तालिबान राज: अफगानिस्तान में अपने पंख फैलाने को बेचैन चीन, मध्य एशिया पर ड्रैगन की नजर

एजेंसी, नई दिल्ली। Published by: Jeet Kumar Updated Sun, 05 Sep 2021 06:15 AM IST

सार

  • रिपोर्ट में दावा, बीजिंग को तालिबान के आने से क्षेत्र में दबदबा बढ़ाने का मौका मिला
  • तालिबान की मदद से मध्य एशिया में अपना प्रभुत्व जमाने की जुगत में चीन
चीन मिलाएगा तालिबान से हाथ...
चीन मिलाएगा तालिबान से हाथ... - फोटो : पीटीआई
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विस्तार

अमेरिका की सैन्य वापसी से अफगानिस्तान में पैदा हुए शून्य को भरने के लिए चीन आतुर नजर आ रहा है। इसके पीछे उसका मकसद मध्य एशिया में अपना प्रभुत्व जमाना है। इसके लिए चीन चाहता है कि अफगानिस्तान का पड़ोसी देश ईरान भी तालिबान को लेकर उसके साथ खड़ा हो। चीन को उम्मीद है कि तालिबान जल्द ही सरकार गठन करेगा और अफगान धरती का इस्तेमाल आतंक के लिए नहीं होने देगा। इसके अलावा अफगानिस्तान को लेकर अपनी नीति पर पाकिस्तान और रूस से भी बात कर रहा है।
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बीजिंग ने पाकिस्तान और रूस के साथ काबुल में अपना दूतावास खुला रखा है और वह तालिबान द्वारा सरकार के गठन का इंतजार कर रहा है, ताकि वह नई सरकार का समर्थन कर सके। हालांकि, अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देशों ने संकेत दिए हैं कि वे तालिबान को मान्यता देने का फैसले में कोई जल्दबाजी नहीं करेंगे।


अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण वेबसाइट इनसाइडओवर पर जारी एक रिपोर्ट में फेडेरिको गिलिआनी ने लिखा, बीजिंग लंबे समय से मध्य एशिया में अपना दबदबा बढ़ाने की कवायद में जुटा है और रूस के साथ मिलकर वह शंघाई केंद्रीय संगठन (एससीओ) के जरिए क्षेत्रीय समीकरणों को आकार दे रहा है। हालांकि, अमेरिका की मौजूदगी के कारण अफगानिस्तान में वह पांव नहीं जमा पा रहा था।

लेखक का कहना है, वैसे, अमेरिकी सेना की तैनाती के कारण उलटे चीन को ही सुरक्षा और स्थिरता के मोर्चे पर फायदा मिला था, जिसका लाभ उसने आर्थिक रूप से उठाया है। लेकिन अफगानिस्तान में वह अमेरिका और पश्चिमी ताकतों के सामने मुखर नहीं हो सका। अब पश्चिमी सेनाओं के लौटने से चीन को अफगानिस्तान और आसपास प्रभाव बढ़ाने के लिए जरूरी पृष्ठभूमि मिल गई है।

यही वजह है कि काबुल पतन के फौरन बाद तालिबान के साथ दोस्ताना संबंध बनाने की इच्छा जाहिर करने वाले देशों में ड्रैगन शामिल रहा। साथ ही वह अमेरिकी विमान से लोगों के गिरने की तस्वीरों को लेकर शरणार्थियों को निकालने में गड़बड़ी के लिए वाशिंगटन पर निशाना साधने से नहीं चूका।

चीन और रूस की अफगानिस्तान में दस्तक के बीच, जानकार सैन्य वापसी के सामरिक परिणामों का समुचित आकलन करने में चूक को लेकर ट्रंप या बाइडन प्रशासन पर भी सवाल उठा रहे हैं। एजेंसी

चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने उम्मीद जाहिर की है कि अफगानिस्तान में बनने जा रही तालिबानी सरकार मुक्त व समावेशी होगी और खुद को आतंकवाद से दूर रखेगी।

चीन के सरकारी समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक चीन के विदेश मंत्री ने शुक्रवार को ईरान के विदेश मंत्री हुसैन अमीर अब्दोल्लाहैन के साथ अफगानिस्तान के मौजूदा हालात पर चर्चा की।

असल में चीन अफगानिस्तान से अमेरिका के निकलने के बाद अपने जिनजियांग प्रांत में अशांति बढ़ने को लेकर आशंकित है। चीन के विदेश मंत्री ने इस गुट के संबंध में तालिबान के शीर्ष नेताओं में शामिल मुल्ला अब्दुल गनी बरादर को तिआनजिन में हुई बैठक में भी अपनी चिंताओं से वाकिफ कराया था।

चीन का मानना है कि अमेरिका के अफगानिस्तान से निकलने के बाद ईस्ट तुर्केस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआइएम) की गतिविधियों में तेजी आ सकती है, जिससे सीमा पार उसके जिनजियांग प्रांत में अशांति बढ़ सकती है।

ईटीआइएम उइगर मुस्लिमों का समूह है, जो जिननियांग को आजाद कराकर पूर्वी तुर्केस्तान बनाना चाहता है। चीन ने पहले भी तालिबान के साथ हुई बातचीत के दौरान इस गुट के संदर्भ में अपनी चिंताओं को जाहिर करते हुए बताया था कि यह समूह चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा व क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरा है।

इसी मसले पर ईरान के साथ हुई बातचीत में वांग ने कहा कि उन्हें उम्मीद है तालिबान ईटीआइएम सहित सभी आतंकी संगठनों से दूरी बनाकर रखेगा और ऐसे आतंकी संगठनों के खिलाफ लड़ाई में भागीदार बनेगा व उन्हें खत्म करने के लिए सकारात्मक साथी की भूमिका अदा करते हुए तरक्की के लिए जरूरी सुरक्षा, स्थायित्व व सहयोग का माहौल देगा। 

पाकिस्तान ने पड़ोसी देशों के साथ बैठक की
पाकिस्तान ने रविवार को चीन और ईरान सहित अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों के विशेष प्रतिनिधियों और दूतों की एक वर्चुअल बैठक की मेजबानी की। इस दौरान सभी ने सहमति जताई कि युद्धग्रस्त राष्ट्र में सुरक्षा और स्थिरता के लिए शांति महत्वपूर्ण है। विदेश कार्यालय ने एक बयान में कहा कि अफगानिस्तान के लिए पाकिस्तान के विशेष प्रतिनिधि मोहम्मद सादिक की अध्यक्षता में हुई बैठक में चीन, ईरान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।  बैठक के दौरान अफगानिस्तान की ताजा स्थिति पर चर्चा हुई।

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