BJP: मध्यप्रदेश को आज मिलेगा भावी मुख्यमंत्री, राजस्थान में वसुंधरा राजे नहीं खोल रही हैं पत्ते
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विस्तार
चुनाव नतीजे आने के बाद से प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से रणनीतिक दूरी बना रखी है। वसुंधरा दिल्ली आई थीं और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिलकर लौट गईं। मीडिया को सधा बयान और मिजाज के अनुरूप फोटो खींचने का अवसर दिया। खुद को पार्टी का अनुशासित सिपाही बताया। जयपुर के करीबी कहते हैं कि राजनीति में धुरंधर हो चुकी वसुंधरा सभी पत्ते सही और पार्टी के उचित मंच पर खोलना चाहती हैं। वह अभी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के सामने उतने ही पत्ते खोल रही हैं, जितने में सबकुछ अनुकूल हो जाए। यही भाजपा उनके (वसुंधरा के) साथ भी कर रही है। हालांकि मंगलवार शाम तक राजस्थान से कुछ अच्छी खबर आने की उम्मीद है।
मध्यप्रदेश के बारे में खबर है कि अपने अंदाज में शालीनता से भरी कूटनीति के सहारे पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आधा सफर तय कर लिया है। वह छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह से अधिक फायदे में रहने वाले हैं। मध्यप्रदेश में आज शाम तक भावी मुख्यमंत्री का चेहरा तय हो जाएगा। इसकी भी संभावना है कि केंद्र की तरफ से बंद लिफाफे में गए नाम को अवसर न मिले या इसमें बदलाव की स्थिति आए।
पहले बात राजस्थान की, आखिर किसके सिर पर सजेगा ताज?
दीन दयाल उपाध्याय स्थित भाजपा मुख्यालय में एक चर्चा आम है कि छत्तीसगढ़ को पुराना नाम नहीं मिला। मध्यप्रदेश और राजस्थान को भी मिलने की संभावना न के बराबर है। अंतिम समय में कुछ हो जाए तो कहना मुश्किल। यह सोच तीनों राज्यों में चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले से लेकर अभी तक मजबूती से अपनी जगह बनाए है। एक सूचना और मजबूती के साथ है कि छत्तीसगढ़ की तरह ही दोनों राज्यों में होने वाला मुख्यमंत्री का चेहरा चौंकाएगा। मीडिया की सोच से अलग होगा। यह प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और भाजपा अध्यक्ष के पिछले निर्णयों के आधार पर है। इसके मायने यही हैं कि शिवराज हों या वसुंधरा, चाहे जितना जोर लगा लें, अंत में मुख्यमंत्री बनने के लिए मन मसोस कर रह जाना पड़ेगा। भाजपा के एक प्रवक्ता दार्शनिक होकर कहते हैं कि कर्म पर ही तो अधिकार है। फल व्यक्ति के अधिकार में नहीं है। इसके बाद वह धीमे से मुस्कराते हैं और फिर कहते हैं कि मनुष्य अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए सभी संभव प्रयास करता है। लेकिन उसे अपने प्रारब्ध का पता नहीं होता। इसे बस भुगतना होता है। सूत्र का यह दर्शन राजस्थान के संदर्भ में चर्चा के दौरान मिला। कुल मिलाकर भाजपा के नेता यही कह रहे हैं इंतजार कीजिए। समय आएगा, सब बताया जाएगा।
कैसे-कैसे बदल रहे हैं घटनाक्रम
तीन दिसंबर को चुनाव का नतीजा आया। भाजपा ने राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में पूर्ण बहुमत हासिल किया। रमन सिंह संयमित रहे। शिवराज सिंह चौहान ने अपने अंदाज में संदेश दिया। वसुंधरा राजे मतदान के बाद से ही भाजपा और निर्दल नेताओं के संपर्क में रही। 04 दिसंबर को भाजपा के तमाम जीते विधायकों ने उनसे भेंट की। विधायकों के उनके आवास पर मिलने का सिलसिला कल शाम तक जारी रहा। 04 दिसंबर को राजस्थान के प्रदेश प्रभारी प्रह्लाद जोशी ने गृह मंत्री अमित शाह से भेंट की। राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी ने महासचिव अरुण सिंह, गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ बैठक की। 06 दिसंबर को राजस्थान में चुनाव जीतने वाले सभी सांसदों ने प्रधानमंत्री मोदी से भेंट की। पार्टी के निर्देश पर सभी सांसदों ने संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। 07 दिसंबर को पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे दिल्ली आईं। पुत्रवधू के स्वास्थ्य का हाल लिया और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से सवा घंटे के करीब बातचीत हुई। 08 दिसंबर को पार्टी ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, सरोज पांडे और विनोद तावड़े को पर्यवेक्षक बनाया। इसी दिन सुनील बंसल ने भी राजस्थान को लेकर भाजपा अध्यक्ष के साथ चर्चा की। विनोद तावड़े भी मिले। जेपी नड्डा ने भी भाजपा के विधायकों के साथ होमवर्क किया। वर्चुअली संपर्क किया। भाजपा और संघ के तमाम नेता जयपुर में गाड़ी पटरी पर लाने का रोडमैप तैयार कर रहे हैं।
क्या रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह आसानी से सुलझा लेंगे राजस्थान का पेंच?
रविवार को राजनाथ सिंह ने दिल्ली में महात्मा गांधी की प्रतिमा का अनावरण किया। सोमवार तक वह व्यस्त हैं और भाजपा की तरफ से कहा जा रहा है कि सोमवार को भापाल में मुख्यमंत्री का चेहरा तय होने के बाद मंगलवार को रक्षा मंत्री के जयपुर में होने की संभावना है। मंगलवार को जयपुर में भाजपा विधायक दल की बैठक हो सकती है। राजनाथ सिंह बहुत सुलझे हुए और लक्ष्यभेदी नेता हैं। वरिष्ठ हैं। इसलिए रणनीतिकारों को उम्मीद है कि देर से ही सही, सब ठीक होगा। भाजपा के महासचिव अरुण सिंह पहले कह चुके हैं कि भाजपा संसदीय बोर्ड के निर्णय को सभी को मानना पड़ेगा। दिल्ली में बैठकर ऐसे संभावना महसूस की जा रही है कि जयपुर में इसी के अनुरुप होमवर्क चल रहा है। यह सही है कि मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तरह वसुंधरा राजे ने भी अपनी जनता से अपने राज्य में ही बने रहने का वादा किया है। घोषणा करके वादा किया है। दिल्ली न आने की घोषणा की है। हालांकि माना जा रहा है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व किसी भी टेढ़े पेंच को सीधा करने में निपुण है।
भाजपा के रणनीतिकारों की वजह से ही पलटवार कर रही हैं वसुंधरा राजे
जयपुर में में राजनीति का गजब का रंग देखने को मिल रहा है। वरिष्ठ पत्रकार श्याम सुंदर कहते हैं कि गृह मंत्री और प्रधानमंत्री वसुंधरा राजे से नहीं मिलना चाहते। समय नहीं देते। वसुंधरा भी इस भेंट के लिए बहुत व्याकुल नहीं हैं। भाजपा अध्यक्ष मिलने का समय देते हैं और वह मिलने चली जाती हैं। श्याम सुंदर कहते हैं कि वसुंधरा को कम करके देखना भूल साबित हो सकती है। इसे भाजपा के रणनीतिकार भी समझ रहे हैं। भाजपा के एक पूर्व विधायक कहते हैं कि हमारी नेता वसुंधरा राजे हैं। उन्होंने केद्र को अपने ऊपर अंगुली उठाने का कोई अवसर नहीं दिया है। वह कहते हैं कि 2013-18 तक वसुंधरा मुख्यमंत्री थीं। अच्छा काम किया था। इसके पहले भी उनके समय में भाजपा ने राजस्थान में जड़ें गहरी की थीं। सूत्र का कहना है कि वसुंधरा राजे राजस्थान में कोई भी ऐसा आचरण नहीं कर रही हैं, जो अनुशासनहीनता, पार्टी के संविधान के विपरीत हो। वह अपनी बात भी पार्टी फोरम पर रखने की पक्षधर हैं। माना जा रहा है कि वसुंधरा की यही लक्ष्मण रेखा पार्टी के शीर्ष रणनीतिकारों को भी तंग कर रही है। क्योंकि न वह उगल रही हैं, निगल रही हैं।