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बड़े प्रोजेक्ट्स बिना एनओसी नहीं इस्तेमाल कर सकेंगे बोरिंग का पानी
Sun, 11 Nov 2018 06:43 PM IST
Trainee Trainee
हरेन्द्र, नई दिल्ली
हरेन्द्र, नई दिल्ली
Published by: Trainee Trainee
Updated Sun, 11 Nov 2018 06:43 PM IST
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लगातार हो रहे भूगर्भ जल के दोहन से गिरते जलस्तर को रोकने के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने कमर कसनी शुरू कर दी है। मंत्रालय ने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए ‘अनापत्ति प्रमाणपत्र’ लेना अनिवार्य बना दिया है। यह प्रमाणपत्र केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण ही जारी करेगा। मंत्रालय का यह आदेश एनजीटी की खिंचाई के बाद आया है, जिसमें आदेश की अवमानना मामले पर सुनवाई 12 नवंबर को होनी है।
केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने नवंबर माह की शुरूआत में आधिकारिक आदेश जारी कर कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलेपमेंट से जुड़े प्रोजेक्ट्स को पर्यावरण मंजूरी देने से पहले केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेना अनिवार्य होगा। मंत्रालय का कहना है कि हाउसिंग सोसाइटीज, पुल, एक्सप्रेस-वे जैसी तमाम आधारभूत योजनाओं में भूगर्भ जल का जमकर इस्तेमाल किया जाता है।
अपने आदेश में मंत्रालय ने राज्य सरकारों से भी मामले को गंभीरता से लेने की अपील करते हुए कहा है कि प्रमाणपत्र की अनुपस्थिति में वे भी परियोजना को मंजूरी देने से बचें। आदेश के मुताबिक इन परियोजनाओं को भूजल का इस्तेमाल करने से पहले पहले केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण या राज्य भूजल प्राधिकरण से संपर्क करना होगा और सर्टिफिकेट हासिल करने के बाद मंत्रालय ऐसी योजनाओं को पर्यावरण मंजूरी जारी करेगा।
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साथ ही, मंत्रालय ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी निर्देश जारी किए हैं। अपने आदेश में कहा है कि संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी सीजीडब्ल्यूए से अनुमति प्राप्त होने तक परियोजना को शुरु करने के लिए अपनी सहमति नहीं जताएगा। केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण कके आंकड़ों के मुताबिक देश में सालाना कुल 433 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) भूजल संसाधन का पुनर्नवीनीकरण होता है। जबकि वार्षिक भूजल उपलब्धता 398 बीसीएम है, जिसका 62 फीसदी तकरीबन 245 बीसीएम हर साल इस्तेमाल होता है।
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केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने नवंबर माह की शुरूआत में आधिकारिक आदेश जारी कर कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलेपमेंट से जुड़े प्रोजेक्ट्स को पर्यावरण मंजूरी देने से पहले केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेना अनिवार्य होगा। मंत्रालय का कहना है कि हाउसिंग सोसाइटीज, पुल, एक्सप्रेस-वे जैसी तमाम आधारभूत योजनाओं में भूगर्भ जल का जमकर इस्तेमाल किया जाता है।
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अपने आदेश में मंत्रालय ने राज्य सरकारों से भी मामले को गंभीरता से लेने की अपील करते हुए कहा है कि प्रमाणपत्र की अनुपस्थिति में वे भी परियोजना को मंजूरी देने से बचें। आदेश के मुताबिक इन परियोजनाओं को भूजल का इस्तेमाल करने से पहले पहले केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण या राज्य भूजल प्राधिकरण से संपर्क करना होगा और सर्टिफिकेट हासिल करने के बाद मंत्रालय ऐसी योजनाओं को पर्यावरण मंजूरी जारी करेगा।
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साथ ही, मंत्रालय ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी निर्देश जारी किए हैं। अपने आदेश में कहा है कि संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी सीजीडब्ल्यूए से अनुमति प्राप्त होने तक परियोजना को शुरु करने के लिए अपनी सहमति नहीं जताएगा। केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण कके आंकड़ों के मुताबिक देश में सालाना कुल 433 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) भूजल संसाधन का पुनर्नवीनीकरण होता है। जबकि वार्षिक भूजल उपलब्धता 398 बीसीएम है, जिसका 62 फीसदी तकरीबन 245 बीसीएम हर साल इस्तेमाल होता है।
वहीं यमुना जिए अभियान के संयोजक और पूर्व आईएफएस अधिकारी मनोज कुमार मिश्रा ने सरकार के इस कदम को बिल्कुल सही बताया है। उनका कहना है कि सरकार के इस कदम से समस्या तो हल तो नहीं होगी, लेकिन इससे जवाबदेही और जिम्मेदारी तय होगी। आज के वक्त में कौन कितना भूजल प्रयोग कर रहा है इसके कोई रिकॉर्ड या आंकड़े सरकार के पास नहीं हैं। सरकार को चाहिए कि एनओसी में भूजल के सीमित उपयोग का भी प्रावधान होना चाहिए। उनका कहना है कि सरकार को इसके साथ निगरानी की व्यवस्था भी करनी चाहिए और नियम कानूनों को ताक पर रखने वाले प्रोजेक्ट्स के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए।
इससे पहले 24 अक्तूबर को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने भूजल उपलब्धता मामले की सुनवाई के दौरान केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण की जमकर खिंचाई की थी। एनजीटी ने आदेश का पालन नहीं करने पर अवमानना का मामला मानते हुए कार्रवाई करने की चेतावनी दी थी और जल संसाधन मंत्रालय के सचिव को 12 नवंबर को पेश होने का आदेश दिया था।
वहीं सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग ने भी इस साल जून में 'समग्र जल प्रबंधन सूचकांक' रिपोर्ट जारी करते हुए कहा था कि साल 2020 तक दिल्ली, बेंगलूरु, हैदराबाद और चेन्नई समेत 21 शहरों में भूजल पूरी तरह समाप्त हो जाएगा और इन शहरों के 10 करोड़ लोगों को पीने का पानी मुहैया नहीं होगा। नीति आयोग के मुताबिक 75 फीसदी घरों में पीने के पानी नहीं है, वहीं 70 फीसदी पानी प्रदूषित है। रिपोर्ट में जिक्र था कि इस समय देश की 60 करोड़ आबादी जल समस्या से जूझ रही है, और हर साल करीब दो लाख लोग साफ पानी की कमी के चलते मौत के शिकार हो जाते हैं।
इससे पहले 24 अक्तूबर को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने भूजल उपलब्धता मामले की सुनवाई के दौरान केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण की जमकर खिंचाई की थी। एनजीटी ने आदेश का पालन नहीं करने पर अवमानना का मामला मानते हुए कार्रवाई करने की चेतावनी दी थी और जल संसाधन मंत्रालय के सचिव को 12 नवंबर को पेश होने का आदेश दिया था।
वहीं सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग ने भी इस साल जून में 'समग्र जल प्रबंधन सूचकांक' रिपोर्ट जारी करते हुए कहा था कि साल 2020 तक दिल्ली, बेंगलूरु, हैदराबाद और चेन्नई समेत 21 शहरों में भूजल पूरी तरह समाप्त हो जाएगा और इन शहरों के 10 करोड़ लोगों को पीने का पानी मुहैया नहीं होगा। नीति आयोग के मुताबिक 75 फीसदी घरों में पीने के पानी नहीं है, वहीं 70 फीसदी पानी प्रदूषित है। रिपोर्ट में जिक्र था कि इस समय देश की 60 करोड़ आबादी जल समस्या से जूझ रही है, और हर साल करीब दो लाख लोग साफ पानी की कमी के चलते मौत के शिकार हो जाते हैं।