता प्रकोष्ठों की कार्यप्रणाली पर एक रिपोर्ट' का विमोचन किया।
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सुप्रीम कोर्ट की तीन पुस्तकों का विमोचन करतीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू।
- फोटो : ANI
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विस्तार
राष्ट्रपति भवन में मंगलवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने तीन पुस्तकों का विमोचन किया। इस दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी भी संस्थान की बेहतर के लिए आत्मचिंतन अहम है। सुप्रीम कोर्ट की तीन पुस्तकों का महत्व भी कुछ ऐसा है। इसे कम नहीं किया जा सकता। इसके अलावा मनोनीत न्यायाधीश संजीव खन्ना ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ विद्वान व्यक्ति हैं। उन्होंने न्याय को सुलभ बनाने का प्रयास किया है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट की तीन पुस्तक 'राष्ट्र के लिए न्याय: भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 75 वर्षों पर चिंतन', 'भारत में कारागार: कारागार नियमावली का मानचित्रण और सुधार एवं भीड़भाड़ कम करने के उपाय' और 'विधि विद्यालयों के माध्यम से कानूनी सहायता: भारत में कानूनी सहायता प्रकोष्ठों की कार्यप्रणाली पर एक रिपोर्ट' का विमोचन किया।
सुप्रीम कोर्ट कर रहा बेहतर काम: राष्ट्रपति
विमोचन समारोह के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि मैं पुस्तकों के प्रकाशन में योगदान देने वाले सभी लोगों को बधाई देती हूं। मुझे खुशी है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी स्थापना के 75वें वर्ष में कई बेहतर काम कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट में लोक अदालत का आयोजन, न्यायिक अधिकारियों का सम्मेलन इसके दो उदाहरण हैं।
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सर्वोच्च न्यायालय और कानून व्यवस्था के लिए आत्मचिंतन जरूरी: सीजेआई
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि आज जिन तीन पुस्तकों का विमोचन हुआ है, उसमें से एक न्यायालय की स्थापना के बाद से उसके न्यायशास्त्र का विश्लेषण करता है। जबकि शेष दो पुस्तकें विश्वविद्यालयों में कानूनी सहायता प्रकोष्ठ के कामकाज और जेलों की स्थिति को बता रहे हैं। तीनों ही पुस्तकें सर्वोच्च न्यायालय और कानून व्यवस्था दोनों को आत्म-चिंतन का अवसर दे रही हैं। किसी भी संस्थान में उत्कृष्टता की खोज के लिए आत्म-चिंतन की जरूरत होती है। जमीनी हकीकत जाने बिना कानूनों और नीतियों का सीमित प्रभाव होगा और इससे समस्याएं और भी गहरी हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने कैदियों की दुर्दशा पर प्रकाश डाला था। उनके भाषण ने सर्वोच्च न्यायालय में चर्चा को बढ़ावा दिया।
जस्टिस खन्ना बोले- न्याय तक पहुंच सुलभ हुई
मनोनीत मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने कहा कि जिन मुद्दों पर पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है वह राष्ट्रपति की लगातार वकालत, जमीनी हकीकत की गहन समझ और सांवधानिक मूल्यों के प्रति समर्पण से उपजी है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने न्याय तक पहुंच को सुलभ बनाया। उन्होंने कहा कि मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ न केवल एक विद्वान न्यायविद हैं, बल्कि तकनीकी और डाटा सुधारों को भी समझते हैं। हालांकि तीनों पुस्तकें न्यायालय के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं। मगर मुद्दों की वर्तमान स्थिति को बताते हुए सुधार का आह्वान करती है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका आलोचनात्मक विश्लेषण को स्वीकार करती है क्योंकि यह विकास और सुधार के लिए जरूरी है।
जस्टिस खन्ना ने कहा कि पहली बार अपराध करने वाले को किसी एक कृत्य से परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए। उसके सुधार की शुरुआत न्याय तक पहुंच से होनी चाहिए और कानूनी सहायता उसका अविभाज्य अधिकार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारी जेलों में लगभग 5.20 लाख कैदी हैं, जो अत्यधिक भीड़भाड़ से पीड़ित हैं। जिससे बुनियादी सम्मान और पुनर्वास प्रभावित हो रहा है। पूरे भारत में 91 खुली जेलों के साथ एक प्रगतिशील दृष्टिकोण आकार ले रहा है।
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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट की तीन पुस्तक 'राष्ट्र के लिए न्याय: भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 75 वर्षों पर चिंतन', 'भारत में कारागार: कारागार नियमावली का मानचित्रण और सुधार एवं भीड़भाड़ कम करने के उपाय' और 'विधि विद्यालयों के माध्यम से कानूनी सहायता: भारत में कानूनी सहायता प्रकोष्ठों की कार्यप्रणाली पर एक रिपोर्ट' का विमोचन किया।
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सुप्रीम कोर्ट कर रहा बेहतर काम: राष्ट्रपति
विमोचन समारोह के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि मैं पुस्तकों के प्रकाशन में योगदान देने वाले सभी लोगों को बधाई देती हूं। मुझे खुशी है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी स्थापना के 75वें वर्ष में कई बेहतर काम कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट में लोक अदालत का आयोजन, न्यायिक अधिकारियों का सम्मेलन इसके दो उदाहरण हैं।
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सर्वोच्च न्यायालय और कानून व्यवस्था के लिए आत्मचिंतन जरूरी: सीजेआई
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि आज जिन तीन पुस्तकों का विमोचन हुआ है, उसमें से एक न्यायालय की स्थापना के बाद से उसके न्यायशास्त्र का विश्लेषण करता है। जबकि शेष दो पुस्तकें विश्वविद्यालयों में कानूनी सहायता प्रकोष्ठ के कामकाज और जेलों की स्थिति को बता रहे हैं। तीनों ही पुस्तकें सर्वोच्च न्यायालय और कानून व्यवस्था दोनों को आत्म-चिंतन का अवसर दे रही हैं। किसी भी संस्थान में उत्कृष्टता की खोज के लिए आत्म-चिंतन की जरूरत होती है। जमीनी हकीकत जाने बिना कानूनों और नीतियों का सीमित प्रभाव होगा और इससे समस्याएं और भी गहरी हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने कैदियों की दुर्दशा पर प्रकाश डाला था। उनके भाषण ने सर्वोच्च न्यायालय में चर्चा को बढ़ावा दिया।
जस्टिस खन्ना बोले- न्याय तक पहुंच सुलभ हुई
मनोनीत मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने कहा कि जिन मुद्दों पर पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है वह राष्ट्रपति की लगातार वकालत, जमीनी हकीकत की गहन समझ और सांवधानिक मूल्यों के प्रति समर्पण से उपजी है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने न्याय तक पहुंच को सुलभ बनाया। उन्होंने कहा कि मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ न केवल एक विद्वान न्यायविद हैं, बल्कि तकनीकी और डाटा सुधारों को भी समझते हैं। हालांकि तीनों पुस्तकें न्यायालय के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं। मगर मुद्दों की वर्तमान स्थिति को बताते हुए सुधार का आह्वान करती है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका आलोचनात्मक विश्लेषण को स्वीकार करती है क्योंकि यह विकास और सुधार के लिए जरूरी है।
जस्टिस खन्ना ने कहा कि पहली बार अपराध करने वाले को किसी एक कृत्य से परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए। उसके सुधार की शुरुआत न्याय तक पहुंच से होनी चाहिए और कानूनी सहायता उसका अविभाज्य अधिकार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारी जेलों में लगभग 5.20 लाख कैदी हैं, जो अत्यधिक भीड़भाड़ से पीड़ित हैं। जिससे बुनियादी सम्मान और पुनर्वास प्रभावित हो रहा है। पूरे भारत में 91 खुली जेलों के साथ एक प्रगतिशील दृष्टिकोण आकार ले रहा है।