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भारतीय समाज के सामने बड़ी चुनौती है जातिवाद

Tue, 02 Oct 2018 02:51 AM IST
Updated Tue, 02 Oct 2018 02:51 AM IST
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Casteism is a big challenge in front of Indian society
जातिवाद - फोटो : BBC

भारत में समाज नाम की कोई चीज नहीं जातियों का जमावड़ा है। जिसके कारण यहां समाज जैसी किसी संकल्पना का उदय नहीं हो सका और जाति को ही समाज मान लिया गया। जाति व्यवस्था में 'भारतीय समाज' की संकल्पना बेमानी ही होगी। जाति से खंडित राष्ट्र में राष्ट्रवाद की संकल्पना भी परवान नहीं चढ़ सकेगी। जाति नागरिकता पर हावी होते हुए अव्वल और दोयम दर्जे की नागरिकता को भी परिभाषित करती है।

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डॉ. अंबेडकर के जाति उन्मूलन के सपने को पूरा कर पाने में आत्ममुग्ध अंबेडकरवादी न सिर्फ नाकाम रहे हैं, बल्कि अपनी-अपनी जातियों के पक्ष में मजबूती से खड़े भी दिखाई देते हैं। ये जातिवाद को गरियाते जरूर हैं पर अपनी जाति को छोड़ने से परहेज भी रखते हैं। दलितों ने डॉ. अंबेडकर के राष्ट्र निर्माण और मानवतावादी विचार को भुला कर उन्हें आरक्षण का पर्याय बनाकर उनकी छवि को भारी नुकसान पहुंचाने का काम किया है।
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जाति का प्रादुर्भाव कब, कहां और कैसे हुआ इसकी कोई सर्वमान्य वैधता नहीं है। दुनिया में अमीरी और गरीबी के आधार पर वर्ग सदा से थे और इसमें बदलाव संभव था। वर्ण और जाति भारत की अपनी ईजाद है इसे दैवीय मानकर परिवर्तनशीलता से इंकार भी किया जाता है। दुनिया के रंग और नस्लभेद भी अपनी मौत मर गए मगर भारत में जाति जिंदा है और जल्द मरने के कोई आसार दिखायी नही देते।
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दलित पहले अपनी जातियों का उन्मूलन कर उदाहरण प्रस्तुत करें

जाति का जनक मनुवाद और ब्राह्मणवाद को माना जाता है। जाति में ऊंच-नीच है, असमानता है, शोषण और अत्याचार है, इसलिए सभी बुद्धिजीवी और जाति व्यवस्था से पीड़ित दलित मनुवाद और ब्राह्मणवाद को कोसते हैं, जाति का नाश चाहते हैं, समानता और भाईचारा चाहते हैं।

बावजूद इसके दलित खुद अपनी जातियों से बड़ी सिद्दत से न केवल चिपके हैं बल्कि जाति की विरासत को ढो रहे हैं। कुछ दलित जातियां अपने आपको श्रेष्ठ और महान भी बता रही हैं। अपनी जाति की महानता की सुर-लहरिया मंचों और मीडिया से सुना रही हैं, बावजूद इसके अपने आपको अंबेडकरवादी भी कहते हैं।

दलितों में भी जाति क्रम वर्ण व्यवस्था की तर्ज पर मौजूद है। हम दलितों को 'स्वयं-जाति-उन्मूलन' की दिशा में उत्प्रेरित कर सकते थे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। क्योंकि प्रगतिशील, बुद्धिजीवी और अंबेडकरवादी, कहाने वाले लोग अपनी जाति में बने रहना चाहते हैं।

दलित सच में जाति उन्मूलन चाहते हैं तो पहले अपनी जातियों का उन्मूलन कर उदाहरण प्रस्तुत करें तब दूसरों से एसी अपेक्षा करें, और जब तक दलितों में जाति भेद है तब तक दलित एकता पर भी प्रश्न-चिन्ह ही रहेगा।

अपने आपको अंबेडकरवादी और फूलेवादी कहने वालों के पास मनुवाद को गरियाने और दिन-रात कोसने के सिवाय, दलितों के विकास का कोई कार्यक्रम और नीति नहीं है। वरना 70 वर्ष की आजादी के बाद भी दलित मैला ढोने के अमानवीय कार्य में संलिप्त न होते।

डॉ. अंबेडकर के विचारों की बारीकियों को उनके तथाकथित अनुयायियों ने भुला दिया है। डॉ. अंबेडकर की शिक्षाओं में अन्याय और अत्याचार के खिलाफ प्रतिकार है लेकिन सामाजिक घृणा और अलगाव बिलकुल नहीं है। वे हमेशा सामाजिक भाईचारे की बात करते थे।

दलितों को अपने अंदर झांकना होगा कि क्या दलितों में परस्पर समानता है?

राजनैतिक संरक्षण और लंबे समय से आरक्षण के लाभ से सम्पन्न दलित जातियों ने जाति-उन्मूलन के एजेंडे को हाशिये पर धकेल दिया है। जाति की पहचान का प्रदर्शन करने की कतार में सबसे आगे तथाकथित अंबेडकरवादी ही हैं, और यह पहचान दलित या बहुजन के तौर पर नहीं बल्कि जाति के तौर पर है। दलितों में जातिसूचक उपनामों से जातियों का भी एक 'वाद' बन गया है।

समता और समानता की जुगाली करने वाले और बात-बात पर संविधान की दुहाई देने वाले दलितों को अपने अंदर झांकना होगा कि क्या दलितों में परस्पर समानता है? और आरक्षण को प्रोत्साहन और प्रतिनिधित्व कहने वालों  को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यह प्रोत्साहन और प्रतिनिधित्व सभी दलित जातियों को  समान रूप से मिल रहा है या चंद जातियां ही इसे चट कर रही हैं। जाति के जूस की टपकती हुई आरक्षण की एक-एक बूंद इन्हें जातिवादी बने रहने के लिए विवश करती है।

मनुवाद व ब्राह्मणवाद को गालियां देने वालों को एहसास तक नहीं है कि 'अगड़ी जातियां पिछड़ी जातियों को साथ लेकर गम-खुशी तथा खान-पान में एक साथ होती हैं। पिछड़ी जातियां, जो संख्या बल में सबसे अधिक हैं वे भी गम-खुशी और खान-पान में एक साथ होती हैं, और दूसरी ओर दलित जातियां खान-पान तो दूर की बात, गम और खुशी में एक साथ नहीं होतीं।

आरक्षित सीटों से संसद एवं विधान सभाओं में पहुंचने वाले सामाजिक न्याय के कर्णधारों ने कभी भी मैला ढोने जैसे अमानवीय प्रथा के खिलाफ संसद और विधान सभाओं में मुखर होकर आवाज नहीं उठाई। देश में सफाई पेशा जातियों के हालात बंधुआ मजदूरों जैसे हो गए हैं, इनकी सुध लेना वाला कोई नहीं। आरक्षण-संपन्न दलित जातियों द्वारा सफाई पेशा जातियों के साथ सवर्ण जातियों जैसा ही छुआछूत का व्यवहार किया जाता है, और जाति के नाम पर शोषण भी किया जाता है। आज देश में सफाई पेशा जातियां सवर्णों और अवर्णों सबके लिए अछूत हैं। दलितों में परस्पर समानता के अभाव में बहुजन का नारा निरर्थक है।

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