पंजाब: 30 साल में पहली बार सबसे कम सीटों पर लड़ेगी बसपा, हर चुनाव में गिरता रहा है वोट प्रतिशत
दोआबा और माझा इलाके में 13 और मालवा में 7 सीटों पर बसपा के उम्मीदवार चुनाव लड़ेंगे। बसपा का मानना है कि जिन सीटों पर दांव लगाया है, ये 20 'सुपर सॉलिड सीट' हैं...
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30 साल में यह पहला मौका होगा जब बसपा पंजाब में सिर्फ 20 सीटों पर ही चुनाव लड़ेगी। बसपा के रणनीतिकार इसे 'सुपर सॉलिड सीट' का चुनाव मान रहे हैं। बसपा के थिंक टैंक का मानना है कि महज 20 सीटों पर चुनाव लड़ कर न सिर्फ पूरा पंजाब बल्कि उत्तर प्रदेश समेत और दलित बाहुल्य इलाके के राज्य इससे साधे जाएंगे। दरअसल यह वह 20 सीटें हैं जिसमें पंजाब में सबसे ज्यादा दलित बाहुल्य इलाके शामिल हैं। बहुजन समाज पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के गठबंधन में तय यह हुआ है कि 20 सीटों पर बहुजन समाज पार्टी चुनाव लड़ेगी। दोआबा और माझा इलाके में बहुजन समाज पार्टी को 13 सीटें चुनाव लड़ने के लिए मिली हैं। जबकि सात सीटें मालवा इलाके से हैं।
बहुजन समाज पार्टी से जुड़े एक नेता का मानना है कि यह सीटें तो निश्चित तौर पर कम हैं लेकिन यह 'सुपर सॉलिड सीटें' हैं। उनका मानना है कि यह ऐसी सीटें हैं इसमें बहुजन समाज पार्टी ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतेगी और सरकार बनाएगी। बसपा कैडर से जुड़े नेता का मानना है अगर सब कुछ ठीक रहा तो बहुजन समाज पार्टी 1992 में हुए चुनाव के दौरान जीती गई नौ सीटों से भी ज्यादा सीटें इस बार जीतेगी। 1992 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी 105 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। उसका वोट प्रतिशत 16.3 फ़ीसदी से ज़्यादा था।
गठबंधन नहीं था अकाली से तब जीती थीं 9 सीटें
1992 में 105 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बसपा का तब अकाली से कोई गठबंधन नहीं था और नौ सीटें जीती थी। उसके बाद जब 1997 के चुनाव में अकाली ने बसपा के साथ गठबंधन किया और 67 सीटों पर बसपा चुनाव लड़ी। नतीजा आठ सीटों का नुकसान हुआ और तकरीबन नौ फ़ीसदी वोट प्रतिशत के नुकसान के साथ महज एक सीट ही बसपा को मिल सकी। 1997 के बाद होने वाले हर चुनाव में बसपा ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ती रही।
हर चुनाव में लगातार गिरता रहा बसपा का वोट प्रतिशत
बसपा 1992 से लगातार पंजाब में चुनाव लड़ती रही। ऐसा कोई भी विधानसभा चुनाव नहीं हुआ जिसमें बसपा ने चुनाव न लड़ा हो। लेकिन हैरानी की बात यही रही कि 1992 के चुनाव में सबसे ज्यादा वोट प्रतिशत पाने वाली पार्टी कभी भी अपने वोट प्रतिशत को संभाल नहीं सकी और नतीजा हर चुनाव में उसका वोट प्रतिशत कम होता चला गया। 1997 में हुए चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत महज 7.48 फीसदी रह गया। जबकि इस चुनाव में बसपा अकाली गठबंधन के साथ 67 सीटों पर चुनाव लड़ी थी।
उसके बाद सन 2002 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 100 सीटों पर चुनाव लड़ा। वोट प्रतिशत इस बार भी पिछले चुनाव की तुलना में घटकर 5.69 फीसदी रह गया और एक भी सीट तक नहीं जीत सकी। 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा 115 सीटों पर लड़ी। एक भी प्रत्याशी नहीं जीता और वोट प्रतिशत फिर पिछली बार की तुलना में कम होकर 4:13 फीसदी रह गया। पंजाब की चौदहवीं विधानसभा का चुनाव सन 2012 में हुआ। मायावती ने इस बार पूरे प्रदेश में 117 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए। बसपा का कोई प्रत्याशी चुनाव भी नहीं जीता और इस बार वोट प्रतिशत पिछले चुनाव की तुलना में दशमलव 16 फीसदी बढ़ा।
पिछली विधानसभा यानी कि 2017 के विधानसभा चुनावों में मायावती ने 111 सीटों पर चुनाव लड़ा। लेकिन इस चुनाव में राजनीतिक समीकरण कुछ इस तरीके से बिगड़े कि बसपा का वोट प्रतिशत 1:30 फ़ीसदी पर आकर सिमट गया। यह वही साल था जब अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने पंजाब में कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा सीटें जीती थीं और बसपा के वोटरों समेत समेत अकालियों के गढ़ में सेंध मारी थी।