Karnataka: सरकार के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती, मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया शिवकुमार से जुड़ा मामला
Karnataka: न्यायमूर्ति कृष्ण एस दीक्षित ने कहा कि इतने बड़े मुद्दे पर फैसला लेने के लिए उन्हें लगता है कि खंडपीठ की जरूरत है। उन्होंने आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं के वकील और महाधिवक्ता को सुनने के बाद उनकी राय है कि याचिका को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उनकी पसंद की पीठ और विचार के लिए रखा जाना चाहिए।
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कर्नाटक उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने शुक्रवार को उस याचिका को मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया, जिसमें उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के खिलाफ एक मामले की जांच के लिए सीबीआई को दी गई मंजूरी वापस लेने के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती दी गई है।
भाजपा विधायक बसनगौड़ा पाटिल यतनाल और सीबीआई द्वारा दायर दो अलग-अलग याचिकाएं शुक्रवार को एकल न्यायाधीश की पीठ के समक्ष आईं। न्यायमूर्ति कृष्ण एस दीक्षित ने कहा, सवालों की विशालता के कारण मुझे डर लग रहा है। इतने बड़े मुद्दे पर फैसला लेने के लिए मुझे लगता है कि खंडपीठ की जरूरत है। उन्होंने आदेश दिया, याचिकाकर्ताओं के विद्वान वकील और महाधिवक्ता को सुनने के बाद मेरी सुविचारित राय है कि याचिका को माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उनकी पसंद की पीठ और विचार के लिए रखा जाना चाहिए।
पहले याचिका यतनाल की ओर से दायर की गई थी। अदालत ने उनकी याचिका की वैधता पर सवाल उठाया और कहा कि उन्हें आपराधिक कार्यवाही में प्रभावित पक्ष कैसे माना जा सकता है। यतनाल के वकील ने अदालत में कहा कि किसी भी आम नागरिक के पास सरकार के मंत्रिमंडल के फैसले को चुनौती देने का अधिकार है। अदालत ने कहा कि यह एक अनोखा मामला है।
उन्होंने कहा, 'राज्य में यह अपनी तरह का पहला मामला है।' अदालत ने कहा कि सवाल यह है कि क्या पिछली सरकार द्वारा लिया गया फैसला (मंजूरी देने वाला) बाद में चुनी गई सरकार के लिए बाध्यकारी है। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि चूंकि सीबीआई ने भी सहमति वापस लेने को चुनौती दी है, इसलिए यतनाल द्वारा दायर याचिका की वैधता पर भी विचार किया जाना चाहिए।
सीबीआई के वकील प्रसन्ना कुमार ने कहा कि लोकायुक्त को राज्य ने जांच सौंप दी है और उसने प्राथमिकी दर्ज कर ली है। सीबीआई ने इस नई जांच का रिकॉर्ड मांगा और कहा कि जांच उसे सौंप दी जाए।उच्च न्यायालय ने प्रतिवादी राज्य और लोकायुक्त को नोटिस जारी किया। उच्च न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि याचिकाओं की अंतिम सुनवाई होने तक लोकायुक्त को मामले में आगे नहीं बढ़ना चाहिए।
सीबीआई के वकील ने दलील दी कि इसी तरह की स्थिति में उच्चतम न्यायालय का मानना था कि एक बार जब राज्य सरकार ने जांच के लिए सहमति दे दी है तो उसे पिछली तारीख से वापस नहीं लिया जा सकता। इसलिए, सीबीआई जांच अंतिम छोर तक जानी चाहिए। इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए एकल न्यायाधीश ने इसे बड़ी पीठ के लिए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया।
आयकर विभाग के छापों और प्रवर्तन निदेशालय की जांच के आधार पर सीबीआई ने राज्य सरकार से डीके शिवकुमार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति मांगी थी, जिसे 25 सितंबर, 2019 को मंजूर कर लिया गया। मई के विधानसभा चुनावों के बाद सत्ता में बदलाव के बाद नई सरकार (जिसमें डी के शिवकुमार उपमुख्यमंत्री हैं) ने 28 नवंबर, 2023 को मंजूरी वापस ले ली। इस मंजूरी को वापस लेने के सरकार के 28 नवंबर के आदेश को चुनौती देते हुए यतनाल ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और आरोप लगाया कि यह अवैध है। सीबीआई ने भी मंजूरी वापस लेने को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया है।