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निर्भया केस: सुप्रीम कोर्ट पहुंची केंद्र सरकार, कहा- डेथ वारंट जारी होने के सात दिन में हो फांसी

Thu, 23 Jan 2020 04:56 AM IST
आसिम खान न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आसिम खान Updated Thu, 23 Jan 2020 04:56 AM IST
सार

  • दया याचिका खारिज होने के 14 दिन में मिले दोषियों को फांसी
  • केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की याचिका
  • फांसी की प्रक्रिया स्पष्ट करने की लगाई गुहार

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central government filed a petition in SC and appealed to hang death sentence convicts in seven days
सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए फांसी की सजा की प्रक्रिया को स्पष्ट करने की मांग की है। सरकार ने याचिका में प्रक्रिया को दोषी के बजाय पीड़ित के हित पर केंद्रित करने की मांग की।

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साथ ही गुहार लगाई कि फांसी की सजा पा चुके दोषियों को दया याचिका खारिज होने के अधिकतम 14 दिन और डेथ वारंट जारी होने के सात दिनों में गुनहगारों को फांसी देने का प्रावधान किया जाना चाहिए। सरकार ने यह भी कहा कि जब दोषी को पता हो कि उसे अंतत: फांसी ही होनी है तो मृत्युदंड में देरी उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के समान है।
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याचिका में गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2014 में शत्रुघ्न चौहान मामले में दिए फैसले में दिए गए दिशानिर्देशों को स्पष्ट करने की गुहार की है। आवेदन में कहा गया है कि शत्रुघ्न मामले में दोषियों के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए दिशानिर्देश जारी किए गए थे, लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण पीड़ित, पीड़ित परिवार का हित है।
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उस फैसले में पीड़ित व पीड़ित परिवार की मानसिक आघात, यातना, विप्लव व उन्माद को नजरअंदाज कर दिया गया था। अब समय आ गया है कि इनके हितों को ध्यान में रखते हुए दिशानिर्देश बनाने की जरूरत है।

उस फैसले के कई वर्ष पहले और कई वर्षों के बाद भी जघन्य अपराध के दोषी अनुच्छेद-21(प्राण एवं दैहिक स्वंत्रतता का अधिकार) का सहारा लेकर न्यायिक प्रक्रियाओं का बेजा फायदा उठा रहे हैं। जनहित में यह जरूरी है कि नृशंस, जघन्य व भयावह अपराध के दोषियों को कानून के साथ खेलने के मौका न मिले। 

निर्भया मामले के लिहाज से अहम है याचिका
केंद्रीय गृहमंत्रालय की तरफ से दाखिल इस याचिका को 2012 के जघन्य निर्भया दुष्कर्म व हत्याकांड के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है, जिसमें चारों दोषी बार-बार रिव्यू, क्यूरेटिव और दया याचिका सरीखे कानूनी दांवपेचों की मदद से अपनी फांसी टालने में कामयाब हो रहे हैं।

दोषियों को पहले 22 जनवरी को फांसी होनी थी, लेकिन एक दोषी मुकेश की दया याचिका के निपटारे में देरी से अन्य की फांसी भी टल गई। अब नए डेथ वारंट में 1 फरवरी की तारीख तय की गई है, लेकिन दोषियों के वकील पहले ही इसके खिलाफ क्यूरेटिव पिटिशन व अन्य दोषियों की दया याचिका जैसे हथकंडों को आजमाकर इस तारीख को भी फांसी टलवाने की बात कह चुके हैं।

यह की है याचिका में गुहार

  • रिव्यू पिटिशन खारिज होने के बाद क्यूरेटिव पिटीशन दायर करने की समय सीमा तय हो
  • डेथ वारंट जारी होने के सात दिन के भीतर दया याचिका दायर करने की समय सीमा तय हो
  • राष्ट्रपति के दया याचिका खारिज करने के सात दिन में दोषी का डेथ वारंट जारी कर दिया जाए
  • इस डेथ वारंट जारी होने के बाद अगले सात दिन के अंदर उसे फांसी दे दी जाए
  • एक दोषी की फांसी पर उसके साथी दोषियों की रिव्यू या क्यूरेटिव पिटिशन या दया याचिका के लंबित होने का प्रभाव न हो
  • सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तमाम अदालत, राज्य सरकार व जेल प्रशासन को निर्दश दिया जाए

क्या था 2014 का शत्रुघ्न चौहान मामला

गृह मंत्रालय की ओर से दायर आवेदन में वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा शत्रुघ्न चौहान मामले में दिए फैसले में दिए दिशानिर्देशों को स्पष्ट करने की गुहार की है। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिकाओं का लंबे समय तक लंबित रहने के मद्देनजर कहा था कि लंबा इंतजार दोषियों के लिए मानसिक प्रताडना के समान है। साथ ही उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि डेथ वारंट जारी होने और फांसी देने के बीच कम से कम 14 दिनों का अंतराल होना चाहिए।

दुष्कर्म को बताया है सबसे जघन्य अपराध

मंत्रालय ने याचिका में कहा है कि देश में आतंकवाद, दुष्कर्म व हत्या में मृत्युदंड का प्रावधान है। यह माना गया है कि दुष्कर्म का कृत्य न केवल आपराधिक है बल्कि देश की दंड संहिता में किसी भी सभ्य समाज के सबसे भयानक और अक्षम्य अपराध के तौर पर परिभाषित किया गया है। यह किसी महिला या समाज नहीं बल्कि मानवता के खिलाफ किया गया अपराध है। 

अलग-अलग जेल मैनुअल का भी मुद्दा उठाया

सरकार ने कहा कि वैसे मामले में जहां कई दोषियों को फांसी की सजा दी गई हो तो ऐसा अक्सर होता है कि एक दोषी पुनर्विचार या सुधारात्मक याचिका दायर करता है। उसकी याचिका खारिज होने के बाद दूसरे दोषियों को यह सलाह दी जाती है या वह खुद आवेदन दाखिल कर अदालती कार्यवाही को शुरू करने में दिलचस्पी नहीं लेता।

इसका कारण है कि अलग-अलग राज्यों के जेल मैनुअल में फांसी की सजा देने को लेकर अलग-अलग नियम है। कई जैन मैनुअल में दोषियों को एक साथ फांसी पर लटकाने का नियम है लेकिन कुछ जेल मैनुअल में एक-एक कर दोषियों को फांसी पर लटकाने का प्रावधान है। लिहाजा दोषी ऐसे प्रावधान की आड़ में कानून से खिलवाड़ करते हैं।

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