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थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत को कंप्यूटर हैकरों ने डराया
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
Updated Sat, 07 Apr 2018 08:10 PM IST
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थलसेना अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत
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करीब 10 साल पहले सेना ने अपनी डॉक्टरिन में कंप्यूटर सेंधमारों को काफी खतरनाक बताकर इससे सावधान रहने की सलाह दी थी। शुक्रवार को सेंधमारों का यह डर सेनाध्याक्ष जनरल बिपिन रावत के चेहरे पर साफ दिखा। वह जैसे ही दिल्ली कैंट में सीआईसीटी में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे, उनका पहला सवाल सेना की गोपनीय कंप्यूटर फाइलों की सुरक्षा को लेकर था। सूत्र बताते हैं कि सेनाध्यक्ष को जबतक विशेषज्ञों ने फुल प्रूफ सुरक्षा के बाबत आश्वस्त नहीं कर दिया, तबतक वह आखिरी जानकारी लेते रहे।
यह इसलिए भी मौजूं है कि शुक्रवार को ही रक्षा मंत्रालय की वेबसाइट पर चीनी हैकरों ने सेंधमारी की थी। हालांकि सूत्र बताते हैं कि सेना के तीनों अंगों (थल सेना, नौसेना और वायुसेना) में गोपनीय दस्तावेजों की सुरक्षा के लिए उच्च स्तर की सतर्कता बरती जा रही है।
तीनों सेना मुख्यालयों के सूत्र बताते हैं कि 2007 से कंप्यूटर की गोपनीय फाइलों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सेना ने इसके लिए साइबर विशेषज्ञों की मदद से अभेद्य कार्ययोजना तैयार की है। एक मेजर जनरल स्तर के सूत्र का कहना है कि जबतक कोई सैन्य अफसर अपनी लक्ष्मण रेखा नहीं लांघेगा, हमारी गोपनीय फाइलों तक हैकर नहीं पहुंच सकते।
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क्या कार्यक्रम था कल?
शुक्रवार को सेना के आर्मड डिवीजन ने आईटी क्षेत्र की जानी मानी कंपनी के विशेषज्ञों के सहयोग से एविएशन कोर में एसएपी सिस्टम को ऑपरेशनल बना दिया है। इसी को हरी झंडी दिखाने के लिए बिपिन रावत दिल्ली कैंट गए थे। इस सिस्टम पर सेना के गोला बारूद, सैन्य साजो-सामान, आयुध आदि का डेटा अपलोड हो चुका है। इसमें पुराने सामान, सेना के कबाड़ के सामान से लेकर आने वाले नए सैन्य साजो सामान है।
यहां तक कि सेना का मानव संसाधन विभाग, उपस्थिति आदि सभी को इस प्रणाली से जोड़ा गया है। इस सिस्टम के सेना के इंट्रा कंप्यूटर प्रणाली पर ऑनलाइन होने के बाद सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत से लेकर कोर कमांडर तथा फील्ड कमांडर अपनी सीट से ही प्रॉपर निगरानी रख सकते हैं।
ऐसा होने के बाद जहां पारदर्शिता की स्थिति काफी मजबूत हो जाएगी, वहीं सेना के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान का मूवमेंट, साजो-सामान की आवाजाही, मंजूरी लेने की प्रक्रिया में भी काफी समय की बचत होगी। युद्ध काल के दौरान सेना इस प्रणाली का काफी बेहतर तरीके से प्रयोग करेगी। खास बात यह है कि एसएपी ऑपरेशनल होने के बाद पूरे देश की सेना का यह कोर एक ऑनलाइन प्रणाली का हिस्सा बन गया है।
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यह इसलिए भी मौजूं है कि शुक्रवार को ही रक्षा मंत्रालय की वेबसाइट पर चीनी हैकरों ने सेंधमारी की थी। हालांकि सूत्र बताते हैं कि सेना के तीनों अंगों (थल सेना, नौसेना और वायुसेना) में गोपनीय दस्तावेजों की सुरक्षा के लिए उच्च स्तर की सतर्कता बरती जा रही है।
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तीनों सेना मुख्यालयों के सूत्र बताते हैं कि 2007 से कंप्यूटर की गोपनीय फाइलों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सेना ने इसके लिए साइबर विशेषज्ञों की मदद से अभेद्य कार्ययोजना तैयार की है। एक मेजर जनरल स्तर के सूत्र का कहना है कि जबतक कोई सैन्य अफसर अपनी लक्ष्मण रेखा नहीं लांघेगा, हमारी गोपनीय फाइलों तक हैकर नहीं पहुंच सकते।
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क्या कार्यक्रम था कल?
शुक्रवार को सेना के आर्मड डिवीजन ने आईटी क्षेत्र की जानी मानी कंपनी के विशेषज्ञों के सहयोग से एविएशन कोर में एसएपी सिस्टम को ऑपरेशनल बना दिया है। इसी को हरी झंडी दिखाने के लिए बिपिन रावत दिल्ली कैंट गए थे। इस सिस्टम पर सेना के गोला बारूद, सैन्य साजो-सामान, आयुध आदि का डेटा अपलोड हो चुका है। इसमें पुराने सामान, सेना के कबाड़ के सामान से लेकर आने वाले नए सैन्य साजो सामान है।
यहां तक कि सेना का मानव संसाधन विभाग, उपस्थिति आदि सभी को इस प्रणाली से जोड़ा गया है। इस सिस्टम के सेना के इंट्रा कंप्यूटर प्रणाली पर ऑनलाइन होने के बाद सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत से लेकर कोर कमांडर तथा फील्ड कमांडर अपनी सीट से ही प्रॉपर निगरानी रख सकते हैं।
ऐसा होने के बाद जहां पारदर्शिता की स्थिति काफी मजबूत हो जाएगी, वहीं सेना के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान का मूवमेंट, साजो-सामान की आवाजाही, मंजूरी लेने की प्रक्रिया में भी काफी समय की बचत होगी। युद्ध काल के दौरान सेना इस प्रणाली का काफी बेहतर तरीके से प्रयोग करेगी। खास बात यह है कि एसएपी ऑपरेशनल होने के बाद पूरे देश की सेना का यह कोर एक ऑनलाइन प्रणाली का हिस्सा बन गया है।
फिर क्यों डरे सेनापति
सेना ने यह प्रक्रिया अपनी कार्यप्रणाली में तेजी तथा पारर्शिता लाने के लिए शुरू की है। अभी एविएशन कोर में एसएपी सिस्टम लागू हुआ है। इसमें सेनाध्यक्ष के अलावा सेना के लगभग सभी दिल्ली के टॉप कमांडर मौजूद थे। इसके अगले चरण में ऑर्डिनेंस में एसएपी सिस्टम लागू होना है। इस तरह से सेना में एसएपी सिस्टम के पूरी तरह ऑपरेशनल हो जाने के बाद कंप्यूटर आधारित सूचना, जानकारी, मूवमेंट सेना की लाइफ लाइन बन जाएगी।
फाइल मैनेजमेंट सिस्टम को व्यवस्थित किया जाना है। यह प्रणाली लागू होने के बाद सेना के टॉप कमांडरों को नीचे से फाइल की हार्ड कॉपी मंगाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। सैन्य सूत्र बताते हैं कि तमाम सावधानी के बावजूद हार्ड कॉपी के एक स्थान से दूसरे स्थान पर मूवमेंट के दौरान गोपनीय दस्तावेजों के लीक हो जाने का खतरा रहता है।
बताते हैं ऐसे ऑनलाइन सिस्टम के ऑपरेशनल होने को लेकर सेनाध्यक्ष के माथे पर चिंता की लकीरें थी। ऑपरेशनल करने की औपचारिकता के लिए उन्होंने पहला सवाल इसकी हैकिंग को लेकर ही पूछा। सूत्रों के अनुसार सेनाध्यक्ष जनरल रावत को बताया गया कि यह प्रणाली सेना की इंट्रानेट प्रणाली से जुड़ी है। इसके कंप्यूटर अलग होंगे।
इसके लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेशनल प्रोसीजर तैयार करके सैन्य कर्मियों को जानकारी दे दी गई है। इसलिए जब तक इस इंट्रानेट कंप्यूटर प्रणाली से कोई इंटरनेट कनेक्शन कहीं नहीं जुड़ेगा, तबतक कोई भी हैकर इसमें सेंधमारी नहीं कर सकता। इसलिए इन कंप्यूटर प्रणाली में पेन ड्राइव के इस्तेमाल से लेकर डेटा ट्रांसफर तक सावधानियां बरतनी अनिवार्य होगी।
इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सबसे बड़ा खतरा
सेना मुख्यालय के एक ब्रिगेडियर का कहना है कि इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर की लगातार चुनौती बढ़ रही है। यह चुनौती केवल गोपनीयता को बनाए रखने की ही नहीं है, बल्कि हाथियारों, उपकरणों आदि के संचालन आदि के क्षेत्र में लगातार बढ़ रही है। चीन जैसे कुछ देश लगातार अंतरिक्ष क्षेत्र में अपना दबदबा बनाने, अंतरिक्ष को हथियारों से लैस करने की दिशा में भी काम रहे हैं।
नैनो और फैंटो स्तर की अत्याधुनिक कृत्रिम सेटलाइट के जरिए अपनी क्षमता बढ़ा रहे हैं। सूत्र का कहना है कि हैकर केवल सेना की गोपनीय फाइलों या फिर वित्तीय प्रतिष्ठानों तक ही सेंधमारी में नहीं जुटे हैं, बल्कि वह मॉब को भड़काने, इंटरनेट के प्रयोग से लोगों का ब्रेन वॉश करने समेत खतरनाक योजनाओं को अंजाम दे रहे हैं। आने वाले समय में इस तरह के खतरे लगातार बढ़ने के संकेत हैं।
फाइल मैनेजमेंट सिस्टम को व्यवस्थित किया जाना है। यह प्रणाली लागू होने के बाद सेना के टॉप कमांडरों को नीचे से फाइल की हार्ड कॉपी मंगाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। सैन्य सूत्र बताते हैं कि तमाम सावधानी के बावजूद हार्ड कॉपी के एक स्थान से दूसरे स्थान पर मूवमेंट के दौरान गोपनीय दस्तावेजों के लीक हो जाने का खतरा रहता है।
बताते हैं ऐसे ऑनलाइन सिस्टम के ऑपरेशनल होने को लेकर सेनाध्यक्ष के माथे पर चिंता की लकीरें थी। ऑपरेशनल करने की औपचारिकता के लिए उन्होंने पहला सवाल इसकी हैकिंग को लेकर ही पूछा। सूत्रों के अनुसार सेनाध्यक्ष जनरल रावत को बताया गया कि यह प्रणाली सेना की इंट्रानेट प्रणाली से जुड़ी है। इसके कंप्यूटर अलग होंगे।
इसके लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेशनल प्रोसीजर तैयार करके सैन्य कर्मियों को जानकारी दे दी गई है। इसलिए जब तक इस इंट्रानेट कंप्यूटर प्रणाली से कोई इंटरनेट कनेक्शन कहीं नहीं जुड़ेगा, तबतक कोई भी हैकर इसमें सेंधमारी नहीं कर सकता। इसलिए इन कंप्यूटर प्रणाली में पेन ड्राइव के इस्तेमाल से लेकर डेटा ट्रांसफर तक सावधानियां बरतनी अनिवार्य होगी।
इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सबसे बड़ा खतरा
सेना मुख्यालय के एक ब्रिगेडियर का कहना है कि इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर की लगातार चुनौती बढ़ रही है। यह चुनौती केवल गोपनीयता को बनाए रखने की ही नहीं है, बल्कि हाथियारों, उपकरणों आदि के संचालन आदि के क्षेत्र में लगातार बढ़ रही है। चीन जैसे कुछ देश लगातार अंतरिक्ष क्षेत्र में अपना दबदबा बनाने, अंतरिक्ष को हथियारों से लैस करने की दिशा में भी काम रहे हैं।
नैनो और फैंटो स्तर की अत्याधुनिक कृत्रिम सेटलाइट के जरिए अपनी क्षमता बढ़ा रहे हैं। सूत्र का कहना है कि हैकर केवल सेना की गोपनीय फाइलों या फिर वित्तीय प्रतिष्ठानों तक ही सेंधमारी में नहीं जुटे हैं, बल्कि वह मॉब को भड़काने, इंटरनेट के प्रयोग से लोगों का ब्रेन वॉश करने समेत खतरनाक योजनाओं को अंजाम दे रहे हैं। आने वाले समय में इस तरह के खतरे लगातार बढ़ने के संकेत हैं।