फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   BJP in Bengal, run on support of defection candidate, who left tmc and joined bjp, could not win assembly election 2021

बंगाल में भाजपा : दलबदलू उम्मीदवारों के सहारे चली पार्टी, नहीं लगा पाए नैया पार

Sun, 02 May 2021 01:34 PM IST
योगेश साहू न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता। Published by: योगेश साहू Updated Sun, 02 May 2021 01:34 PM IST
सार

चुनावों से पहले कई नेता तृणमूल कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा में चले आए। दल बदलने वाले ऐसे नेताओं को भाजपा ने टिकट भी दिया। परंतु आ रहे रुझानों में भाजपा का यह दांव सफल होता नहीं दिख रहा है।

विज्ञापन
BJP in Bengal, run on support of defection candidate, who left tmc and joined bjp, could not win assembly election 2021
भाजपा (सांकेतिक चित्र) - फोटो : social media

विस्तार

बंगाल में भाजपा ने पूरी ताकत झोंकी। साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाई। यहां तक कि टीएमसी के दिग्गज नेताओं को भी अपने पाले में खींच लिया। इसके बाद भाजपा के हर नेता ने 200 सीटें जीतने के दावे किए। दरअसल, भाजपा ने बंगाल के राजनीतिक रण में 'कमल' खिलाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन दलबदलुओं के सहारे भी उसकी नैया पार नहीं लग सकी। क्या रही इसकी वजह? क्यों टीएमसी के दिग्गज भाजपा के 'सारथी' नहीं बन सके, जानते हैं इस रिपोर्ट में...

विज्ञापन


ये चल रहे आगे
चुनाव आयोग की ओर से मिल रहे रुझानों के अनुसार, टीएमसी को छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले सुवेंदु अधिकारी नंदीग्राम में आगे चल रहे हैं। इनके अलावा नाटाबारी सीट पर मिहिर गोस्वामी, हल्दिया सीट पर तापसी मंडल, मान्टेश्वर सीट पर सैकत पांजा, मोयना में अशोक डिंडा और कृष्णानगर उत्तर विधानसभा सीट पर मुकुल रॉय आगे चल रहे हैं।
विज्ञापन


ये चल रहे पीछे 
चुनाव आयोग की ओर से मिल रहे रुझानों के अनुसार खारडाह सीट पर शीलभद्र दत्ता पीछे हैं। वहीं जगतदल सीट पर अरिंदम भट्टाचार्या, डोमजुर सीट पर राजीव बनर्जी, पुरुलिया सीट पर सुदीप मुखर्जी और काल्ना सीट पर बिस्वजीत कुंडू पीछे चल रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


इन रुझानों पर गौर करें दल बदलकर भाजपा में जाने वाले छह नेता जहां अपनी सीट पर आगे चल रहे हैं वहीं पांच नेता पीछे चल रहे हैं। यदि ये रुझान अंतिम परिणाम में तब्दील हो जाते हैं तो साफ है कि भाजपा तमाम तिकड़मों के बावजूद भी अपने अभियान को आगे बढ़ाने में कामयाब नहीं हो पाई।

इन नेताओं ने छोड़ा था टीएमसी का दामन
जानकारी के मुताबिक, बीते करीब दो सालों में टीएमसी के करीब छह सांसद और 14 विधायकों ने पार्टी छोड़ी है। दल बदलने वाले इन नेताओं में सुवेंदु अधिकारी और शीलभद्र दत्ता आदि दिग्गज नेता शामिल थे, जो भाजपा में चले गए। इनमें सांसद सुनील मंडल के अलावा मिहिर गोस्वामी, अरिंदम भट्टाचार्या, राजीव बनर्जी, तापसी मंडल, सुदीप मुखर्जी, सैकत पांजा, अशोक डिंडा, दीपाली बिस्वास, शुक्र मुंडा, श्यांपदा मुखर्जी, बनश्री मैती और  बिस्वजीत कुंडू भी शामिल हैं।

2019 से शुरू हुआ दल बदलने का सिलसिला
पश्चिम बंगाल में तृणमूल के दिग्गज नेताओं के भगवा रंग में रंगने की शुरुआत साल 2019 के लोकसभा चुनाव से चंद महीने पहले शुरू हुई थी। सबसे पहले मुकुल रॉय ने भाजपा का दामन थामा था और उसके बाद अनुपम हाजरा, सौमित्र खान आदि सांसद भाजपा में शामिल हो गए थे। इस बीच विधायक अर्जुन सिंह भी भाजपाई बने और उसका इनाम लोकसभा चुनाव में बतौर सांसद मिला।

इन सांसदों ने भी दिया इस्तीफा
गौरतलब है कि पूर्व रेल मंत्री और टीएमसी सांसद दिनेश त्रिवेदी ने 12 फरवरी को राज्यसभा में इस्तीफा देकर पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर खलबली मचा दी थी। इसे विधानसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा था। बता दें कि इस्तीफा देते वक्त दिनेश त्रिवेदी ने कहा था कि उन्हें टीएमसी में रहते हुए घुटन हो रही थी। इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ भी की थी। उनके अलावा टीएमसी नेता एवं अभिनेता मिथुन भी राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हुए, हालांकि पार्टी ने उन्हें इस बार के चुनावी मैदान में नहीं उतारा।

दल-बदल यानी 'आया राम-गया राम'

देश की राजनीति में दलबदल का पहला और चकित करने वाला घटनाक्रम हरियाणा में सामने आया था, जब अक्तूबर, 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने पंद्रह दिन में तीन बार पार्टी बदली थी। इस कारण उस घटना का नाम ही 'आया राम गया राम' हो गया। दलबदल तब से जारी है।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने हाल ही में एक शोध के नतीजे बताते हुए कहा कि पिछले पांच साल में 443 सांसदों और विधायकों ने दलबदल कानून तोड़े। इनमें से 170 (42 फीसदी) विधायकों ने कांग्रेस छोड़कर दूसरी पार्टियों में जाना उचित समझा, तो भाजपा के मात्र 18 विधायकों ने दूसरी पार्टियों का दामन थामा। जबकि 182 (45 फीसदी) विधायक अपनी पार्टी छोड़ भाजपा में गए।

क्या है दलबदल विरोधी कानून?

साल 1985 में विधायकों और सांसदों को उनकी सुविधा और जरूरत के अनुसार जल्दी-जल्दी अपनी पार्टी बदलने से रोकने के लिए दलबदल विरोधी कानून लाया गया था। 1985 से पहले ऐसा कोई कानून नहीं था। इस कानून के न होने पर विधायक और सांसद अपने राजनीतिक भविष्य को देखते हुए पुराने दल को छोड़कर नए दल में शामिल हो जाते थे।

1985 में नेताओं की ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए संविधान की दसवीं अनुसूची में उपबंध को जोड़ा गया था। यह एक विधायक या सांसद को दलबदल के लिए अयोग्य ठहराए जाने के आधार को निर्धारित करता है। इसमें किसी विधायक या सांसद का उसकी पार्टी की सदस्यता छोड़ने या पार्टी के निर्देशों/व्हिप का पालन नहीं करने पर दलबदल माना जाता है।

इस कानून में एक अपवाद भी है

दलबदल कानून में एक अपवाद (91वां संविधान संशोधन, वर्ष 2003) भी है। इसके तहत यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई या अधिक विधायक किसी अन्य पार्टी के साथ विलय करने का निर्णय लेते हैं, तो उन्हें दलबदल के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है। शेष बचे हुए लोग जो अपने दल के साथ ही रहना पसंद करते हैं, वे ऐसे समय में कानूनी कार्रवाई से सुरक्षित रहते हैं।

दलबदल कानून के अपवाद का प्रभाव

  • कोई व्यक्ति जब स्पीकर या अध्यक्ष के रूप में चुना जाता है तो वह अपनी पार्टी से इस्तीफा दे सकता है और जब वह पद छोड़ता है तो फिर से पार्टी में शामिल हो सकता है। इस तरह के मामले में उसे अयोग्य नहीं ठहराया जाता है।
  • किसी पार्टी के एक-तिहाई विधायकों ने विलय के पक्ष में मतदान किया है तो उस पार्टी का किसी दूसरी पार्टी में विलय किया जा सकता है।
  • दलबदल विरोधी कानून आने के बाद कुछ अपवाद भी आए। मसलन नेताओं का अकेले एक दल से दूसरे दल में जाने के सिलसिले पर रोक जरूर लगी, परंतु अब सामूहिक तौर पर दलबदल होने लगा।
  • ऐसे में साल 2003 में संसद को 91वां संविधान संशोधन करना पड़ा, इसमें व्यक्तिगत के साथ सामूहिक दलबदल को भी असंवैधानिक करार दिया गया। इससे 10वीं अनुसूची की धारा 3 खत्म हुई, जिसमें प्रावधान था कि एक-तिहाई सदस्य एक साथ दल बदल कर सकते थे।
  • साथ ही 91वें संशोधन के जरिए मंत्रिमंडल का आकार भी 15 फीसदी सीमित कर दिया गया, हालांकि किसी भी कैबिनेट में सदस्यों की संख्या 12 से कम नहीं होने का प्रावधान जरूर रखा गया।

क्या है संविधान की 10वीं अनुसूची?

साल 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए भारतीय संविधान में 10वीं अनुसूची जिसे लोकप्रिय रूप से 'दल बदल विरोधी कानून' (Anti-Defection Law) कहा जाता है, जोड़ी गई थी। इस सूची में दलबदल क्या है और दलबदल करने वाले विधायकों या सांसदों को अयोग्य ठहराने से जुड़े सभी प्रावधानों को परिभाषित किया गया है।

10वीं अनुसूची की जरूरत क्यों?
लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए राजनीतिक दल सबसे अहम होते हैं, जो चुनावों में मिले जनादेश के तहत सामूहिक आधार पर फैसले लेते हैं। लेकिन, आजादी के बाद के कुछ सालों में ही दलों को मिलने वाले सामूहिक जनादेश की अनदेखी होने लगी और विधायकों और सांसदों के जोड़-तोड़ से सरकारें बनने और गिरने लगीं। 

इस संबंध में 1960-70 के दशक में ‘आया राम गया राम’ की अवधारणा काफी प्रचलित हुई थी। तब इस तरह के कानून की आवश्यकता महसूस हुई, जिससे दलों को मिले जनादेश का उल्लंघन करने वाले सदस्यों को चुनाव में भाग लेने से रोका जा सके और ऐसे विधायकों और सांसदों को अयोग्य घोषित किया जा सके।

अयोग्य घोषित करने के आधार

  • अगर कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता को छोड़ देता है।
  • निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
  • किसी सदस्य सदन में पार्टी के पक्ष के विपरीत वोट करता है या खुद को वोटिंग से अलग रखता है।
  • छह महीने की समाप्ति के बाद यदि कोई मनोनीत सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed