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पाकिस्तान पड़ा अलग-थलग: ग्लोबल साउथ का नायक बनकर उभरा भारत, ब्रिक्स में लूटी महफिल
सार
पाकिस्तान ने लगातार यह कोशिश की कि वह ईरान और अमेरिका के बीच पश्चिम एशिया संकट में मुख्य मध्यस्थ की भूमिका निभाए। क्षेत्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की उसकी ये महत्वाकांक्षा औंधे मुंह गिरी। इसके उलट ब्रिक्स में भारत ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। प्रधानमंत्री मोदी ने ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को मुखरता से रखा। साथ ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ सीमा पर शांति और स्थिरता का संदेश दिया। इसने साबित किया कि असली कूटनीतिक वजन किसके पास है।
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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के साथ ही भारत वैश्विक कूटनीति के केंद्र में मजबूती से स्थापित हो गया है। एक तरफ जहां पाकिस्तान की पश्चिम एशिया और कूटनीतिक मंचों पर मध्यस्थता की महत्वाकांक्षाएं परवान नहीं चढ़ सकीं, वहीं नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारत ने वैश्विक पटल पर एक ऐतिहासिक लकीर खींच दी। शिखर सम्मेलन के दौरान विपरीत विचारों वाले देशों के मौजूदगी के बावजूद दिल्ली घोषणा पत्र पर पूर्ण सहमति बनना भारत की बड़ी जीत है।
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इतना ही नहीं सम्मेलन के दौरान भारत की मध्यस्थता और कूटनीतिक स्वीकार्यता भी नए शिखर पर पहुंचती दिखाई दी। भारत की धरती पर ईरान और यूएई जैसे प्रतिद्वंद्वियों के शीर्ष नेताओं की आमने-सामने की मुलाकात होना इस बात का सीधा संकेत है कि वैश्विक शांति और संवाद के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है।
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पाकिस्तान की नाकामी
पाकिस्तान ने दिसंबर 2023 में आर्थिक संकट से उबरने और कूटनीतिक दायरा बढ़ाने के लिए ब्रिक्स की पूर्ण सदस्यता हेतु आवेदन किया था। ब्रिक्स में किसी भी नए देश को शामिल करने के लिए सभी मौजूदा सदस्य देशों की रजामंदी जरूरी है। हालांकि बीजिंग और मास्को के साथ इस्लामाबाद के संबंध ठीक हैं, लेकिन समूह में आम सहमति वाले नियम के कारण पाकिस्तान अब तक कामयाब नहीं हो सका है। इसीलिए पाकिस्तान ग्लोबल साउथ में अलग-थलग पड़ता दिखाई दे रहा है।
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भारत का उभरता कद
पाकिस्तान ने लगातार यह कोशिश की कि वह ईरान और अमेरिका के बीच पश्चिम एशिया संकट में मुख्य मध्यस्थ की भूमिका निभाए। क्षेत्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने और अपनी धाक जमाने की उसकी ये महत्वाकांक्षा औंधे मुंह गिरी। इसके उलट ब्रिक्स में भारत ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। ब्रिक्स के मंच पर प्रधानमंत्री मोदी ने ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को मुखरता से रखा। साथ ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय वार्ता में सीमा पर शांति और स्थिरता का संदेश दिया। इसने साबित किया कि असली कूटनीतिक वजन किसके पास है। इतना ही नहीं ब्रिक्स देशों ने पहलगाम आतंकी हमले की भी बेहद कड़ाई से निंदा की। साथ ही आतंक के वित्तपोषण और समूचे तंत्र के खिलाफ कार्रवाई पर बल दिया।
दिल्ली घोषणा पत्र
भारत की कूटनीतिक जीत पर सबसे बड़ी मुहर दिल्ली घोषणा पत्र पर तमाम देशों की एकमुश्त सहमति बनने से लगी। भूराजनीतिक तनावों और पश्चिमी देशों व रूस-चीन धड़े के बीच बढ़ती खाइयों के बावजूद सभी ब्रिक्स देशों का एक साझा दस्तावेज पर सहमत होना भारत की कुशल कूटनीति का बड़ा उदाहरण है। जबकि महज चंद महीने पहले मई में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में सदस्य देशों के मतभेद खुलकर सामने आए थे और संयुक्त घोषणा पत्र जारी नहीं हो सका था। इसकी बजाय भारत को अध्यक्षीय बयान जारी करना पड़ा था। जबकि भारत की अध्यक्षता में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने न सिर्फ मतभेद दरकिनार करते हुए दिल्ली घोषणा पत्र पर सहमति बनाई, बल्कि इसमें आतंकवाद, आर्थिक सुधार, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और आपूर्ति श्रृंखला जैसे मुद्दों पर भारत के नजरिये को भी प्रमुखता से जगह मिली। यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय विदेश नीति की जीत के तौर पर देखा जा सकता है।
प्रतिद्वंद्वियों का मिलन
भारत की पहल और तटस्थ छवि का ही असर था कि पश्चिम एशिया के दो धुर विरोधी देशों- ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई)- के प्रतिनिधि आपस में मिले और बातचीत की। मध्य पूर्व के तनावपूर्ण माहौल के बीच इन दोनों प्रतिद्वंद्वियों का भारत की जमीन पर मिलना दर्शाता है कि भारत वैश्विक शांति, संवाद और मध्यस्थता के प्रभावी केंद्र के तौर पर उभर रहा है। दुनिया के देश भारत की निष्ठा व प्रतिबद्धता पर भरोसा कर रहे हैं।