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Hindi News ›   India News ›   Budget 2025: Income tax exemption up to Rs 10 lakh and provisions like OPS, will government agree to do this?

Budget 2025: 10 लाख रुपए तक आयकर में छूट और OPS जैसे प्रावधान, क्या ऐसा करने पर राजी होगी सरकार?

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Fri, 24 Jan 2025 07:11 PM IST
सार

अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर लगभग दर्जनभर मांगों को पूरा करने का आग्रह किया है। महासंघ ने अपने पत्र में कहा है कि जब केंद्रीय बजट पेश हो, तो उसमें रक्षा कर्मचारियों की मांगों को लेकर सरकार का सकारात्मक रुख नजर आए।

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Budget 2025: Income tax exemption up to Rs 10 lakh and provisions like OPS, will government agree to do this?
केंद्रीय बजट 2025 से उम्मीद। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

केंद्र सरकार, बजट की तैयारियों में जुट गई है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एक फरवरी को देश का आम बजट पेश करेंगी। विभिन्न वर्गों के साथ-साथ केंद्रीय कर्मचारी भी बजट में अपने हितों की रक्षा के लिए आवाज बुलंद कर रहे हैं। कर्मचारी संगठन, प्रतिवेदनों के माध्यम से वित्त मंत्रालय तक अपनी बात पहुंचा रहे हैं। अन्य मांगों के अलावा इस बार कर्मचारी संगठन, 10 लाख रुपये तक आयकर में छूट और पुरानी पेंशन जैसे प्रावधान, इस मांग को प्रमुखता से आगे रख रहे हैं। 

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अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर लगभग दर्जनभर मांगों को पूरा करने का आग्रह किया है। महासंघ ने अपने पत्र में कहा है कि जब केंद्रीय बजट पेश हो, तो उसमें रक्षा कर्मचारियों की मांगों को लेकर सरकार का सकारात्मक रुख नजर आए। महासचिव सी. श्रीकुमार ने कहा, सरकार जो यूपीएस योजना लाई है, वह पुरानी पेंशन का स्थान नहीं ले सकती। उसके कई सारी कमियां हैं। सरकार को अपने बजट में पुरानी पेंशन बहाली करनी चाहिए। आयकर में दस लाख रुपये तक की छूट, असैनिक रक्षा कर्मियों के तीन लाख रिक्त पड़े पदों अविलंब भरना और पांच रक्षा मंत्रियों का आश्वासन, उन्होंने ऐसी कई दूसरी मांगें अपने पत्र में शामिल की हैं। 
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ऑल इंडिया एनपीएस एम्पलाइज फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मंजीत सिंह पटेल के अनुसार, यूपीएस को लेकर कर्मचारियों में रोष व्याप्त है। इस बाबत वित्त मंत्रालय को ज्ञापन सौंपा गया है। यूपीएस का नोटिफिकेशन जारी होने से पहले सरकार को कर्मचारियों की दो मांगों पर सहानुभूति से विचार करना होगा। पहली मांग है, जब एनपीएस में पहले से ही यह व्यवस्था है कि आप चाहें तो रिटायरमेंट पर 100 प्रतिशत फंड को एन्युटी के लिए निवेश कर सकते हैं। यानी इस मामले में एनपीएस और यूपीएस एक जैसे हो गए हैं। एनपीएस में पूरा निवेशित फंड आपके नॉमिनी को वापस मिल जाता है, लेकिन यूपीएस में वापस सरकार के पास चला जाएगा। इस लिहाज से भी नई पेंशन व्यवस्था में दोष है। जब तक सरकार, कर्मचारी के अंशदान को ब्याज सहित वापस नहीं करती, तब तक यूपीएस अस्वीकार है। कर्मचारियों की दूसरी मांग यह है कि 50 प्रतिशत पेंशन का प्रावधान 20 साल की नौकरी पर ही किया जाए। वीआरएस के लिए भी 20 साल की नौकरी को ही 50 प्रतिशत पेंशन का आधार माना जाए। उसी दिन से कर्मचारी को पेंशन मिले, तभी न्याय संभव है।
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श्रीकुमार के मुताबिक, 41 आयुद्ध कारखानों को निगमों में तबदील करना, वह पांच रक्षा मंत्रियों द्वारा दिए गए लिखित आश्वासनों का उल्लंघन है। अब सभी की नजरें केंद्रीय बजट 2025-26 पर टिकी हैं। एटक, एचएमएस, सीटू और इंटक सहित 10 प्रमुख केंद्रीय यूनियनों ने केंद्रीय बजट में शामिल करने के लिए अपने संयुक्त प्रस्ताव, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को दे दिए हैं। 

अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ ने केंद्रीय ट्रेड यूनियन द्वारा प्रस्तुत मांगों का समर्थन किया है। निर्मला सीतारमण को सौंपे गए अपने ज्ञापन में, एआईडीईएफ ने आयुध कारखानों के निगमीकरण को वापस लेने की बात कही है। श्रीकुमार का कहना है, हमारा अनुभव है कि सरकार, बजट में औद्योगिक घरानों, कॉरपोरेट्स और मल्टी-नेशनल कंपनियों के हितों का ध्यान रखती है। मजदूर वर्ग और ट्रेड यूनियनों की मांगों को हमेशा नजरअंदाज किया जाता है। सरकार भूल जाती है कि श्रमिक, धन निर्माता हैं। आम लोग आयकर और जीएसटी के माध्यम से सरकार के राजस्व में योगदान करते हैं, लेकिन बजट में उनके हितों का ख्याल नहीं रखा जाता। 

पहली मांग, आयुध कारखानों के निगमीकरण को वापस लिया जाए। राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा तैयारियों के हित में सभी सरकारी रक्षा उद्योगों को मजबूत करने की आवश्यकता है। रक्षा उत्पादन विभाग के अंतर्गत 41 आयुध कारखाने, देश की रक्षा का चौथा बल है। ये कारखानें, सभी प्रकार के गोला-बारूद / हथियार / हथियार / टैंक / उपकरण / सेना के आराम का सामान / पैराशूट / वाहन / बूट और टेंट आदि का निर्माण करते हैं। भारत ने अब तक जितने भी युद्ध सफलतापूर्वक लड़े हैं, उनमें आयुध निर्माणियों ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 223 साल पुराने इन कारखानों को 2021 में 7 गैर-व्यवहार्य कंपनियों में निगमित किया गया है। 

कर्मचारियों और इस महासंघ के विरोध के बावजूद सरकार ने यह निर्णय लिया था। इसके अलावा यह निर्णय 5 रक्षा मंत्रियों द्वारा दिए गए लिखित आश्वासनों का भी उल्लंघन है। आयुध कारखानों को निगमित करने का निर्णय, सरकार की विफलता है। एआईडीईएफ की मांग है कि सभी रक्षा उद्योग, केंद्र सरकार को अपने हाथ में रखने चाहिए। 

वर्तमान में रेलवे, रक्षा आदि सहित केंद्र सरकार के सभी विभागों में 13 लाख से अधिक पद खाली पड़े हैं। अकेले रक्षा क्षेत्र में 3 लाख से अधिक सिविलियन पद खाली हैं। इन सभी नौकरियों को अनुबंध और आकस्मिक के माध्यम से आउटसोर्स / निजीकरण किया जा रहा है। इन पदों को नियमित आधार पर भरा जाए। एनपीएस और यूपीएस को वापस लिया जाए। सीसीएस (पेंशन) नियम 1972, (अब 2021) के तहत गैर-अंशदायी परिभाषित और गारंटीकृत पेंशन को बहाल किया जाए। 

बजट के दौरान एनपीएस और यूपीएस को वापस लेने व सीसीएस (पेंशन) नियम 1972, (अब 2021) के तहत गैर अंशदायी परिभाषित और गारंटीकृत पेंशन को बहाल करने की घोषणा की जाए। केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए फेस्टिवल एडवांस की बहाली हो। राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) की एक बैठक में आधिकारिक पक्ष ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों को फेस्टिवल एडवांस बहाल करने पर सहमति व्यक्त की है। 2 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इस संबंध में कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। फेस्टिवल एडवांस केवल एक ब्याज मुक्त ऋण है, जिसे 10 किस्तों में वसूल किया जाना है। ऐसे में वित्त मंत्री से यह अनुरोध किया गया है कि राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) में कर्मचारी पक्ष की मांग है कि महोत्सव अग्रिम के रूप में 30,000/-प्रति वर्ष स्वीकृत करें। 

केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को सीजीएचएस सुविधाओं के संबंध में संसद की स्थायी समिति की सिफारिशों का कार्यान्वयन किया जाए। संसदीय स्थायी समिति ने राज्यसभा में केंद्र सरकार के कर्मचारियों, पेंशनभोगियों और उनके आश्रितों के लिए व्यापक चिकित्सा सुविधाओं पर 162वीं रिपोर्ट दी थी। एक बार रेफरल जारी होने के बाद, रोगी को निर्धारित उपचार प्रक्रिया/जांच से गुजरने के लिए सीजीएचएस डॉक्टर के पास दोबारा जाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। 

पैनल में शामिल अस्पतालों द्वारा लाभार्थियों से अधिक राशि वसूलने की शिकायतों का निपटान करना व सीजीएचएस दरों में संशोधन किया जाए। अतिरिक्त वेलनेस सेंटरों की स्थापना, डॉक्टरों की कमी की समस्या का समाधान करना, मरीजों के प्रति डॉक्टरों और सहयोगी कर्मचारियों के रवैये में सुधार करना व सभी प्रकार की दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। वेलनेस सेंटरों के बुनियादी ढांचे में सुधार, आवास वेलनेस सेंटर, नए वेलनेस सेंटरों की स्थापना के संबंध में मानदंडों में छूट और नए शहरों, विशेषकर बड़े शहरों के उपनगरों में तेजी से नए वेलनेस सेंटर स्थापित की जाएं। 

पेंशनभोगियों की शिकायतों पर संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों का कार्यान्वयन किया जाए। कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय पर संसदीय स्थायी समिति ने 10 दिसंबर, 2021 को पेंशनभोगियों की शिकायतों पर अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। संसदीय स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में बीमा राशि और मासिक के संबंध में 7वीं सीपीसी की सिफारिशों को लागू करने की सिफारिश की है। केंद्र सरकार के कर्मचारी समूह बीमा योजना में योगदान के लिए, समिति ने 65 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर 5%, 70 वर्ष की आयु तक पहुंचने पर 10% अतिरिक्त पेंशन प्रदान करने की सिफारिश की है। 75 वर्ष तक पहुंचने पर 15% अतिरिक्त पेंशन हो। पेंशनभोगियों के लिए निश्चित चिकित्सा भत्ता बढ़ाकर रु. 3,000/- प्रति माह करना। 12 वर्ष बाद परिवर्तित पेंशन की बहाली हो। 

राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) का कर्मचारी पक्ष वर्तमान 15 वर्षों के बजाय 12 वर्षों के बाद कम्यूटेड पेंशन की बहाली की मांग कर रहा है, क्योंकि सरकार ब्याज सहित 11 वर्षों के भीतर पूरी परिवर्तित पेंशन की वसूली कर लेती है। कई राज्य सरकारें 12 साल के बाद पेंशन के परिवर्तित हिस्से को बहाल कर रही हैं। पेंशनभोगियों से 15 वर्ष तक 40 प्रतिशत परिवर्तित पेंशन वसूलने का कोई औचित्य नहीं है। ऐसे में सरकार संराशीकृत पेंशन को संराशीकरण की तारीख से 12 वर्ष के बाद बहाल करने करे। केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के सेवा मामलों पर न्यायालय के निर्णयों का कार्यान्वयन नहीं हो पा रहा है। 


सरकार द्वारा कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के सेवा मामलों की वास्तविक शिकायतों पर विचार नहीं करने के कारण उन्हें न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। यदि कर्मचारी किसी विशेष मुद्दे पर न्यायालय में असफल हो जाता है तो सरकार सर्वमान्य रूप से यह कहकर निर्णय लागू कर देती है कि यह न्यायालय का निर्णय है। यदि कर्मचारी, मुकदमा जीत जाता है तो सरकार उसे सुप्रीम कोर्ट तक घसीटती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी पुनरीक्षण याचिकाएं दायर की जाती हैं। जब पुनरीक्षण याचिका भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज कर दी जाती है तो लाभ केवल अदालती मामले में याचिकाकर्ताओं तक ही सीमित रहता है। इसके परिणामस्वरूप एक ही निपटाए गए मामले के लिए मुकदमेबाजी की संख्या बढ़ जाती है। 

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