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बदलाव की दरकार: शाह की चेतावनी भरी सलाह, पर कैसे बदलेगी 'खाकी' व 'खादी' के बीच फंसी पुलिस

जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली  Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Fri, 02 Jul 2021 04:42 PM IST

सार

पीएम नरेंद्र मोदी का मानना है कि पुलिस या सरकारी मशीनरी के रवैए में बदलाव से ही व्यवस्था बदली जा सकती है। यही संदेश गृह मंत्री शाह ने शीर्ष पुलिस अफसरों को दिया है। लेकिन पूर्व पुलिस अफसरों का कहना है कि पुलिस को चेतावनी नहीं, सहयोग चाहिए।
 
अमित शाह
अमित शाह - फोटो : पीटीआई
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विस्तार

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह चाहते हैं कि देश की पुलिस अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के अनुसार खुद को बदल ले। पीएम का विजन है कि व्यवस्था तभी बदली जा सकती है जब उसकी मशीनरी को आज की आवश्यकताओं के अनुसार प्रशिक्षित किया जाए। 

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शाह ने बृहस्पतिवार को भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) की 72 वीं बैच के परिवीक्षाधीन अधिकारियों से संवाद करते हुए देश के अन्य पुलिस अफसरों को चेतावनी दी। इसे सलाह भी कहा जा सकता है। हालांकि 'खाकी व खादी' के बीच फंसी पुलिस खुद को कितना बदल पाएगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। 


एसपी-डीएसपी ग्रामीण क्षेत्रों में रात्रि विश्राम करें
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, कोई भी संगठन तभी सफलतापूर्वक चलता है जब उसको चलाने वाले व्यवस्था का हिस्सा बन इसको मजबूत करने के लिए काम करें। संगठन की व्यवस्था सुधारने से संगठन स्वतः ही सुधरता है और बेहतर परिणाम देता है। प्रशिक्षण में ही समस्याओं को दूर करने का बीजारोपण किया जाना चाहिए, ताकि व्यक्ति को अधिक से अधिक उत्तरदायी और कर्तव्यपरायण बनाया जा सके। अगर प्रशिक्षण ठीक से किया जाए तो जीवनभर इसके अच्छे परिणाम आते हैं। पुलिस पर निष्क्रियता और अति सक्रियता के आरोप लगते हैं। पुलिस को इनसे बचकर न्यायपूर्ण कार्य की तरफ बढ़ना चाहिए। पुलिसकर्मियों को संवेदनशील बनाया जाए। इसके साथ ही जनता के साथ पुलिस को 'संवाद और जनसंपर्क' बढ़ाने की आवश्यकता है। एसपी और डीएसपी ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर रात्रि विश्राम करें। 
 

आईपीएस अधिकारी प्रचार से दूर रहें 

शाह ने कहा कि अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों और विशेष रूप से आईपीएस अधिकारियों को प्रचार से दूर रहना चाहिए। प्रचार की लालसा से काम में बाधा आती है। उन्होंने कहा कि आधुनिक समय में सोशल मीडिया से बचना कठिन है, लेकिन पुलिस अधिकारियों को इससे बचते हुए अपने कर्तव्यों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। 

ट्रांसफर का भय छोड़ दें
गृह मंत्री ने कहा कि पुलिस अकादमी छोड़ने से पहले आप सब को यह प्रण करना चाहिए कि आप सब रोज अपनी डायरी में यह लिखेंगे कि आपने जो काम किया है वह सिर्फ प्रचार के लिए तो नहीं किया। अमित शाह ने कहा कि पुलिस व्यवस्था में साइड पोस्टिंग का कांसेप्ट आ गया है। आपको अपने पूरे सेवाकाल में इससे बचना चाहिए, क्योंकि पुलिस व्यवस्था में ऐसा कोई काम नहीं है जिसका महत्व ना हो। इसकी वजह से आप तनाव में रहते हैं और कई बार ट्रांसफर के दबाव में अपना काम भी ठीक से नहीं कर पाते। केंद्रीय गृह मंत्री ने सलाह के लहजे में कहा, ट्रांसफर का भय खत्म होने पर आप अपनी ड्यूटी बेहतर ढंग से कर पाएंगे।

जनप्रतिनिधियों के दखल से पोस्टिंग तो कैसे बदलेगी पुलिस: आजाद

कैबिनेट सचिवालय में सेक्रेटरी सिक्योरिटी के पद से रिटायर हुए पूर्व आईपीएस एवं सीआईसी रहे यशोवर्धन आजाद कहते हैं, जब एसपी और एसएचओ की पोस्टिंग में जन प्रतिनिधियों का हस्तक्षेप रहता है तो पुलिस व्यवस्था कैसे बदलेगी? आज पुलिस को कानून के दायरे में स्वायत्तता और संपूर्ण बजट का निर्धारण एवं इस्तेमाल करने के अधिकार दिए जाएं। चेतावनी व सलाह देते रहें। 

जब पुलिस को बेवजह तंग करते हैं तो कौन बचाने आता है
पूर्व आईपीएस आजाद कहते हैं, थानेदार की पोस्टिंग कैसे होती है। देश में बहुत से थाने ऐसे हैं, जहां पोस्टिंग का आधार जाति या धर्म होता है। इस व्यवस्था को कौन बदलेगा। अगर ट्रांसफर पोस्टिंग की पावर पुलिस के हाथ में है तो व्यवस्था बदल जाएगी। राजनीतिक हस्तक्षेप है तो पहले से चली आ रही व्यवस्था आगे भी जारी रहेगी। एसएचओ लगाने का उतना अधिकार एसपी के पास नहीं है, जितना जन प्रतिनिधि के पास है। इस व्यवस्था को बदलने कौन आएगा, इसका जवाब जनप्रतिनिधि ही बेहतर ढंग से दे सकते हैं। पुलिस, मीडिया से बात न करे। जब पुलिस को बेवजह तंग किया जाता है, गैर कानूनी काम के लिए मजबूर करते हैं तो बचाने के लिए कौन आता है। मीडिया में न जाए तो कहां जाएं। 

रात्रि विश्राम का कोई तुक नहीं
आजाद कहते हैं कि रात को गांव में रहें अधिकारी, ये तो 70-80 के दशक की बात कर रहे हैं। एक तरफ आप कहते हैं कि डिजिटल हाईवे का युग आ गया है। सभी इस पर चलें। एसपी को बहुत अहम जगहों पर ही जाना चाहिए। इलाके का दौरा जरूरी है। वह कमांडर है, उसे पॉलिसी बनानी भी है और उसे लागू भी करना है। रात्रि विश्राम जैसी बातों का कोई तुक नहीं है। 

केंद्रीय गृह मंत्रालय की भूमिका बजट देने से ज्यादा कुछ नहीं

पूर्व पुलिस अधिकारी का कहना है कि पुलिस का चेहरा बदलना है तो उसके लिए व्यावसायिक दक्षता ही काफी है। इस दिशा में पुलिस अधिकारियों को पारंगत बनाया जाए। 'नरमी और सख्ती' में सामंजस्य बैठाना होगा। आम लोग हैं, शोषित हैं तो उनके साथ नरमी से बात करें। कोई अपराधी है तो उसके साथ सख्ताई बरतें। 

सहयोग की जरूरत है न कि चेतावनी की
आईपीएस को चार बातों पर गौर करना चाहिए। वह ठोस व्यावसायिकतावाद में विश्वास रखें। तकनीक में पारंगत हों। कानून के प्रति समर्पित हों। बजट का प्रावधान ऐसा हो कि नई तकनीक के लिए वर्षों तक फाइलें इधर से उधर न घूमती रहें। पुलिस को सहयोग की जरूरत है, न कि चेतावनी की। उसे पूर्ण स्वायत्तता मिले। आज एसएचओ या एसपी ही नहीं, बल्कि डीजी की भूमिका को भी संकुचित दायरे में रखा जा रहा है। जांच से लेकर पोस्टिंग तक में जब 'खादी' का हस्तक्षेप होगा तो पुलिस के बदलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। 

बकौल आजाद, केंद्रीय गृह मंत्रालय की भूमिका बजट देने के अलावा और क्या है। ये सारे काम तो बल का डीजी कर सकता है। एक जनप्रतिनिधि झटके से पुलिस अधिकारी का तबादला करा देता है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है, जनप्रतिनिधि ही बता सकते हैं।
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