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दर्दनाक होता है मौत का वो पल जब तड़पता रहता है फांसी के फंदे से लटका कैदी

Tue, 17 Oct 2017 01:55 PM IST
amarujala.com- Presented By: पूजा मेहरोत्रा
amarujala.com- Presented By: पूजा मेहरोत्रा Updated Tue, 17 Oct 2017 01:55 PM IST
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capital punishment and Hanging has been India’s favoured mode of execution for over 100 years
फांसी की सजा पर विश्वभर में एक लंबी बहस चल रही है। कई देशों में मौत की सजा जहरीला इंजेक्शन लगा कर दी जाती है तो कहीं गोली मारी जाती है। अब भारत में भी फांसी की सजा पर बहस शुरु हो गई है। बहस इस बात पर है कि मौत की सजा यानी फांसी, दर्दनाक होती है, ऐसे में फांसी के लिए किसी अन्य तरीके को इस्तेमाल में लाया जाना चाहिए।  
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जब भी किसी को फांसी की सजा दी जाती है तब कई बार कैदी की गर्दन टूटती नहीं है और कैदी मौत के लिए तड़पता रहता है। कैदी की आंखें तक निकल कर बाहर आ जाती है और जीभ बाहर लटक जाती है। गर्दन पर जहां फंदा होता है वहां मांस का लोथड़ा लटक कर गिर जाता है।
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कई बार कैदी का मलमूत्र तक निकल जाता है। इस भयानक नजारे को देखते हुए कई-कई बार वहां मौजूद लोग बेहोश तक हो जाते हैं। कैदी इस दर्दनाक स्थिति में 8 से 14 मिनट तक लटकता रहता है, जब तक डॉक्टर उसकी दिल की धड़कने सुनकर उसे मृत घोषित न कर दें। 
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भारत में आखिरी फांसी 1993 बांबे ब्लास्ट में दोषी याकूब मेनन को 2015 में, नागपुर की सेंट्रल जेल में दी गई थी। याकूब की फांसी को देखने के लिए उसके परिवार वालों को भी अनुमति नहीं दी गई थी। उसकी फांसी के दौरान मजिस्ट्रेट, डॉक्टर और  जेल के कुछ अधिकारी मौजूद थे। जब याकूब को फांसी दी गई तो उसकी हालत कैसी थी? क्या उसे तुरंत मौत आ गई थी या वो तड़पता रहा था? वहां मौजूद कोई भी यह बताने को तैयार नहीं है।

भारत में स्वतंत्रता के बाद अभी तक 1414 लोगों को फांसी दी गई है। जिन्हें फांसी दी गई उनके अंतिम क्षण कितने दर्दनाक थे इस बारे में भी बहुत जानकारी नहीं है। पिछले 100 सालों से भारत में सजा-ए-मौत के तौर पर फांसी ही दी जाती है। भारत में पहली बार फांसी की सजा पर बहस 34 वर्ष पहले शुरु हुई जब दीपा नाम की महिला ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और फांसी की सजा पर विचार करने की बात की।

पढ़ें;  मृत्युदंड के लिए फांसी की सजा पर हो पुनर्विचार, केंद्र सरकार 3 महीने में दे जवाब: सुप्रीम कोर्ट

कई बार कैदी की गर्दन टूटती नहीं है और कैदी मौत के लिए जूझता है और तड़पता रहता है

capital punishment and Hanging has been India’s favoured mode of execution for over 100 years
 न्यायाधीश भगवती ने फांसी की सजा पर एक ग्राफिक बनाया, जिसमें फांसी की सजा और जिसे फांसी दी जा रही है उसके हालात के बारे में बताया था। जिसे पढ़ने के बाद अच्छे-अच्छों के रोंगटे खड़े हो जाएंगे। जस्टिस भगवती ने लिखा है- फांसी की सजा दिए जाने के एक दिन पहले कैदी डरावने पलों से गुजरता है। उस दिन उसका वजन लिया जाता है, उसकी लंबाई की नाप ली जाती है यहां तक की शरीर से लेकर गर्दन तक की नाप ली जाती है।

जब फांसी की सजा देने के लिए ले जाया जाता है और कैदी की गर्दन को फांसी के फंदे में डाला जाता है और उसे कसा जाता है...उसके बाद वो पीड़ा जिसे लिखा जाना, बोला जाना, देखा जाना और इस मोमेंट का डिस्क्रिप्शन करना रोंगटे खड़े करने वाला है। 

डेथ पेनाल्टी को बदला जाना चाहिए

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सुप्रीम कोर्ट
फांसी की सजा को देखते हुए अब अल्टरनेटिव सजा दिए जाने की बात तो चल रही है लेकिन ये भी कहा जा रहा है कि आज भी मौत की सजा के लिए सबसे आसान, दर्दरहित और तेजी से सजा देने का आसान तरीका फांसी  ही है।

लेकिन कई जजों का मानना है कि पिछले कुछ सालों में फांसी की सजा में तकनीकी सुधार हुआ है और आज भी रस्सी से फांसी  की सजा दिया जाना कोई क्रूर तरीका नहीं है। लेकिन सर्वे के अनुसार 80 फीसदी से अधिक जजों का मानना है कि डेथ पेनाल्टी को बदला जाना चाहिए। जबकि ज्यूरी ये खोजने में लगी है कि अगर फांसी नहीं तो किसी इंसान को मौत की सजा देने के लिए क्या एक बेहतरीन तरीका  हो सकता है?
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