BSF: कमांडेंट का हुआ कोर्ट मार्शल, सेवा से किया बर्खास्त, बल में है फांसी और गोली मारने का भी प्रावधान
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विस्तार
सीमा सुरक्षा बल, जिसे 'भारत की पहली रक्षा पंक्ति' कहा जाता है, उसका आधार कठोर अनुशासन है। सेवा के नियम भी बहुत सख्त हैं। अगर कोई कार्मिक इन्हें तोड़ता है, तो उसे मौत की सजा तक दी जा सकती है। मौत की सजा कैसे दी जाए, इसके लिए फांसी और गोली मारने का प्रावधान है। बीएसएफ एक्ट-1968 में इस तरह की सजा के नियमों का उल्लेख है। सीमा सुरक्षा बल के सिलचर हेडक्वार्टर में तैनात कमांडेंट विनीत सहगल को बर्खास्त कर दिया गया है। सूत्रों का कहना है, उक्त अधिकारी पर कई गंभीर आरोप लगे थे। बल की अदालत के समक्ष अनुशासनहीनता के कई आरोप साबित हुए हैं।
कमांडेंट पर अनुशासनहीनता जैसे आरोप लगे थे
सूत्रों के मुताबिक, कमांडेंट विनीत सहगल पर अनेक आरोप लगाए गए थे। बीएसएफ की अदालत में पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें, आठवें और नौवें चार्ज में कमांडेंट को दोषी पाया गया। तीसरा चार्ज, चौथा चार्ज और छठे चार्ज में उन्हें दोषी नहीं माना गया। इससे पहले संबंधित अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। उसके बाद 'कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी' और 'रिकॉर्ड ऑफ एविडेंस' जैसी प्रक्रिया पूरी की गई। कमांडेंट पर अनुशासनहीनता जैसे कई आरोप लगे थे। सिलचर से पहले भी उनकी कुछ अफसरों से नहीं बनी। बीएसएफ में कमांडेंट बनने के लिए जितना समय लगता है, उन्हें उससे ज्यादा वक्त लगा था। अफसर पर ड्यूटी के दौरान लापरवाही और अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने जैसे आरोप भी लगे थे। हालांकि मौत की सजा देने का तरीका सीआरपीसी के सेक्शन 354 (5) में भी है, मगर यहां पर मौत की सजा की कार्रवाई फांसी के द्वारा पूरी की जाती है। इसमें भी गोली मारने का प्रावधान नहीं है। बल के पूर्व अफसर बताते हैं कि बीएसएफ में इन कठोर नियमों का समावेश 'सेना' की तर्ज पर किया गया है। ऐसे नियम, तीनों सेनाओं में होते हैं। ये अलग बात है कि केंद्र सरकार 'सीएपीएफ' को 'भारत के सशस्त्र बल' नहीं मानती, अपितु इन्हें पुलिस बलों में शामिल किया गया है। जब इन्हें सशस्त्र बल माना ही नहीं जाता, तो फिर कार्मिकों को सजा देने वाले नियम, भारतीय सेना जैसे क्यों हैं। यह एक्ट, बीएसएफ की वेबसाइट पर उपलब्ध है।
फांसी और गोली मारने तक की सजा का प्रावधान
'सीमा सुरक्षा बल' एक्ट के सेक्शन-64 में तीन तरह की अदालतों का जिक्र किया गया है। सुरक्षा बल अदालत में 'सामान्य सुरक्षा बल कोर्ट', पेटी सुरक्षा बल कोर्ट और समरी सुरक्षा बल कोर्ट शामिल हैं। सेक्शन-14 में उन अपराधों का जिक्र है, जो शत्रु से संबंधित हैं और उनमें दोषी को फांसी से लेकर गोली मारने तक की कठोर सजा देने का प्रावधान है। इनमें 11 ऐसे अपराध हैं, जिनमें मौत की सजा देने का नियम है। जैसे बल का कोई भी कार्मिक शर्मनाक तरीके से अपनी तैनाती वाली जगह या गार्ड ड्यूटी को छोड़ देता है, जिसकी सुरक्षा करना उसका काम है, तो उसे कठोर सजा दी जा सकती है। तीनों सेनाओं या बीएसएफ के किसी भी कार्मिक को दुश्मन के खिलाफ कार्रवाई करने से रोकना, अपने हथियार डाल देना या किसी अन्य तरीके से बुजदिली का प्रदर्शन करना, ऐसे मामलों में आरोप साबित होने पर कठोर सजा देने का नियम है। दुश्मन की पकड़ में आने के बाद अगर वह कार्मिक अपनी स्वेच्छा से दुश्मन की मदद करता है, दुश्मन के खिलाफ एक्टिव ऑपरेशन में यदि कोई कार्मिक संतरी की ड्यूटी पर है, वह सो जाता है या नशे की हालत में मिलता है, तो भी उसे मृत्यु दंड की सजा सुनाई जा सकती है।
इन अपराधों में भी दी जा सकती है मौत की सजा
सेक्शन-15 में दो तरह के अपराध हैं। किसी कार्मिक को जब युद्धबंदी बनाने के बाद छोड़ दिया जाता है और वह दोबारा से अपनी ड्यूटी ज्वाइन नहीं करता है, तो उसे 14 साल की सजा हो सकती है। दुश्मन के साथ कोई पत्राचार करना, आसूचना लीक करना या कोई दूसरा व्यक्ति लीक कर रहा है और उसे मालूम है, लेकिन वह बताता नहीं है, तो इस स्थिति में भी 14 साल की सजा का प्रावधान है। सेक्शन-17 में लिखा है कि बगावत की स्थिति में भी मौत की सजा दी जा सकती है। सेक्शन-18 में कहा गया है कि कोई कार्मिक भगोड़ा या भगोड़ा बनने का प्रयास करता है, तो उसे कठोर सजा मिल सकती है। सेक्शन-18ए में लिखा है कि अगर कोई कार्मिक, एक्टिव ड्यूटी के दौरान भगोड़ा हुआ है, तो उसे मौत की सजा हो सकती है। सेक्शन-62 में कोई कार्मिक छुट्टी लिए बिना गैर हाजिर '30 दिन' होता है, तो उसे तय प्रक्रिया के बाद भगोड़ा घोषित किया जा सकता है। सेक्शन-19 के तहत कोई कार्मिक बिना छुट्टी के अनुपस्थित है या छुट्टी से गैर हाजिर 'ओएसएल' है, परेड व अन्य दिनचर्या का हिस्सा नहीं है तो ऐसे मामले में तीन वर्ष की सजा का प्रावधान है।
अफसर के साथ अधीनस्थ वाला बर्ताव न करें तो भी सजा
सेक्शन-20 में लिखा है, यदि कार्मिक अपने बड़े अफसर को मार दे या उसे धमकी देता है, उसके साथ अधीनस्थ वाला व्यवहार न करे, तो उसे 14 साल की सजा मिल सकती है। सेक्शन-21 में कहा गया है कि कार्मिक अपने वरिष्ठ अधिकारी का आदेश न माने तो भी उसे सजा हो सकती है। मौखिक, सिग्नल या लिखित आदेश की अवहेलना होने पर 14 साल तक की सजा दी जा सकती है। सेक्शन 26 में कहा गया है कि यदि कार्मिक ड्यूटी पर है, चाहे नहीं भी है, लेकिन शराब पीये हुए है, तो भी उसे छह माह की सजा दिए जाने का प्रावधान है। सेक्शन-30 में अगर कर्मी पर चोरी का आरोप साबित होता है, तो उसे 10 साल की सजा दी जा सकती है, जबकि आईपीसी में सेक्शन-378 के तहत चोरी की सजा तीन साल रखी गई है। बीएसएफ एक्ट के सेक्शन-33 में लिखा है कि किसी कार्मिक ने सरकारी प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाया है, तो उसे दस साल तक की सजा हो सकती है। अगर उसने ये कार्य जानबूझकर नहीं किया है, तो ऐसे में पांच साल की सजा का नियम है। सेक्शन-33सी में लिखा है, कोई ऐसा जानवर जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी, कार्मिक को दी गई है और वह उसे पूरा नहीं कर पाता, तो ऐसे मामले में 10 साल की सजा का नियम है। संबंधित जीव की सुरक्षा नहीं करने, उसे मार देने, घायल करने, ले कर भाग जाने, उसे सही से नहीं रखने या खो देने की स्थिति में उक्त सजा दी सकती है।
दोषी को गोली मारी जाए या फांसी दी जाए
सेक्शन-40 के तहत, कार्मिक ऐसा कोई कार्य करता है, गुड ऑर्डर भंग करने या अनुशासन तोड़ने की श्रेणी में आता है, तो इसके लिए सात साल की सजा हो सकती है। सेक्शन-48 में 12 तरह की सजा की उल्लेख है। इसमें मौत की सजा के अलावा आजीवन कारावास, बर्खास्तगी, रैंक घटाना, बल की जेल में तीन माह की कैद, सेवाकाल कम करना और जुर्माना आदि दंड शामिल हैं। सेक्शन-108 में कहा गया है, सामान्य सुरक्षा बल कोर्ट जो भी सजा देता है, उसे केंद्र सरकार या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति कन्फर्म करेगा। सेक्शन-119 में कहा गया है कि अगर सुरक्षा बल कोर्ट, किसी को मौत की सजा सुनाता है, तो कोर्ट यह तय करेगा कि दोषी को गोली मारी जाए या फांसी दी जाए। खास बात है कि मौत की सजा देने का प्रावधान सीआरपीसी के सेक्शन-354 (5) में भी है, लेकिन यहां मौत की सजा की कार्रवाई फांसी के द्वारा पूरी होती है। आजाद भारत में गोली मारने का कोई प्रावधान नहीं रखा गया है।
बीएसएफ में कौन जारी करता है डेथ वारंट
सेक्शन-164 बीएसएफ रूल 1969 के तहत, जिस कार्मिक को किसी मामले में दोषी साबित होने पर गोली मारने का आदेश दिया गया है, उसका डेथ वारेंट कैसे जारी होगा, इस प्रक्रिया के बारे में बताया गया है। अगर किसी को फांसी की सजा मिली है, तो बल के डीजी द्वारा उस जेल अधीक्षक को वारंट जारी होगा, जहां पर वह सजा दी जा सकती है। सजा को केंद्र सरकार या उसका प्राधिकारी कन्फर्म करेगा। अगर गोली मारने का आदेश है, तो डीजी वारंट जारी करेगा। इसमें जिस डीआईजी के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत वह कार्मिक ड्यूटी दे रहा था, केंद्र सरकार की स्वीकृति के बाद डीआईजी को वारंट भेजा जाएगा। गोली मारने का बंदोबस्त वही डीआईजी करेगा। सेक्शन-68 में सामान्य सुरक्षा कोर्ट का विवरण है। इस कोर्ट में पांच अफसर होंगे। इनमें डीएसपी रैंक से नीचे कोई नहीं होगा। कोर्ट के सदस्यों के लिए डीएसपी रैंक में कम से कम तीन वर्ष की सेवा देना अनिवार्य है। इनमें चार कन्फर्म डीएसपी हों। सेक्शन-72 में सामान्य सुरक्षा कोर्ट की पावर का उल्लेख किया गया है। जिन पर ये एक्ट लागू होता है, उसका ट्रायल किया जा सकता है। हैरानी की बात है कि इस कोर्ट के किसी भी प्राधिकारी के लिए कानूनी योग्यता/प्रक्रिया जानना, अनिवार्य नहीं बनाया गया है, जबकि इस कोर्ट द्वारा मौत की सजा तक दी जा सकती है।
क्यों बनाए गए थे ऐसे सख्त नियम
बल के एक पूर्व अधिकारी बताते हैं, जब बीएसएफ का गठन हुआ तो उस वक्त देश में सुरक्षा के मोर्चे पर गंभीर स्थिति रही थी। बीएसएफ को सशस्त्र फोर्स मानकर, उसके लिए सेना की तर्ज पर नियम तैयार कर दिए गए। बल के लिए कठोर अनुशासन, यह पहली शर्त रखी गई। उस दौरान ड्यूटी भी बिल्कुल आर्मी की तर्ज पर थी। बल का ट्रेनिंग स्टैंडर्ड आर्मी वाला रखा गया था। यह देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला था। बॉर्डर पर स्थिति अनुकूल नहीं थी। ऐसे में कोई कार्मिक ये कहे कि मैं तो ड्यूटी पर नहीं जाना चाहता, तो काम कैसे चलता। युद्ध या वैसी ही किसी अन्य स्थिति में देश की सुरक्षा प्रथम रहती है। आज भी है और पहले भी रही है। युद्ध जैसे हालात में राष्ट्र के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। आर्मी के लिए जो नियम 1911, 1937 व 1950 में तय किए गए, वहीं से अधिकांश प्रावधान बीएसएफ के लिए उठा लिए गए। हालांकि आज तक किसी कार्मिक को 'गोली मारने की सजा' नहीं मिली है। मौत के दंड का प्रावधान आर्मी में भी है। बीएसएफ में एक केस में मौत की सजा दी गई थी, लेकिन वह भी लागू नहीं हो सकी। सैनिक मैदान न छोड़े, इसके लिए कठोर नियम बनाए जाते हैं। बल में ऐसी किसी कार्रवाई के दौरान लॉ अफसर नियुक्त होता है।