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बोफोर्स घोटाला: CBI ने नए सिरे से जांच की मांगी अनुमति, 13 साल बाद फिर कोर्ट पहुंची एजेंसी
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Updated Sun, 04 Feb 2018 12:37 AM IST
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13 साल पुराने 64 करोड़ दलाली संबंधी बोफोर्स घोटाले की दोबारा जांच की मांग को लेकर सीबीआई ने अदालत में याचिका दायर की है। सीबीआई ने नए सबूतों के आधार पर जांच की इजाजत मांगी है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 17 फरवरी को मुकर्रर की है।
तोप खरीद में 64 करोड़ की दलाली का है आरोप
तीस हजारी अदालत के चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट आशु गर्ग के समक्ष 1 फरवरी को दायर याचिका में सीबीआई का दावा है कि उसके पास कुछ ऐसे दस्तावेज हैं, जो इस मामले में बेहद अहम हैं। इससे पहले सीबीआई ने इस मामले में 2005 में दिल्ली हाईकोर्ट के केस बंद करने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी है।
यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सीबीआई ने ऐसा अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल की उस सलाह के बाद किया है, जिसमें उन्होंने 13 साल पहले बंद मामले को फिर से शुरू करना सीबीआई की साख के लिए घातक बताया था।
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सीबीआई ने अंतरराष्ट्रीय प्राइवेट इन्वेस्टीगेशन एजेंसी प्रमुख माइकल हर्शमैन के नए खुलासों के बाद नए सिरे से जांच की अनुमति मांगी है। इस एजेंसी को वीपी सिंह सरकार ने बोफोर्स घोटाले की जांच की जिम्मेदारी दी थी। बोफोर्स तोप बनाने वाली स्वीडन की कंपनी पर आरोप था कि उसने 1473 करोड़ रुपये की इस डील को पाने के लिए 1986 में राजीव गांधी सरकार के दौरान 64 करोड़ रुपये की घूस दी थी। हर्शमैन ने दावा किया है कि उसके पास स्विस अकाउंट मांट ब्लैंक की जानकारी है, जिसमें घूस की रकम को जमा किया गया था।
2005 में दिल्ली हाईकोर्ट ने घोटाले के आरोपी हिंदुजा भाइयों को बरी कर दिया था इसके बाद सीबीआई ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी थी। गौरतलब है कि बोफोर्स तोपों की खरीद में दलाली का खुलासा अप्रैल 1987 में स्वीडन रेडियो ने किया था। रेडियो के मुताबिक, बोफोर्स कंपनी ने भारत के बड़े राजनेताओं और सेना के अधिकारियों को रिश्वत दी थी।
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तोप खरीद में 64 करोड़ की दलाली का है आरोप
तीस हजारी अदालत के चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट आशु गर्ग के समक्ष 1 फरवरी को दायर याचिका में सीबीआई का दावा है कि उसके पास कुछ ऐसे दस्तावेज हैं, जो इस मामले में बेहद अहम हैं। इससे पहले सीबीआई ने इस मामले में 2005 में दिल्ली हाईकोर्ट के केस बंद करने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी है।
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यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सीबीआई ने ऐसा अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल की उस सलाह के बाद किया है, जिसमें उन्होंने 13 साल पहले बंद मामले को फिर से शुरू करना सीबीआई की साख के लिए घातक बताया था।
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सीबीआई ने अंतरराष्ट्रीय प्राइवेट इन्वेस्टीगेशन एजेंसी प्रमुख माइकल हर्शमैन के नए खुलासों के बाद नए सिरे से जांच की अनुमति मांगी है। इस एजेंसी को वीपी सिंह सरकार ने बोफोर्स घोटाले की जांच की जिम्मेदारी दी थी। बोफोर्स तोप बनाने वाली स्वीडन की कंपनी पर आरोप था कि उसने 1473 करोड़ रुपये की इस डील को पाने के लिए 1986 में राजीव गांधी सरकार के दौरान 64 करोड़ रुपये की घूस दी थी। हर्शमैन ने दावा किया है कि उसके पास स्विस अकाउंट मांट ब्लैंक की जानकारी है, जिसमें घूस की रकम को जमा किया गया था।
2005 में दिल्ली हाईकोर्ट ने घोटाले के आरोपी हिंदुजा भाइयों को बरी कर दिया था इसके बाद सीबीआई ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी थी। गौरतलब है कि बोफोर्स तोपों की खरीद में दलाली का खुलासा अप्रैल 1987 में स्वीडन रेडियो ने किया था। रेडियो के मुताबिक, बोफोर्स कंपनी ने भारत के बड़े राजनेताओं और सेना के अधिकारियों को रिश्वत दी थी।