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Mayawati: मायावती ने यूपी के लिए जातीय जनगणना का किया समर्थन, अखिलेश के हर कदम का कर रहीं काउंटर
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Mayawati, Akhilesh Yadav
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विस्तार
बसपा सुप्रीमो मायावती ने जातिगत जनगणना के माध्यम से एक बार फिर से अखिलेश यादव के उठाए जाने वाले 'फायदे के सियासी मुद्दे' पर बड़ा दांव चला है। मायावती ने तो बाकायदा उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में जाति की जनगणना कराए जाने का समर्थन करते हुए न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी को घेरा है बल्कि समाजवादी पार्टी की ओर से बिछाई जा रही सियासी चौसर में अपना भी दांव फिट कर दिया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मायावती के जातिगत जनगणना के समर्थन से पिछड़ों और अतिपिछड़ों में एक संदेश देने की कोशिश की जा रही है। ताकि वह अपने कोर वोट बैंक के साथ इस समुदाय को भी जोड़ कर सियासत की राह में बड़ी बिसात बिछा सकें।मायावती ने जातिगत जनगणना को लेकर भारतीय जनता पार्टी पर बड़ा सियासी हमला बोला है। मायावती ने सोशल मीडिया के माध्यम से कहा कि जब बिहार में जातिगत जनगणना को हाईकोर्ट की ओर से वैध करार दिया जा चुका है तो अब उत्तर प्रदेश समेत समूचे देश में जातीय जनगणना होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जातीय जनगणना के माध्यम से समाज के निचले और पिछले तबके के लोगों का सही आकलन हो सकेगा और उनको आगे बढ़ने के लिए सही योजनाएं मिल सकेंगी। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हरदीप सिंह कहते हैं कि मायावती ने जातीय जनगणना का समर्थन करके एक बार फिर उन लोगों को अपने साथ साधने की कोशिश की है जो मायावती के कोर वोट बैंक के साथ मिलकर बसपा के जनाधार को बढ़ाते हैं। हरदीप सिंह कहते हैं की यह और महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है क्योंकि समाजवादी पार्टी लगातार जातीय जनगणना का समर्थन करती आई है। वह कहते हैं कि मायावती को इस बात का अंदेशा बना रहता है कि कहीं जातीय जनगणना के मामले में समाजवादी पार्टी उनसे चार कदम आगे निकलकर उनके कोर वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी न कर दे। इसीलिए सियासत में मायावती का जातीय जनगणना का समर्थन राजनीतिक रूप से बड़ा महत्वपूर्ण हो जाता है।
बहुजन समाज पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए बहुजन समाज पार्टी ने जिस तरीके से पिछड़ों और अति पिछड़ों समेत दलितों के साथ मुस्लिम समुदाय को लेकर बड़ी रणनीति बनाई है वह गेम चेंजर साबित हो सकती है। उनका कहना है कि यही वजह है कि मायावती ने किसी भी राजनीतिक दल के साथ सीधे तौर पर कोई भी गठबंधन करने से मना कर दिया है। बहुजन समाज पार्टी के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि जातीय जनगणना के माध्यम से मायावती निश्चित तौर पर यह संदेश दे रही हैं कि वह समाज के सबसे पिछड़े और निचले पायदान पर बैठे हुए व्यक्ति के हित में आगे आ रही हैं। यह पूछने पर कि अखिलेश यादव भी जाति जनगणना की बात कर रहे हैं, तो क्या बसपा को यह डर सता रहा है कि कहीं उसके वोट बैंक में सपा सेंधमारी न कर ले, इसलिए मायावती ने आक्रामक होकर जाति जनगणना की बात की है, बहुजन समाज पार्टी के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि अखिलेश यादव के पास अब अपना कोई वोट बैंक नहीं है। उनका दावा है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में उनके खिसके हुए जनाधार और वोट प्रतिशत बताते हैं कि उनकी पार्टी इस वक्त कहां खड़ी है और उनके साथ जुड़े हुए लोग भी इस वक्त उनके साथ नहीं है। राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि जातिगत जनगणना से बहुजन समाज पार्टी एक नैरेटिव जरूर सेट करना चाह रही है। खासतौर से पिछड़ों और अति पिछड़ों में बहुजन समाज पार्टी या संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उनकी पार्टी उनके साथ खड़ी है।
सियासी जानकारों का मानना है कि जातिगत जनगणना के राजनीतिक मायने तो है ही। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक जटाशंकर सिंह कहते हैं कि बिहार में आरजेडी जेडीयू लोकसभा चुनावों से पहले जातिगत जनगणना कर वहां के सभी सियासी समीकरणों को अपने पक्ष में लाने की तैयारी कर रही है। जातीय जनगणना को लेकर कांग्रेस पार्टी के नेता भी मानते हैं कि ऐसा करने से कई तरह के सियासी समीकरण तो साधे ही जा सकेंगे। जटाशंकर सिंह कहते हैं कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दल ओबीसी वोटो को अपने पक्ष में करने के लिए वह सभी जतन कर रहे हैं। जिससे कि उनको सियासी लाभ मिल सके। इस कड़ी में जातीय जनगणना एक महत्वपूर्ण पक्ष बनकर सामने आ रहा है। वह मानते हैं कि बीते कुछ समय से जिस तरह से जातीय जनगणना को लेकर देश के अलग-अलग राज्यों में विपक्ष के सियासी दल मुखर होकर इसकी मांग कर रहे हैं वह भारतीय जनता पार्टी को कहीं ना कहीं असहज भी कर रहा है।