दिल्ली चुनाव के बाद 'अपने' राज्यों में सर्जिकल स्ट्राइक करेगी भाजपा, 'कसौटी' पर कसी जाएंगी सरकारें
- सीएम की अलोकप्रियता का खामियाजा नहीं भुगतना चाहती पार्टी
- लोकप्रियता और कामकाज की कसौटी पर कसी जाएंगी सरकारें
- लोकसभा के मुकाबले विधानसभा चुनाव में वोट में भारी गिरावट से पार्टी सतर्क
- दो-तीन सालों में चुनाव का सामना करने वाले राज्यों पर खास नजर
- रघुवर जैसे अलोकप्रिय सीएम पर गिरेगी गाज
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लोकसभा चुनाव में दमदार प्रदर्शन के बावजूद विधानसभा चुनावों में लचर प्रदर्शन से सतर्क भाजपा दिल्ली विधानसभा चुनाव बाद पार्टीशासित राज्यों में राजनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक करेगी। खुद पीएम नरेंद्र मोदी और पार्टी नेतृत्व चुनाव बाद पार्टी और गठबंधन वाले राज्यों की सरकारों को लोकप्रियता और प्रदर्शन के पैमाने पर सख्ती से परखेंगे। इस पैमाने पर खरा नहीं उतरने वाले सीएम, डिप्टी सीएम और वरिष्ठ मंत्रियों को हटाने का सिलसिला शुरू किया जाएगा। पार्टी अब सीएम और राज्य सरकारों की अलोकप्रियता का सियासी खामियाजा नहीं भुगतना चाहती।
इस क्रम में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में पार्टीशासित राज्यों में केंद्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन की समीक्षा शुरू भी कर दी गई है। चुनाव बाद पार्टी स्तर पर दूसरे मोर्चे पर प्रदर्शन और सरकार के साथ-साथ सीएम, डिप्टी सीएम और वरिष्ठ मंत्रियों की लोकप्रियता को आंका जाएगा। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा और पीएम ने पार्टीशासित राज्यों के मुखिया को कामकाज को ले कर फ्री हैंड दिया था। कई राज्यों में आपसी कलह के बावजूद सीएम को उसके पद पर बनाए रखा गया। इसके बावजूद राज्यों में विधानसभा चुनाव में लचर प्रदर्शन के बाद इस आशय का फैसला लिया गया।
पांच राज्य रडार पर
इस मामले में पांच राज्य पार्टी नेतृत्व के रडार पर है। सूत्रों ने बताया कि एक राज्य के सीएम ने मुख्यमंत्रियों की बैठक के दौरान पीएम के सामने ओडीएफ के मामले में गलत तथ्य पेश किए। पीएम के निर्देश पर पार्टी के एक वरिष्ठ महासचिव ने जब क्रॉस चेक किया तो तथ्य गलत पाए गए। उक्त राज्य के सीएम को पीएम ने अगस्त 2018 से अब तक मिलने का समय नहीं दिया है।
इस राज्य में सीएम की विधायकों-संगठन के बीच छत्तीस का आंकड़ा है। इसी प्रकार हालिया विधानसभा चुनाव में प्रदर्शन के बाद पीएम एक अन्य राज्य के सीएम के प्रदर्शन और कामकाज से खुश नहीं हैं। उक्त राज्य में सीएम और एक वरिष्ठ मंत्री के बीच ठनी हुई है। जबकि दो अन्य छोटे राज्यों में दो साल बाद चुनाव हैं। इन राज्यों के सीएम और सरकार के कामकाज की सख्ती से समीक्षा की जाएगी।
क्यों चिंतित है पार्टी
दरअसल लोकसभा चुनाव से पहले छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश और लोकसभा के चुनाव के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में स्थानीय नेतृत्व की अलोकप्रियता पार्टी पर भारी पड़ गई। पार्टी चुनाव से पहले जिन छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश की सत्ता गंवाई, वहां लोकसभा चुनाव में करीब करीब क्लीन स्वीप किया।
चुनाव बाद लोकसभा की तुलना में झारखंड और हरियाणा में क्रमश: 18 और 22 फीसदी वोट घटे। जबकि महाराष्ट्र में 8 फीसदी वोट कम हो गए। प्रदर्शन की समीक्षा में पाया गया कि ऐसा इन राज्यों के नेतृत्व की अलोकप्रियता और अकर्मण्यता के कारण हुआ। अब पार्टी नहीं चाहती कि आने वाले दो-तीन सालों में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव है, वहां पार्टी को स्थानीय नेतृत्व के कारण सियासी झटका सहना पड़े।
दोनों चुनाव के बाद बड़ा अंतर
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने दम पर पहली बार बहुमत हासिल करने वाली भाजपा के वोट इसके तत्काल बाद हुए विधानसभा चुनाव में भी कम हुए थे। हालांकि यह गिरावट महज 5 फीसदी के आसपास थी। मगर इस लोकसभा चुनाव के बाद वोट प्रतिशत में 22 फीसदी तक की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में केंद्रीय नेतृत्व की ओर से पांच साल तक लगातार मिले फ्री हैंड के बावजूद सीएम अपना जादू नहीं दिखा सके। उल्टे सीएम की नकारात्मक छवि का पार्टी को नुकसान झेलना पड़ गया।
सभी राज्यों पर अलग-अलग होगा मंथन
मंथन पार्टी और गठबंधनशासित सभी 16 राज्यों पर होगा। गठबंधन शासित राज्यों में डिप्टी सीएम और वरिष्ठ मंत्रियों की समीक्षा होगी तो पार्टीशासित राज्यों में सीएम और डिप्टी सीएम की। इस दौरान बेहतर प्रदर्शन और हालात संभालने की गुंजाइश पर भी मंथन होगा।