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नागरिकता संशोधन कानून खामोशी के साथ बढ़ा रहा है बेचैनी, विदेश में सरकार की छवि पर पड़ रहा असर!

Thu, 19 Dec 2019 08:29 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 19 Dec 2019 08:29 PM IST
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citizen amendment act silently increasing the restlessness, impacting on government image in abroad
Protest against CAA - फोटो : PTI
नागरिकता संशोधन अधिनियम ने विदेश मंत्रालय से लेकर गृह मंत्रालय और केन्द्र सरकार तक की चिंता बढ़ा दी है। अधिकारियों का क्रीमी वर्ग भी इसे लेकर खामोशी के साथ बेचैन है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि कई देशों को इसे लेकर सफाई देनी पड़ रही है। हालांकि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार का कहना है कि यह भारत का आंतरिक मामला है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश इसे समझ रहे हैं और भारत के रुख से सहमत हैं।
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लेकिन मंत्रालय के अधिकारी इससे इतर चुगली कर रहे हैं। उनका कहना है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के वजह से दुनिया के देशों में भारत सरकार की मुसलमान विरोधी धारणा बढ़ती चली जा रही है। कई देश इसे मानवाधिकारों से जोड़कर देख रहे हैं और सवाल पूछ रहे हैं। विदेशी मीडिया का रुख भी लगातार आक्रामक बना हुआ है।

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गृह मंत्रालय में भी तेज हुई सरगर्मी

गुरुवार को देश के लगभग एक दर्जन स्थानों से नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर विरोध प्रदर्शन की सूचना है। यह विरोध प्रदर्शन लगातार फैल रहा है और इसने केंद्रीय गृह मंत्रालय की चिंता बढ़ा दी है। मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए एहतियात के तौर पर लगातार राज्यों को एडवाइजरी जारी की जा रही है। गुरुवार को दिल्ली, पटना, लखनऊ समेत तमाम शहरों में प्रदर्शन का स्तर काफी तीव्र था। उत्तर प्रदेश में खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को आगे आना पड़ा।

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क्रीमी वर्ग की खामोशी के साथ बढ़ रही है बेचैनी

विदेश मंत्रालय को कवर करने वाली 54-55 साल की महिला पत्रकार हैं। अच्छी जर्नलिस्ट हैं, लेकिन उन्हें भी नागरिकता संशोधन अधिनियम के पीछे केंद्र सरकार की मंशा सही नहीं लग रही है। नाम न छापने की शर्त पर सूत्र का कहना है कि यह केन्द्र सरकार वोटों के ध्रुवीकरण के इरादे से कर रही है। इससे मुस्लिम समाज में लगातार तेजी से डर बैठ रहा है। कुछ इसी तरह की प्रतिक्रिया केंद्र सरकार के एक निदेशक स्तर के मुसलमान अधिकारी की है।


केंद्र सरकार के ही एक अन्य हिन्दू संयुक्त सचिव का कहना है कि वह अभी नागरिकता संशोधन अधिनियम की जरूरत नहीं समझ पा रहे हैं। महिला पत्रकार का कहना है कि वह पिछले कुछ दिन से लगातार कई स्तर पर लोगों के साथ संवाद कर रही हैं, लेकिन लोग डरे, सहमे ज्यादा हैं। सूत्रों का कहना है कि यह अफवाह भी हो सकती है, लेकिन लोग इसे नागरिक पंजीकरण रजिस्टर से जोड़कर देख रहे हैं।

लोगों में है इस बात का डर

नई दिल्ली के जंतर-मंतर, मंडी हाऊस से लेकर जामा मस्जिद, दिल्ली गेट तक लोंगों के डर की लाइन बस एक है। लोग नागरिकता संशोधन कानून से नहीं डर रही हैं। उनका कहना है कि भारत सरकार जिसे चाहे नागरिकता देने का प्रावधान दे दे। यह नागरिकता देने वाला कानून है। यह किसी की नागरिकता नहीं लेगा। इससे क्या फर्क पड़ता है? लेकिन इसके पीछे केंद्र सरकार की मंशा ठीक नहीं है। लोगों का कहना है कि केंद्र सरकार नागरिकता संशोधन कानून की सही मंशा लेकर नहीं आई है।

यह कानून अफगानिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान के हिंदुओं और गैर मुस्लिमों को नागरिकता दे देगा। इसके बाद जब देश भर में एनआरसी लागू होगी, तो मुसलमानों के लिए परेशानी खड़ी की जाएगी। विदेश मंत्रालय की महिला पत्रकार का कहना है कि असम में एनआरसी के पूरा होने के बाद उससे सबक लेकर केंद्र सरकार पहले नागरिकता संशोधन अधिनियम लेकर आई। ताकि वह केवल और केवल एक खास वर्ग को डरावना संदेश दे सके।

एक तीर से केंद्र साध रहा कई निशाने

कांग्रेस पार्टी की तेज तर्रार नेता सुष्मिता देव ने कहा कि सब कुछ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष तथा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। तृणमूल कांग्रेस के नेता डीरेक ओ ब्रायन भी  चिंतित हैं। कांग्रेस पार्टी के एक पूर्व महासचिव का कहना है कि जब से नागरिकता संशोधन कानून की चर्चा शुरू हुई है, कोई फिलहाल जम्मू-कश्मीर का नाम नहीं ले रहा है। देश के ज्वलंत मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। अर्थव्यवस्था की खराब हालत, बेरोजगारी की दशा, किसानों की समस्या, शिक्षा में सुधार जैसे तमाम ज्वलंत मुद्दे गायब हो गए हैं।



सूत्रों का कहना है कि इस कानून को लाने की टाइमिंग तो देखिए। यह कानून जम्मू-कश्मीर में वैधानिक स्थिति में बदलाव के निर्णय के 100 दिन बाद आया है। केंद्र सरकार के इस कदम ने जहां पूरे देश मेंं एक अलग राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक बहस छेड़ दी है, वहीं अगले महीनों में प्रस्तावित दिल्ली, बिहार और 2021 में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए नया पासा भी फेंक दिया है। सूत्र का कहना है कि यह राष्ट्रवाद की एक नई परिभाषा खड़ी करने की कोशिश है और यह प्रयोग बहुत ही संवेदनशील है।

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