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फेक इसरो केस में बनाए गए थे आरोपी, सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुनने से पहले ही छोड़ दी दुनिया

Tue, 18 Sep 2018 11:14 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बंगलूरू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बंगलूरू Updated Tue, 18 Sep 2018 11:14 AM IST
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Chandrasekhar framed in ISRO case, he died without hearing SC verdict

जिस खबर को सुनने के लिए इसरो के वैज्ञानिक रहे चुके के. चंद्रशेखर (76) बीते दो दशक से इंतजार रहे थे, वह आखिरकार उस अस्पताल के कमरे पर लगे टीवी स्क्रीन पर दिख रहा था। चंद्रशेखर रूस की अंतरिक्ष एजेंसी में भारत के प्रवक्ता  और 1994 के फेक इसरो जासूसी मामले में सात में से एक आरोपी थे। लेकिन वह इस फैसले को नहीं सुन पाए। वह शुक्रवार की सुबह कोमा में चले गए, सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से महज कुछ ही घंटों पहले, जिसमें मामले में बनाए गए एक अन्य आरोपी नाम्बी नारायणन को 50 लाख रुपये मुआवजा देने को कहा गया। उन्हें फंसाने में संबंधित पुलिस अफसरों की भूमिका की जांच के लिए एक समिति भी गठित कर दी गई।


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चंद्रशेखर, नाम्बी नारायण और अन्य चार लोगों को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बरी कर दिया था। चंद्रशेखर की पत्नी के विजयाम्मा ने कहा कि उन्हें टीवी पर आ रही खबर को दिखाने के लिए बहुत सी कोशिशें की लेकिन उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। यही वह दिन था जिसका वह बरसों से इंतजार कर रहे थे लेकिन फैसले में काफी देर हो गई।

रविवार की रात चंद्रशेखर का निधन हो गया। वह बीते एक महीने से एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती थे। उन्होंने अपने जीवन के दो दशक विद्यारन्यापुरा (उत्तरी बंगलूरू) में बिता दिए। उन्हें केरल पुलिस और आईबी द्वारा परेशान भी किया गया। उनकी पत्नी का कहना है कि केरल पुलिस और आईबी को उनके साथ ऐसा करके आखिर मिला क्या? इतने सालों से जो कुछ हमने सहा उसके लिए कौन जिम्मेदार है। उन्होंने उनका करियर बर्बाद कर दिया। उन्हें गद्दार तक कहा गया।

उनके एक रिश्तेदार का कहना है कि वह घटना के बाद काफी टूट गए थे। लेकिन उन्हें विश्वास था कि एक दिन वक्त उनकी बेगुनाही साबित करेगा। पहले उनकी जिंदगी काफी अच्छी थी लेकिन इस केस ने सब बर्बाद कर दिया। साल 1996 में सीबीआई ने केरल कोर्ट को कहा था कि मामला गलत है, जिसके बाद आरोपियों को बरी कर दिया गया था। केस से उनका करियर तो बर्बाद हुआ ही साथ ही देश के लिए महत्वपूर्ण क्रायोजनिक इंजन से जुड़ा प्रॉजेक्ट भी लटका रह गया। दिलचस्प बात तो यह है कि इस पूरी अवधि में वैज्ञानिकों के निर्दोष पाए जाने के बावजूद संबंधित पुलिस ऑफिसरों की जांच को रोके रखा गया।

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