कुरुक्षेत्र: जातीय जनगणना पर पसोपेश में भाजपा और कांग्रेस, कहीं नाराज न हो जाएं सवर्ण

विनोद अग्निहोत्री विनोद अग्निहोत्री
Updated Wed, 08 Sep 2021 05:39 PM IST

सार

भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल जातीय जनगणना के पक्ष में नहीं रहे हैं। 2011 की जनगणना के दौरान जब यूपीए सरकार थी तब भी मंडलवादी क्षेत्रीय दलों ने जातीय जनगणना की मांग की थी, लेकिन तब भी केंद्र सरकार इससे सहमत नहीं हुई और भाजपा ने भी इसका समर्थन नहीं किया। बाद में दबाव बढ़ने पर अलग से जातिवार जनगणना कराई तो गई लेकिन उसके आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए।
जाति आधारित जनगणना पर नई बहस
जाति आधारित जनगणना पर नई बहस - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

जातीय जनगणना के सवाल पर भाजपा में दुविधा है तो कांग्रेस बेहद दबाव में हैं। दोनों राष्ट्रीय दलों के भीतर इस मांग को माने जाने का दबाव बढ़ रहा है। भाजपा सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस सूत्रों के अनुसार पार्टी के नीति निर्धारक पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी दोनों ही इसके पक्ष में हैं, लेकिन दोनों ही अपने अपने दलों में इसके लिए सहमति बनाना चाहते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने इसका संकेत बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार विधानसभा के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात करके दिया है। जनता दल (यू) के महासचिव के.सी.त्यागी के मुताबिक इस मुलाकात में प्रधानमंत्री मोदी ने प्रतिनिधि मंडल की बात सुनी और उन्होंने जातीय जनगणना की मांग को नकारा नहीं। उधर इसी तरह कांग्रेस ने जातीय जनगणना के मुद्दे पर विचार विमर्श करके अपनी रिपोर्ट देने के लिए एक शीर्ष समिति का गठन किया है। समिति का अध्यक्ष पूर्व कानून मंत्री वीरप्पा मोईली को बनाया गया है जो खुलकर जातीय जनगणना के पक्ष में बयान दे चुके हैं।
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गौरतलब है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल जातीय जनगणना के पक्ष में नहीं रहे हैं। 2011 की जनगणना के दौरान जब यूपीए सरकार थी तब भी मंडलवादी क्षेत्रीय दलों ने जातीय जनगणना की मांग की थी, लेकिन तब भी केंद्र सरकार इससे सहमत नहीं हुई और भाजपा ने भी इसका समर्थन नहीं किया। बाद में दबाव बढ़ने पर अलग से जातिवार जनगणना कराई तो गई लेकिन उसके आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए। जबकि अभी तक सिर्फ 1931 की जातीय जनगणना के आंकड़ों के आधार पर समाज में विभिन्न जातियों की संख्या का अनुमान लगाया जाता है और दावे किए जाते हैं। लेकिन अब इस मांग को लेकर लगातार दबाव बढ़ रहा है जबकि केंद्र सरकार संसद में एक सवाल के जवाब में इससे इनकार कर चुकी है।


जहां सभी दलों के पिछड़े वर्गों के सांसद जातीय जनगणना के पक्ष में खुलकर हैं, और उन्हें अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों का भरपूर समर्थन मिल रहा है, वहीं अब अल्पसंख्यक वर्ग के नेता और सांसद भी इसके पक्ष में राय देने लगे हैं। यही वजह है कि न सिर्फ नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, तेजस्वी यादव अखिलेश यादव और मायावती जैसे नेता इसके पक्ष में हैं बल्कि तृणमूल कांग्रेस की नेता और प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी जातीय जनगणना का समर्थन किया है। राज्यसभा में नेता विपक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे भी इसका समर्थन कर चुके हैं। कांग्रेस के भीतर नेतृत्व की कार्यशैली को लेकर सवाल उठाने वाले जी-23 के नेता कपिल सिब्बल का भी मानना है कि इस मांग को माने जाने के सिवा कोई चारा नहीं है, इसलिए जितनी जल्दी हो पार्टी को इसकी घोषणा कर देनी चाहिए।

दरअसल कांग्रेस और भाजपा के डर अलग-अलग हैं। कांग्रेस को लगता है कि इस मांग का समर्थन करने से उसका सवर्ण और शहरी जनाधार नाराज हो जाएगा। हालांकि, इस मुद्दे पर बनी समिति के एक सदस्य का कहना है कि वैसे ही उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश, बिहार, जैसे राज्यों में सवर्ण अब कांग्रेस के साथ है। इसलिए पार्टी को इस डर से बाहर निकलना होगा, क्योंकि अगर भाजपा ने पहले इसे मान लिया तो कांग्रेस पिछड़ जाएगी और न उसके पास सवर्ण रहेगा और न ही पिछड़ा। राहुल गांधी के करीबी सूत्रों के मुताबिक राहुल जातीय जनगणना के विरोध में नहीं हैं। क्योंकि उनका मानना है कि अपनी स्थापना से ही कांग्रेस गरीबों वंचितों पिछड़े और दलित वर्गों के हितों की संरक्षण की हिमायती रही है। इसलिए अगर समाज के पिछड़े वर्गों को आगे लाना है तो उनकी सही संख्या की जानकारी होनी चाहिए। ताकि उसके हिसाब से ही उनकी हिस्सेदारी तय हो सके और सरकारें योजनाएं बना सकें। लेकिन कांग्रेस के कई पुराने नेता इसलिए इसके विरोध में हैं कि उन्हें लगता है कि इससे सामाजिक विभाजन और गहरा होगा जो देशहित में नहीं है। करीब करीब यही राय भाजपा के भी पुराने सवर्ण नेताओं की है कि जातीय जनगणना देश और समाज की एकता को कमजोर करेगी।

भाजपा की दूसरी कठिनाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिंदुत्व की वैचारिक अवधारणा है। संघ अपने जन्म से ही भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने और हिंदू एकता के साथ हिंदू पहचान को सर्वोपरि बनाने के लिए काम कर रहा है। राम मंदिर आंदोलन के जरिए संघ को इसमें काफी हद तक कामयाबी भी मिली है और इसके राजनीतिक नतीजे 1990 के बाद से लगातार आने शुरु हुए और 2014 से लेकर लगातार चुनावों में हिंदुत्व और हिंदू एकता संघ परिवार का एक बड़ा राजनीतिक और वैचारिक हथियार बन गया है जो कुछ अपवादों को छोड़कर भाजपा के लिए जीत की गारंटी माना जाने लगा है। नब्बे के शुरुआती दशक में भाजपा के तत्कालीन महासचिव के.एन.गोविंदाचार्य जो संघ के पूर्व प्रचारक भी हैं, ने सोशल इंजीनियरिंग का राजनीतिक सिद्धांत गढ़ा जिसके तहत पहली बार उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने पर पिछड़े वर्ग के नेता कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया।

इसी सोशल इंजीनियरिंग के तहत विनय कटियार, उमा भारती. स्वामी साक्षी महाराज, शिवराज सिंह चौहान, प्रहलाद पटेल, ओम प्रकाश सिंह, रामकुमार वर्मा समेत पिछड़े वर्गों के कई नेता उत्तर भारतीय राज्यों में आगे किए गए, जिनमें कुछ को आगे चलकर सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री तक बनाया गया। यह सिलसिला अभी जारी है और 2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के साथ साथ भाजपा और संघ परिवार ने इस पर खासा जोर दिया कि मोदी भी पिछड़े वर्ग से आते हैं। इस कवायद से पिछड़े जो एक तरह सामाजिक न्याय की मंडलवादी धारा के दलों का स्वाभाविक जनाधार थे, कई राज्यों में भाजपा के साथ जुड़ते चले गए। 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की आशातीत सफलता का एक बड़ा कारण उसे सवर्णों के साथ साथ गैर यादव पिछड़ों और गैर जाटव दलितों का मिला समर्थन भी था। इसलिए भाजपा के भीतर जातीय जनगणना के पक्ष में दबाव बढ़ रहा है औऱ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे महसूस भी कर रहे हैं।

अपने मंत्रिमंडल के विस्तार में पिछड़ों को खासी तरजीह, नीट की परीक्षा में पिछड़े वर्गों को आरक्षण और राज्यों में पिछड़े वर्गों की पहचान करके सूची बनाने का अधिकार राज्यों को वापस देने के उनके फैसलों को मंडल- दो तक कहा जा रहा है। ऐसे में केंद्र सरकार के लिए जातीय जनगणना की मांग को लंबे समय तक टालना या नामंजूर करना मुश्किल होता जा रहा है। लेकिन दूसरी तरफ संघ नेतृत्व इसके पक्ष में इसलिए नहीं है क्योंकि उसे लगता है कि इससे उसकी हिंदुत्व की अवधारणा जो अब फलीभूत होती दिख रही है, न सिर्फ कमजोर पड़ेगी बल्कि हिंदू पहचान के ऊपर जातीय पहचान फिर भारी पड़ेगी और इससे हिंदू समाज में जातीय विभाजन गहरा हो जायेगा। इससे हिंदू एकता और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए संघ नेतृत्व से जातीय जनगणना को हरी झंडी नहीं मिल रही है। प्रधानमंत्री मोदी और केंद्र सरकार की सबसे बड़ी दुविधा यही है।

कांग्रेस का एक धड़ा प्रधानमंत्री मोदी और केंद्र सरकार की इस दुविधा में राजनीतिक लाभ खोज रहा है। उसे लगता है कि इसके पहले यह दुविधा दूर हो और बिना किसी की परवाह करके साहसी फैसले लेने के लिए मशहूर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जातीय जनगणना की मांग माने जाने की घोषणा करके पिछड़ों का दिल जीतें कांग्रेस नेतृत्व को इस मांग का समर्थन करते हुए केंद्र से जातीय जनगणना की मांग करने की पहल करनी चाहिए। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता जिन्होंने कभी आरक्षण के आर्थिक आधार की बात उठाई थी और उन्हें इसके लिए कांग्रेस के कई नेताओं की आलोचना का शिकार होना पड़ा था, का कहना है कि वही काम 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी ने करके दिखा दिया जब उन्होंने सामान्य वर्ग के लिए दस फीसदी आरक्षण आर्थिक आधार पर देने का फैसला किया और भाजपा को इसका जबर्दस्त फायदा मिला।

बिहार में कांग्रेस के साथ गठबंधन करने वाले राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव जातीय जनगणना के मुद्दे पर इतने मुखर हैं कि उन्होंने बिहार में अपने प्रबल विरोधी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत सभी दलों को जिनमें कांग्रेस भी शामिल है, को साथ ले लिया। तब लंबे समय तक कांग्रेस इस मुद्दे पर अपनी राजनीतिक लाईन तय करने को कब तक टाल सकेगी। उसे फैसला लेना होगा। कांग्रेस के नेता और कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम का कहना है कि इस मुद्दे पर जितनी जल्दी हो सके कांग्रेस को जातीय जनगणना का समर्थन कर देना चाहिए। इससे उसे दो फायदे होंगे। अगर सरकार ने यह मांग नहीं मानी तो पिछड़े वर्गों की नाराजगी भाजपा से बढ़ेगी और उसका जनाधार कमजोर होगा। और अगर मान ली तो कांग्रेस को भी इसका श्रेय मिलेगा और संघ का हिंदुत्व कमजोर होगा। तब कांग्रेस और गैर भाजपा दलों के लिए चुनावों में मोदी और भाजपा को हराना ज्यादा आसान होगा। वहीं पिछड़े वर्ग के एक भाजपा नेता कहते हैं कि भाजपा के लिए यह मांग दुधारी तलवार है। मांग न मानने पर पिछड़े वर्गों की नाराजगी का जोखिम है और माने जाने पर हिंदू ध्रुवीकरण और हिंदुत्व की राजनीति के कमजोर होने का खतरा है। इसलिए सरकार को फिलहाल एक समिति बनाकर बीच का रास्ता निकालना चाहिए

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