Chhattisgarh: आदिवासी आरक्षण के मुद्दे पर गरमाई सियासत, तमिलनाडु मॉडल अपना सकती है बघेल सरकार
Chhattisgarh: आदिवासी आरक्षण को लेकर कांग्रेस की सरकार भी गंभीर है। आदिवासी समाज के 12 फीसदी आरक्षण कम होने से कई संगठन नाराज हैं। ऐसे में राज्य सरकार ने पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में आरक्षण व्यवस्था की शोध के लिए आदिवासी समाज के प्रमुखों और विधायकों को भेजने की योजना बना रही है...
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2023 में छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों तैयारियों में जुटी हुई है। एक तरफ जहां कांग्रेस अपने काम जनता तक पहुंचा रही है, तो दूसरी तरफ भाजपा सरकार को घेरने की कोई कसर नहीं छोड़ रही। इसी बीच राज्य में आदिवासी आरक्षण को लेकर प्रदेश में सियासत गर्म हो गई है। भाजपा इसे लेकर प्रदेश में एक बड़े आंदोलन की तैयारी कर रही है।
इधर, आदिवासी आरक्षण को लेकर कांग्रेस की सरकार भी गंभीर है। आदिवासी समाज के 12 फीसदी आरक्षण कम होने से कई संगठन नाराज हैं। ऐसे में राज्य सरकार ने पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में आरक्षण व्यवस्था की शोध के लिए आदिवासी समाज के प्रमुखों और विधायकों को भेजने की योजना बना रही है। वहीं, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की बात भी कही है।
दरअसल, बिलासपुर हाईकोर्ट ने 19 सितंबर को राज्य में 58 फीसदी आरक्षण को रद्द कर दिया था। इसके बाद अब राज्य में 2011 की तरह आरक्षण की स्थति बन गई है। एसटी आरक्षण को 32 फीसदी किया गया था, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब राज्य में आरक्षण 12 फीसदी घटकर 20 फीसदी हो गया है। वहीं, ओबीसी 14 फीसदी और एससी का आरक्षण 13 से बढ़कर 16 फीसदी हो गया है। इसी मुद्दे को लेकर छत्तीसगढ़ की सियासत तेज है। प्रदेश में आदिवासी आरक्षण को लेकर भाजपा पूरे प्रदेश में में 8 और 9 नवंबर को जिला मुख्यालयों का घेराव करेगी। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि संभागीय मुख्यालय में भी प्रदर्शन किया जाएगा। बस्तर में 21 और सरगुजा में 28 नवंबर को प्रदर्शन होगा।
भाजपा नेता रामविचार नेताम का कहना है कि कांग्रेस सरकार ने प्रदेश के लोगों को ठगने का काम किया है। भाजपा शासन काल में आदिवासियों को 32 फीसदी आरक्षण दिया गया था। अब छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासियों के साथ षड्यंत्र कर रही है। अब आदिवासियों की लड़ाई भाजपा सड़क पर लेकर जाएगी। आने वाला पूरा समाज कांग्रेस सरकार के खिलाफ मैदान में उतरेगा।
प्रदेश के राजनीतिक जानकारों का कहना है कि प्रदेश के आदिवासी वोटर ही राज्य की सरकार तय करते हैं। प्रदेश की 29 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। जबकि प्रदेश की 11 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां आदिवासी वोटर बड़ी संख्या में हैं। यह निर्णायक भूमिका तय करते हैं। ऐसे में दोनों दल आदिवासियों को साधने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। 2018 में हुए विधानसभा चुनावों में 29 आदिवासी सीटों में से 27 सीटों पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। जबकि भाजपा के खाते में केवल दो सीटें आई थीं। अब भाजपा आदिवासी आरक्षण को मुद्दा बनाकर आदिवासी वोटर्स को अपने पाले में लाने में लगी है।