BJP: क्या खत्म हो जाएगा कांग्रेस सरकार में बनाया गया अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय, नकवी आउट हुए तो बनेगा गैर मुस्लिम मंत्री?
2017 में गुजरात में आयोजित विश्व हिंदू परिषद की बैठक में शामिल कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का कहना था कि कांग्रेस ने तुष्टीकरण के लिहाज से मंत्रालय बनाया था। इसलिए इस मंत्रालय की कोई आवश्यकता नहीं है। इसकी मांग भी होती रही है। ऐसे में अब कयास तो यही लगाए जा रहे हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि केंद्र सरकार इस मंत्रालय को ही समाप्त कर दे।
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भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा में फिलहाल किसी भी मुस्लिम चेहरे को जगह नहीं दी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि राज्यसभा के सांसद और केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के भविष्य का क्या होगा। क्योंकि मुख्तार अब्बास नकवी का कार्यकाल बतौर राज्यसभा सदस्य सात जुलाई को समाप्त हो रहा है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में मुख्तार अब्बास नकवी के बहाने भारतीय जनता पार्टी में मुस्लिम राजनीति और राजनेताओं की बनने वाली जगह के साथ-साथ उनकी स्वीकार्यता जैसे तमाम मुद्दों पर बहस शुरू हो गई है। राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तो इस बात की भी हैं कि क्या मोदी सरकार अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय महज जैसे डेढ़ दशक पहले बनाए गए मंत्रालय को भी समाप्त कर सकती है।
राज्य सभा के चुनावों के साथ ही राजनीतिक पारा कई अन्य वजहों से भी हाई हो चुका है। इन्हीं वजहों में एक सबसे बड़ी वजह सामने यह आ रही है कि केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी का भविष्य आखिर अब क्या होगा। मुख्तार अब्बास नकवी का सात जुलाई को कार्यकाल समाप्त हो रहा है। अनुमान लगाया जा रहा था कि भारतीय जनता पार्टी राज्यसभा के उम्मीदवारों में केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी को कहीं ना कहीं से तो समायोजित ही किया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजनीतिक गलियारों में अटकलें लगने लगी कि राज्यसभा न सही लेकिन लोकसभा के उपचुनावों में मुख्तार अब्बास नकवी पार्टी टिकट देगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस पूरे मसले पर राजनैतिक विश्लेषक आरएन धारीवाल कहते हैं 2017 में गुजरात में हुई विश्व हिंदू परिषद की बैठक में एक बार यह मांग तो जरूर उठी थी कि अल्पसंख्यक मंत्रालय को खत्म कर दिया जाए। धारीवाल का कहना है कि दरअसल इस मंत्रालय को 2006 में अस्तित्व में लाया गया। उस वक्त मनमोहन सिंह की सरकार थी और मुस्लिमों को मजबूती से साधने के लिए एक संदेश दिया गया कि केंद्र सरकार उनकी कितनी हिमायती है। धारीवाल कहते हैं कि 2017 में गुजरात में आयोजित विश्व हिंदू परिषद की बैठक में शामिल कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का कहना था कि कांग्रेस ने तुष्टीकरण के लिहाज से मंत्रालय बनाया था। इसलिए इस मंत्रालय की कोई आवश्यकता नहीं है। इसकी मांग भी होती रही है। ऐसे में अब कयास तो यही लगाए जा रहे हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि केंद्र सरकार इस मंत्रालय को ही समाप्त कर दें।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी के लिए हिंदुत्ववादी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिहाज से यह मास्टर स्ट्रोक तो हो सकता है लेकिन यह मंत्रालय सिर्फ मुस्लिमों के वेलफेयर के लिए ही नहीं बल्कि देश के तमाम अल्पसंख्यक समुदाय के कल्याण के लिए भी कार्य करता है। ऐसे में अगर कोई केंद्र सरकार में कोई मुस्लिम सांसद इस मंत्रालय को संभालने के लिए नहीं है तो यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि मंत्रालय को समाप्त कर दिया जाए। यह भी संभव है कि इस मंत्रालय में कोई गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय का नेता भी मंत्री बनाया जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषक हरिओम चांदना कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी हमेशा से राजनीति में कुछ न कुछ चौंकाने वाला ही करती है। ऐसे में किसी भी अटकलों को आप सिरे से खारिज तो नहीं कर सकते हैं। संभव है कि मंत्रालय को ही समाप्त कर दिया जाए या किसी अन्य मंत्रालय के साथ उसको जोड़ दिया जाए। वह कहते हैं कि यह भी संभव है कि इस मंत्रालय में गैर मुस्लिम नेता भी मंत्री बनाया जा सकता है।
दरअसल यह राजनैतिक कयासबाजी सिर्फ इसलिए हो रही है कि मौजूदा समय में भारतीय जनता पार्टी से तीन मुस्लिम नेता राज्यसभा में अपनी नुमाइंदगी दर्ज करा रहे हैं। जिसमें केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी झारखंड से राज्यसभा के सांसद हैं। पूर्व मंत्री एमजे अकबर मध्य प्रदेश से तथा समेत सैयद जफर इस्लाम भी राज्यसभा से ही सांसद है। मी-टू मामले में फंसने के बाद एमजे अकबर का मंत्री पद तो गया ही था और इस बार उनको राज्यसभा के लिए पार्टी ने तवज्जो नहीं दी। जफर इस्लाम भी इस बार दौड़ से आउट हो गए। रही सही कसर पार्टी ने मुख्तार अब्बास नकवी को राज्यसभा की उम्मीदवारी से लेकर लोकसभा के उपचुनाव में टिकट न देकर अटकलों के बाजारों को और गर्म कर दिया। विश्व हिंदू परिषद से जुड़े एक वरिष्ठ सदस्य कहते हैं कांग्रेस सरकार के तुष्टीकरण के लिहाज से तैयार किए गए अल्पसंख्यक मंत्रालय की आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिए। उनका कहना है जब मोदी सरकार सभी जाति विशेष धर्म के लोगों को लेकर के एक साथ आगे बढ़ रही है तो एक जाति विशेष समुदाय के लिए किसी मंत्रालय की कोई आवश्यकता नहीं है।
राजनीतिक जानकार दामोदर चक्रवर्ती कहते हैं कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत कोई भी व्यक्ति जो किसी भी सदन का सदस्य ना हो वह भी छः महीने तक अपने पद पर आसीन रह सकता है। अगर इस दौरान वह किसी भी सदन का सदस्य दोबारा चुन लिया जाता है या मनोनीत होता है तो अपने पद पर बना रह सकता है। हालांकि कुछ राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना है कि अगर तय सीमा के बाद भी केंद्र सरकार किसी भी सदन के सदस्य ना होने के बाद भी उक्त व्यक्ति को पद पर बनाए रखना चाहती है तो उसमें प्रधानमंत्री की अनुमति जरूरी होती है। यानी प्रधानमंत्री अगर चाहे तो सिर्फ एक बार तय सीमा समाप्त होने के बाद भी एक साल के लिए बगैर किसी सदन के सदस्य को यह मौका मिल सकता है।