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Caste Census in Bihar: बिहार में सरकार क्यों कराना चाहती है जातिगत जन-गणना? जानें इसके राजनीतिक मायने
Thu, 04 May 2023 03:50 PM IST
हिमांशु मिश्रा
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु मिश्रा
Updated Thu, 04 May 2023 03:50 PM IST
सार
आखिर बिहार सरकार जातीय जनगणना क्यों कराना चाहती है? इसपर इतना विवाद क्यों है? इसके सियासी मायने क्या हैं? आइए जानते हैं...
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बिहार में जाति आधारित जन-गणना
- फोटो : AMAR UJALA
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विस्तार
बिहार में जाति आधारित जन-गणना पर पटना हाईकोर्ट ने तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। तीन जुलाई को अगली सुनवाई होगी, तब तक किसी भी तरह के रिपोर्ट बनाने पर रोक लगा दी गई है। ये जातीय जन-गणना शुरू से ही विवादों में रही है। इसके खिलाफ दायर याचिका में कहा गया था कि बिहार सरकार को इसे कराने का संवैधानिक अधिकार नहीं है।
जातीय जन-गणना का अभी कितना काम पूरा हुआ? बिहार सरकार जातीय जनगणना क्यों कराना चाहती है? इस पर इतना विवाद क्यों है? इसके सियासी मायने क्या हैं? आइए जानते हैं...
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जातीय जन-गणना का अभी कितना काम पूरा हुआ? बिहार सरकार जातीय जनगणना क्यों कराना चाहती है? इस पर इतना विवाद क्यों है? इसके सियासी मायने क्या हैं? आइए जानते हैं...
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जातीय जनगणना का अभी कितना काम पूरा हुआ?
बिहार सरकार ने दो चरणों में जातीय जनगणना का काम पूरा करने का एलान किया था। अभी इसका दूसरा फेज चल रहा है। पहला फेज जनवरी में पूरा हो गया था। फिर 15 अप्रैल से दूसरे फेज की शुरुआत हुई, जो 15 मई तक पूरा होना है। पहले चरण में लोगों के घरों की गिनती की गई। इसकी शुरुआत पटना के वीआईपी इलाकों से हुई।
दूसरे चरण में जाति और आर्थिक जनगणना का काम शुरू हुआ। इसमें लोगों के शिक्षा का स्तर, नौकरी (प्राइवेट, सरकारी, गजटेड, नॉन-गजटेड आदि), गाड़ी (कैटगरी), मोबाइल, किस काम में दक्षता है, आय के अन्य साधन, परिवार में कितने कमाने वाले सदस्य हैं, एक व्यक्ति पर कितने आश्रित हैं, मूल जाति, उप जाति, उप की उपजाति, गांव में जातियों की संख्या, जाति प्रमाण पत्र से जुड़े सवाल पूछे जा रहे हैं। दूसरा चरण 15 मई तक चलना था। जिस पर गुरुवार को रोक लग गई।
बिहार सरकार ने दो चरणों में जातीय जनगणना का काम पूरा करने का एलान किया था। अभी इसका दूसरा फेज चल रहा है। पहला फेज जनवरी में पूरा हो गया था। फिर 15 अप्रैल से दूसरे फेज की शुरुआत हुई, जो 15 मई तक पूरा होना है। पहले चरण में लोगों के घरों की गिनती की गई। इसकी शुरुआत पटना के वीआईपी इलाकों से हुई।
दूसरे चरण में जाति और आर्थिक जनगणना का काम शुरू हुआ। इसमें लोगों के शिक्षा का स्तर, नौकरी (प्राइवेट, सरकारी, गजटेड, नॉन-गजटेड आदि), गाड़ी (कैटगरी), मोबाइल, किस काम में दक्षता है, आय के अन्य साधन, परिवार में कितने कमाने वाले सदस्य हैं, एक व्यक्ति पर कितने आश्रित हैं, मूल जाति, उप जाति, उप की उपजाति, गांव में जातियों की संख्या, जाति प्रमाण पत्र से जुड़े सवाल पूछे जा रहे हैं। दूसरा चरण 15 मई तक चलना था। जिस पर गुरुवार को रोक लग गई।
बिहार सरकार क्यों कराना चाहती है जातीय जनगणना?
बिहार के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मनोज झा से बात की। उन्होंने इसके दो कारण बताए।
1. राजनीतिक फायदा: बिहार में ओबीसी और ईबीसी मिलाकर कुल 52% से अधिक आबादी है। कई रिपोर्ट्स में दावा किया जाता है कि बिहार में करीब 14 फीसदी यादव हैं। कुर्मी चार से पांच प्रतिशत हैं। कुशवाहा वोटर की संख्या आठ से नौ प्रतिशत के बीच है। सर्वणों की बात करें तो राज्य में इनकी कुल आबादी 15% है। इनमें भूमिहार 6%, ब्राह्मण 5%, राजपूत 3% और कायस्थ की जनसंख्या 1% है।
बिहार में अति पिछड़ा वर्ग भी निर्णायक संख्या में है। ऐसे में पूरा खेल इन्हीं वोटों के लिए है। राजनीतिक दलों को इसमें फायदा दिखता है। उन्हें लगता है कि इसके जरिए धर्म की बजाय जाति के आधार पर वोट पड़ेगा। इसका सबसे ज्यादा फायदा जेडीयू और आरजेडी गठबंधन को मिल सकता है।
2. आबादी के हिसाब से आरक्षण का दांव: लंबे समय से इसकी मांग हो रही है। जातीय समितियों का नारा है कि जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। मतलब आबादी के हिसाब से ही आरक्षण दिया जाए। ओबीसी वर्ग से आने वाले लोगों का कहना है कि एससी-एसटी को संख्या के आधार पर आरक्षण दिया जा रहा है। इसी तरह ओबीसी को भी उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण दिया जाए।
बिहार के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मनोज झा से बात की। उन्होंने इसके दो कारण बताए।
1. राजनीतिक फायदा: बिहार में ओबीसी और ईबीसी मिलाकर कुल 52% से अधिक आबादी है। कई रिपोर्ट्स में दावा किया जाता है कि बिहार में करीब 14 फीसदी यादव हैं। कुर्मी चार से पांच प्रतिशत हैं। कुशवाहा वोटर की संख्या आठ से नौ प्रतिशत के बीच है। सर्वणों की बात करें तो राज्य में इनकी कुल आबादी 15% है। इनमें भूमिहार 6%, ब्राह्मण 5%, राजपूत 3% और कायस्थ की जनसंख्या 1% है।
बिहार में अति पिछड़ा वर्ग भी निर्णायक संख्या में है। ऐसे में पूरा खेल इन्हीं वोटों के लिए है। राजनीतिक दलों को इसमें फायदा दिखता है। उन्हें लगता है कि इसके जरिए धर्म की बजाय जाति के आधार पर वोट पड़ेगा। इसका सबसे ज्यादा फायदा जेडीयू और आरजेडी गठबंधन को मिल सकता है।
2. आबादी के हिसाब से आरक्षण का दांव: लंबे समय से इसकी मांग हो रही है। जातीय समितियों का नारा है कि जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। मतलब आबादी के हिसाब से ही आरक्षण दिया जाए। ओबीसी वर्ग से आने वाले लोगों का कहना है कि एससी-एसटी को संख्या के आधार पर आरक्षण दिया जा रहा है। इसी तरह ओबीसी को भी उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण दिया जाए।
तीसरा कारण... जिसका सरकार दावा करती है
एक तीसरा कारण भी है, जिसका सरकार दावा करती है। बिहार सरकार का कहना है कि जातीय जनगणना की रिपोर्ट आने के बाद पिछड़े लोगों की सही संख्या मालूम चल पाएगी। इससे उन्हें उन सुविधाओं का लाभ दिया जा सकेगा, जो अब तक उन्हें नहीं मिल पाती थी। आबादी के हिसाब से उनके लिए सरकारी योजनाएं बनाई जाएंगी, ताकि समाज की मुख्य धारा में पिछड़े लोगों की जिंदगी बेहतर हो सके।
एक तीसरा कारण भी है, जिसका सरकार दावा करती है। बिहार सरकार का कहना है कि जातीय जनगणना की रिपोर्ट आने के बाद पिछड़े लोगों की सही संख्या मालूम चल पाएगी। इससे उन्हें उन सुविधाओं का लाभ दिया जा सकेगा, जो अब तक उन्हें नहीं मिल पाती थी। आबादी के हिसाब से उनके लिए सरकारी योजनाएं बनाई जाएंगी, ताकि समाज की मुख्य धारा में पिछड़े लोगों की जिंदगी बेहतर हो सके।
इसके सियासी मायने क्या हैं?
मनोज झा कहते हैं, 'भाजपा पर धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने का आरोप लगता है। भाजपा की हिन्दुत्व की राजनीति को विपक्षी दल जातिगत राजनीति से जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं। इस तरह की जन-गणना इसमें धार देने का काम कर सकती है।'
मनोज झा कहते हैं, 'भाजपा पर धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने का आरोप लगता है। भाजपा की हिन्दुत्व की राजनीति को विपक्षी दल जातिगत राजनीति से जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं। इस तरह की जन-गणना इसमें धार देने का काम कर सकती है।'