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बसपा की कहानी-2: आईएएस बनने की तैयारी कर रही मायावती कैसे सियासत में आईं? कांशीराम से पहले शिष्या बनीं सांसद
Tue, 22 Sep 2026 08:28 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 22 Sep 2026 08:28 AM IST
सार
BSP History Part-2: 'तुम्हारे पीछे आईएएस की लाइन लगा दूंगा...' कांशीराम के इस वादे ने बदल दी मायावती की जिंदगी। जानिए कैसे गुरु से पहले शिष्या संसद पहुंची।
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बसपा की कहानी पार्ट-2
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में हालिया समय में शुरू हुए अंदरूनी तनाव के बादल अभी पूरी तरह से नहीं छंटे हैं। बसपा के इतिहास को देखें तो गठन के बाद से उसके लिए स्थितियां कभी इतनी खराब नहीं रहीं, जितनी हालिया कुछ चुनावों में हैं। आज आपको हमारी खास सीरीज 'सियासी दलों का सफरनामा' की दूसरी कड़ी में हम बताएंगे कांशीराम के साथ मायावती के जुड़ने, बसपा के उदय और इसके एक के बाद एक चुनावों में छा जाने की कहानी...
यहां पढ़ें: बसपा की कहानी-1: एक निलंबन ने कांशीराम को कैसे वंचितों की लड़ाई का चेहरा बनाया? ऐसे अस्तित्व में आई पार्टी
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मायावती: शिक्षिका, जिनका प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना अधूरा रह गया
आज जिन मायावती को प्रेस कॉन्फ्रेंस और राजनीतिक रैलियों में देखा जाता है, उनका यह रवैया शुरुआत से ही उनकी शख्सियत की नींव बना रहा। 1956 में दिल्ली में एक गरीब दलित परिवार में जन्मीं मायावती के पिता प्रभुदास पोस्टल विभाग में क्लर्क थे, जबकि उनकी मां गृहिणी थीं। उत्तर प्रदेश सरकार की वेबसाइट के मुताबिक, मायावती के कुल छह भाई और एक बहन है।मायावती की आत्मकथा- अ ट्रैवेलॉग ऑफ माई स्ट्रगल रिडेन लाइफ एंड बीएसपी मूवमेंट में यूपी की पूर्व सीएम ने बताया है कि पिता की सरकारी नौकरी होने की वजह से उनके परिवार की हालत कुछ हद तक ठीक थी। खासकर उत्तर प्रदेश के गांव की तुलना में दिल्ली की झुग्गियों में जिंदगी ज्यादा बेहतर थी। हालांकि, बादलपुर गांव में उनके परिवार की छोटी तरक्की को भी गांववालों के बीच दुश्मनी के नजरिए से देखा जाता था। अपनी किताब में मायावती ने कहा है, "बहुत छोटी सी उम्र में ही मैंने अपनी पूरी ताकत से जाति व्यवस्था से नफरत करना सीख लिया था।"
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अपनी इसी किताब में वह खुद के साथ हुए सामाजिक भेदभाव और परिवार में हुए भेदभाव के बारे में भी बताती हैं। इसमें दिए एक वृतांत में मायावती बताती हैं- "बचपन में जब मैं अपनी माता के साथ बस में यात्रा कर रही होती तो लोग हमसे हमारी जाति पूछते और जब उन्हें पता चलता कि हम दलित हैं तो अपनी सीट बदल लेते।" अपने घर में हुए भेदभाव पर मायावती कहती हैं कि भाइयों का दाखिला अच्छे स्कूलों में किया गया और उन्हें प्राइवेट ट्यूशन दिलाई जाती, जबकि मुझे एक खराब सरकारी स्कूल में डाल दिया गया।"
इसके बावजूद मायावती ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के कालिंदी कॉलेज से बीए करने के बाद मेरठ यूनिवर्सिटी से बीएड किया। इसी डिग्री के जरिए उन्हें शिक्षक की नौकरी मिली। हालांकि, मायावती ने पढ़ाई आगे भी की और एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। बताया जाता है कि इस दौरान उन्होंने बाबासाहेब आंबेडकर की किताबों को गहराई से पढ़ा और इसने उन्हें दलित आंदोलन की ओर आकर्षित किया। यहीं से मायावती ने तय किया कि वे दिल्ली के स्कूल में पढ़ाते हुए भी भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी करेंगी और आईएएस बनकर जातीय उत्पीड़न और भेदभाव के खिलाफ लड़ेंगी।
इसके बावजूद मायावती ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के कालिंदी कॉलेज से बीए करने के बाद मेरठ यूनिवर्सिटी से बीएड किया। इसी डिग्री के जरिए उन्हें शिक्षक की नौकरी मिली। हालांकि, मायावती ने पढ़ाई आगे भी की और एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। बताया जाता है कि इस दौरान उन्होंने बाबासाहेब आंबेडकर की किताबों को गहराई से पढ़ा और इसने उन्हें दलित आंदोलन की ओर आकर्षित किया। यहीं से मायावती ने तय किया कि वे दिल्ली के स्कूल में पढ़ाते हुए भी भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी करेंगी और आईएएस बनकर जातीय उत्पीड़न और भेदभाव के खिलाफ लड़ेंगी।
बसपा सुप्रीमो मायावती।
- फोटो : अमर उजाला
एक भाषण जिसने इंदिरा गांधी को हराने वाले को चौंका दिया, कांशीराम को चकित किया
मायावती की इसी किताब में उस घटनाक्रम का जिक्र है, जिसने दलित आवाज के तौर पर स्थापित हो चुके कांशीराम को पहली बार मायावती के बारे में जानने के लिए मजबूर किया था। दरअसल, हुआ कुछ यूं कि 1977 में दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में जातिवादी व्यवस्था की बुराइयों पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसमें मुख्य वक्ता इंदिरा गांधी को हराने वाले जनता दल के नेता राज नारायण थे। मायावती के मुताबिक, इस कार्यक्रम में राजनारायण बार-बार दलितों के लिए हरिजन शब्द का इस्तेमाल कर रहे थे। इससे मायावती नाराज हो गईं और जब माइक्रोफोन उनके पास आया तो 21 वर्ष की रहीं मायावती ने कहा कि हरिजन भी एक जातिसूचक शब्द ही है। उन्होंने बेबाकी भरे अंदाज में कहा, "मुझे लगता है जाति की रुकावटों को खत्म करने के लिए हो रहा यह सम्मेलन अनुसूचित जाति के लोगों को गुमराह कर रहा है।" किताब में यूपी की पूर्व सीएम ने खुद कहा है कि जब उनका वक्तव्य खत्म हुआ तो लोग उनके समर्थन में नारे लगाने लगे।बताया जाता है कि इस घटनाक्रम की जानकारी जब कांशीराम के पास पहुंची तो वे आश्चर्यचकित हो गए। दरअसल, बहुजन समूहों में उस दौर में कुशल वक्ता और नेतृत्व में महिलाओं की काफी कमी थी। मायावती के बेबाक अंदाज और उनकी राजनीतिक जागरूकता के बारे में सुनकर कांशीराम ने उनसे मिलने की ठानी और एक दिन उनके घर पहुंच गए।
अजय बोस की किताब- बहनजी: अ पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ मायावती में बताया गया है कि कांशीराम ने मायावती से मिलने के बाद कहा कि अगर वह जातीय उत्पीड़न से लड़ना चाहती हैं तो प्रशासनिक सेवा से ज्यादा ताकत राजनीतिक सत्ता से मिलेगी। कांशीराम ने उन्हें कहा कि आज आप आईएएस बनना चाहती हैं, लेकिन मैं आपको ऐसा नेता बना सकता हूं, जिसके पीछे आईएएस की लाइन होगी। उन्होंने मायावती को इस बात के लिए मनाया कि यदि वह उनके मिशन से जुड़ जाती हैं तो उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने का उनका सपना पूरा हो सकता है। कांशीराम ने मायावती के पिता से अपील की कि वे मायावती को राजनीति में उतरने की छूट दें। हालांकि, तब पिता ने कांशीराम की सलाह नहीं मानी।
कांशीराम की जीवनी लिखने वाले बद्री नारायण की किताब- कांशीराम: लीडर्स ऑफ दलित में बताया गया है कि जब मायावती के पिता को कांशीराम का प्रस्ताव रास नहीं आया तो मायावती ने अपना घर छोड़ने का फैसला कर लिया और कांशीराम के दलितों को संगठित करने के लिए बनाए गए संगठन- बामसेफ के दिल्ली स्थित दफ्तर में ही रहने लगीं। जब कांशीराम ने अपना डीएस-4 संगठन बनाया तो मायावती को वहां भी अपने साथ ही रखा। बद्री नारायण की किताब कांशीराम: लीडर्स ऑफ दलित में कहा गया है कि चूंकि कांशीराम को मायावती की नेतृत्व क्षमताएं दिख चुकी थीं, इसलिए बामसेफ और डीएस-4 के दिनों में उन्होंने संगठन के सेकंड-इन-कमांड के तौर पर मायावती को आगे बढ़ाया। इसका इशारा बहुजन साज पार्टी बनने के बाद इसके चुनावी सफर में साफ दिखता भी है।
कांशीराम की जीवनी लिखने वाले बद्री नारायण की किताब- कांशीराम: लीडर्स ऑफ दलित में बताया गया है कि जब मायावती के पिता को कांशीराम का प्रस्ताव रास नहीं आया तो मायावती ने अपना घर छोड़ने का फैसला कर लिया और कांशीराम के दलितों को संगठित करने के लिए बनाए गए संगठन- बामसेफ के दिल्ली स्थित दफ्तर में ही रहने लगीं। जब कांशीराम ने अपना डीएस-4 संगठन बनाया तो मायावती को वहां भी अपने साथ ही रखा। बद्री नारायण की किताब कांशीराम: लीडर्स ऑफ दलित में कहा गया है कि चूंकि कांशीराम को मायावती की नेतृत्व क्षमताएं दिख चुकी थीं, इसलिए बामसेफ और डीएस-4 के दिनों में उन्होंने संगठन के सेकंड-इन-कमांड के तौर पर मायावती को आगे बढ़ाया। इसका इशारा बहुजन साज पार्टी बनने के बाद इसके चुनावी सफर में साफ दिखता भी है।
मायावती के पहले चुनाव का हाल।
- फोटो : अमर उजाला
जब पहली बार चुनाव में उतरी बसपा, कांशीराम बोले- हारने के लिए लड़ेगी पार्टी
1984 में जब कांशीराम ने बहुजनों को सत्ता में उतारने के मकसद से बहुजन समाज पार्टी का गठन किया तो उनका साफ मत था कि जब तक दलित और पिछड़े सत्ता के गलियारों तक मजबूती से नहीं पहुंचेंगे तब तक वे अपना हक हासिल नहीं कर पाएंगे। इस विचार के साथ बसपा ने अपना पहला चुनाव 1984 में लड़ा। पार्टी का गठन अप्रैल में हुआ था और उसे औपचारिक पंजीकृत चुनाव चिह्न नहीं मिला था, इसलिए उसके नेताओं ने निर्दलीय के तौर पर नामांकन भरा। कांशीराम ने इस चुनाव से पहले ही कह दिया था- बसपा पहला चुनाव हारने के लिए लड़ेगी, अगला नजर में आने के लिए और तीसरा जीतने के लिए।
मायावती ने बिजनौर से लड़ा था दूसरा चुनाव।
- फोटो : अमर उजाला
बसपा ने 1984 के चुनाव में ही मायावती को मुजफ्फरनगर जिले के अंतर्गत आने वाली कैराना लोकसभा सीट से उतार दिया। उन्हें 44,445 वोट भी मिले। हालांकि, कैराना से कांग्रेस के अख्तर हसन ने उन्हें बुरी तरह शिकस्त दी और वे तीसरे नंबर पर रहीं। हालांकि, बसपा को उसकी मेहनत के लिए मिले इतने वोटों से साफ हो गया कि पार्टी का भविष्य उज्ज्वल है। इसी के साथ बसपा ने 1985 में बिजनौर और फिर 1987 में हरिद्वार सीट से उपचुनाव के लिए उन्हें खड़ा किया। मायावती को जीत जरूर नहीं मिली, लेकिन उनके वोटों की संख्या लगातार बढ़ती रही। हरिद्वार में तो उन्हें 1.25 लाख से ज्यादा वोट मिले थे।
हरिद्वार लोकसभा सीट से रामविलास पासवान के खिलाफ लड़ी थीं मायावती।
- फोटो : अमर उजाला
...और बसपा को मिली पहली जीत, गुरु से पहले जीत गई शिष्या
1989 का चुनाव बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लिए पहली बड़ी सफलता का आधार बना। एक पंजीकृत (गैर-मान्यता प्राप्त) दल के तौर पर लड़ी बसपा ने कुल 245 उम्मीदवार उतारे थे।बसपा के लिए यह चुनाव कितने अहम थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी के जो तीन उम्मीदवार जीते, उनमें एक नाम कांशीराम की सेकंड इन कमांड मायावती का भी था। मायावती ने अपना पहला चुनाव बिजनौर सीट से जीता। उन्हें 1,83,189 वोट मिले और उन्होंने कांग्रेस की आशा चौधरी को 81,471 वोटों से शिकस्त दी। इतना ही नहीं उन्होंने हरिद्वार सीट से भी चुनाव लड़ा, लेकिन यहां वे 1,11,194 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं। यहां कांग्रेस और जनता दल के प्रत्याशी उनसे आगे थे।
1989 के चुनाव में बसपा का प्रदर्शन।
- फोटो : अमर उजाला
दूसरी तरफ बसपा प्रमुख कांशीराम ने भी दो सीटों से चुनाव लड़ा। एक उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से, जहां उन्होंने राजीव गांधी को चुनौती दी। राजीव गांधी ने यहां जीत हासिल की और उन्हें 2,71,407 वोट मिले। इसके मुकाबले कांशीराम महज 25,400 वोट ही हासिल कर तीसरे स्थान पर रहे। उनकी दूसरी सीट पूर्वी दिल्ली की रही। यहां भी उनका हाल अमेठी जैसा ही हुआ। कांग्रेस के एचकेएल भगत 3,59,602 वोट पाकर विजेता बने और कांशीराम 81,095 वोट हासिल कर तीसरे स्थान पर आए। निर्दलीय चांद राम को उनसे दोगुने से ज्यादा वोट मिले थे।
बसपा के जो दो अन्य उम्मीदवार जीते, उनमें एक पंजाब की फिलौर (एससी) सीट से हरभजन लाकड़ा थे। उधर दूसरे आजमगढ़ सीट से जीत हासिल करने वाले राम किशन रहे।
इस लिहाज से देखा जाए तो गुरु कांशीराम से पहले ही उनकी शिष्या मायावती को जीत मिल गई। चूंकि उत्तर प्रदेश और पंजाब में बसपा का जनाधार तेजी से बढ़ रहा था। इसलिए आगे पार्टी ने इन दोनों राज्यों पर अपना ध्यान खास केंद्रित किया। हालांकि, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश समेत कुछ अन्य राज्यों में भी बसपा ने आगे चुनाव लड़े और जीते, जिससे पार्टी को राष्ट्रीय दल की पहचान मिली।
बसपा के जो दो अन्य उम्मीदवार जीते, उनमें एक पंजाब की फिलौर (एससी) सीट से हरभजन लाकड़ा थे। उधर दूसरे आजमगढ़ सीट से जीत हासिल करने वाले राम किशन रहे।
इस लिहाज से देखा जाए तो गुरु कांशीराम से पहले ही उनकी शिष्या मायावती को जीत मिल गई। चूंकि उत्तर प्रदेश और पंजाब में बसपा का जनाधार तेजी से बढ़ रहा था। इसलिए आगे पार्टी ने इन दोनों राज्यों पर अपना ध्यान खास केंद्रित किया। हालांकि, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश समेत कुछ अन्य राज्यों में भी बसपा ने आगे चुनाव लड़े और जीते, जिससे पार्टी को राष्ट्रीय दल की पहचान मिली।
अगले अंक में पढ़ें: कैसे बढ़ी बसपा, उत्तर प्रदेश में सत्ता में आने और पार्टी के पतन की पूरी कहानी?
बसपा की कहानी के बाद 'सियासी दलों का सफरनामा' में हम आपको सपा, भाजपा और कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में मिली सफलता-असफलता के भी किस्से सुनाएंगे।
बसपा की कहानी के बाद 'सियासी दलों का सफरनामा' में हम आपको सपा, भाजपा और कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में मिली सफलता-असफलता के भी किस्से सुनाएंगे।