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दिल्ली में ‘कश्मीरी प्रवासियों’ को छोड़ना होगा सरकारी आवास: आईबी समेत दूसरे कर्मियों को मिली 30 नवंबर की डेडलाइन

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Tue, 23 Nov 2021 03:13 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने सात अक्तूबर को अपने एक फैसले में कहा, मार्च 2017 में 'आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय' द्वारा जारी 'ऑफिस मेमोरेंडम' 'मनमाना और भेदभाव पूर्ण' है। सर्वोच्च अदालत ने कहा, कश्मीरी माइग्रेंट को सरकारी सेवा से रिटायर्ड होने के पश्चात अनिश्चितकाल के लिए सरकारी आवास नहीं दिया जा सकता है...

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central government retired Kashmiri migrants have to vacate their government accommodation till November 30
supreme court, सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

केंद्र सरकार में विभिन्न पदों से सेवानिवृत्त हुए कश्मीरी प्रवासियों को सरकारी आवास खाली करना पड़ेगा। ‘आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय’ के संपदा निदेशालय ने इसके लिए 30 नवंबर की डेडलाइन तय की है। इस आदेश का असर खुफिया एजेंसियों सहित केंद्र सरकार के दूसरे विभागों से रिटायर हुए कश्मीरी प्रवासियों पर पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक अहम फैसले के बाद संपदा निदेशालय ने ये आदेश जारी किए हैं।

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आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के संपदा निदेशालय द्वारा 28 मार्च 2017 को यह आदेश जारी किया गया था कि जम्मू-कश्मीर के माइग्रेंट कर्मियों को सेवानिवृत्ति के बाद वैकल्पिक सरकारी आवास की सुविधा मिल सकती है। हालांकि 'आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय' ने यह पॉलिसी, दिल्ली उच्च न्यायालय के एक जून 2012 को जारी आदेशों का पालन करने के लिए बनाई थी। इस पॉलिसी को 2017 में लागू किया गया। इसमें 'जनरल पूल रेजिडेंशियल एकोमोडेशन' (जीपीआरए) के तहत जम्मू-कश्मीर के रिटायर्ड कर्मियों को सरकारी आवास देने की बात कही गई है।

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अनिश्चितकाल के लिए नहीं दे सकते सरकारी आवास

सुप्रीम कोर्ट ने सात अक्तूबर को अपने एक फैसले में कहा, मार्च 2017 में 'आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय' द्वारा जारी 'ऑफिस मेमोरेंडम' 'मनमाना और भेदभाव पूर्ण' है। सर्वोच्च अदालत ने कहा, कश्मीरी माइग्रेंट को सरकारी सेवा से रिटायर्ड होने के पश्चात अनिश्चितकाल के लिए सरकारी आवास नहीं दिया जा सकता है।

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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस एपी बोप्पना ने अपने फैसले में कहा था, कश्मीर से जुड़े कर्मियों को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी आवास देने का कोई औचित्य नहीं है। इसमें संबंधित कर्मी का सामाजिक और आर्थिक आधार, तार्किंक नहीं है। सर्वोच्च अदालत ने 'खुफिया एजेंसी' के पूर्व अधिकारी को सरकारी घर में रहने की इजाजत दिए जाने वाले आदेश को निरस्त कर दिया।

 
आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के संपदा निदेशालय द्वारा इस मामले में जो पॉलिसी बनाई गई थी, उसमें कश्मीरी माइग्रेंट को सेवानिवृत्ति के तीन साल बाद तक सरकारी आवास रखने की सुविधा प्रदान की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय का कहना था कि कश्मीरी माइग्रेंट को सेवा के दौरान और सेवानिवृत्ति के तीन साल बाद तक सरकारी आवास मिलता है, इसमें कोई दिक्कत नहीं है। ये तीन साल की अवधि इसलिए दी जाती है, ताकि इस दौरान वह सेवानिवृत्त कर्मी अपने आवास का इंतजाम कर सकता है। आईबी में काम कर चुके अधिकारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का कहना था, इसे यह न समझा जाए कि कोई व्यक्ति आईबी में काम करके आया है तो उसे हमेशा के लिए सरकारी आवास की सुविधा मिलती रहेगी।

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