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Bombay High Court: गर्भ-काल पूरा हो या समय पूर्व जन्म, बीमा में कवर होंगे दोनों नवजात

Thu, 02 Mar 2023 06:38 AM IST
वीरेंद्र शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: वीरेंद्र शर्मा Updated Thu, 02 Mar 2023 06:38 AM IST
सार

बीमा कंपनी न्यू इंडिया एश्योरेंस द्वारा जुड़वां बच्चों के जन्म के समय उनके इलाज पर खर्च 11 लाख रुपये का मेडिक्लेम नकारने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की। कंपनी ने कहा था कि शिशु समय से पूर्व जन्मे, यह बीमा शर्तों के विरुद्ध है।

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Bombay High Court Whether full term or premature birth insurance will cover both newborns
bombay high court

विस्तार

निर्धारित गर्भ काल पूरा कर जन्मा शिशु और समय से पूर्व जन्मा शिशु, दोनों नवजात शिशु ही कहलाएंगे। इन्हें अलग-अलग नहीं समझा जा सकता।
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बीमा कंपनी न्यू इंडिया एश्योरेंस द्वारा जुड़वां बच्चों के जन्म के समय उनके इलाज पर खर्च 11 लाख रुपये का मेडिक्लेम नकारने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की। कंपनी ने कहा था कि शिशु समय से पूर्व जन्मे, यह बीमा शर्तों के विरुद्ध है। हाईकोर्ट ने कंपनी को निर्देश दिया कि वह इन बच्चों की मां को चार हफ्ते में 11 लाख रुपये चुकाए। 5 लाख रुपये अतिरिक्त भी दे क्योंकि बीमा नीति की गलत व्याख्या कर महिला को परेशान किया गया। जस्टिस गौतम पटेल और जस्टिस नीला गोखला की पीठ ने कहा कि कंपनी का बचाव अतार्किक और बीमा नीति की बुनियादी नैतिकता के विपरीत था। पेशे से वकील संबंधित महिला ने अपनी याचिका में बताया था कि उसने साल 2007 में कंपनी से 20 लाख रुपये की दो मेडिक्लेम बीमा पॉलिसी ली थीं। इनके प्रीमियम नियमित रूप से चुकाती थी। सितंबर 2018 में उसने 30 हफ्ते की गर्भावस्था के बाद जुड़वां बच्चों को जन्म दिया। उसके मामले में आपात स्थिति को देखते हुए सर्जरी से प्रसव करवाया गया था। नवजात शिशुओं की जीवन-रक्षा के लिए उन्हें एनआईसीयू में रखा गया। डिस्चार्ज होने पर अस्पताल ने 11 लाख रुपये बिल दिया, इसे महिला ने बीमा कंपनी के पास क्लेम पास करने के लिए भेजा। 

किसने क्या कहा
महिला :  बीमा कंपनी का रवैया आईआरडीएआई की गाइडलाइन के खिलाफ है। उसने बीमा नीति की जो परिभाषा दी, वह समझ से परे है। नवजात शिशु और समय पूर्व शिशु में भला क्या फर्क है?
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कंपनी का तर्क : चूंकि शिशु समय से पूर्व जन्मे, इसलिए उन्हें स्वास्थ्य समस्याएं हुईं। अगर वे गर्भकाल पूर्ण करके जन्मे लेते तो ऐसा न होता। इसलिए दावा स्वीकार नहीं किया गया।
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हाईकोर्ट के सख्त शब्द 
कंपनी के तर्क कानून के विपरीत, मनमाने और अतार्किक हैं। बीमा नकारने के लिए नवजात शिशु में ऐसा वर्गीकरण आधारहीन है। एक युवा कामकाजी महिला को मुकदमे की सुनवाई और उतार-चढ़ाव से गुजरना पड़ा।
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