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BJP Hindutva card: दिल्ली, बंगाल और हिमाचल में फेल हुआ हिंदुत्व कार्ड, क्या कर्नाटक में भाजपा को होगा फायदा?

Fri, 05 May 2023 07:07 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Fri, 05 May 2023 07:07 PM IST
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सार
BJP Hindutva card: कर्नाटक में पिछले छह महीने से एक चुनाव पूर्व सर्वेक्षण एजेंसी के लिए काम कर रहे बालकृष्णा का कहना है कि भाजपा की बोम्मई सरकार के खिलाफ सरकार विरोधी लहर है। दूसरे, सत्ताधारी दल को लिंगायतों में इस बार सेंध लगने की संभावना नजर आ रही है...
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BJP Hindutva card failed in Delhi, west Bengal and Himachal pradesh, will BJP benefit in Karnataka?
Karnataka: Congress president Mallikarjun Kharge with D.K. Shivakumar and Siddara - फोटो : PTI (File Photo)

विस्तार

भाजपा ने नई दिल्ली में हिंदुत्व के सहारे सरकार बनाने का सपना देखा था। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने हुनमान चालीसा पढ़ी, तो उन्हें हनुमानजी की कृपा मिल गई। प. बंगाल में भी भाजपा ने हिंदुत्व की अलख जगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी ने भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। भाजपा ने आंतरिक कलह से घबराकर यही चुनावी मंत्र हिमाचल में पढ़ा था, लेकिन जनता ने कांग्रेस के सुखविंदर सिंह सुक्खू को मुख्यमंत्री बनाने का जनमत दे दिया। अब कर्नाटक में क्या होगा? क्या हिंदुत्व और बजरंग बली के भरोसे चल रही भाजपा की मुराद पूरी होगी?

देखें यह वीडियो: कर्नाटक चुनाव में बजरंगबली विवाद के बीच मल्लिकार्जुन खरगे ने खेला बड़ा दांव

कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार कहते हैं कि भाजपा को कर्नाटक में सरकार बनाने का सपना देखना छोड़ देना चाहिए। वरिष्ठ नेता बीके हरिप्रसाद कहते हैं कि भाजपा के पास इसके सिवा है क्या? भ्रष्टाचार राज्य में बड़ा मुद्दा है? पार्टी के नेता रंगे हाथ पकड़े गए। बड़ी संख्या में पार्टी के भीतर की तानाशाही, भ्रष्ट सरकार और कार्यप्रणाली से तंग आकर भाजपा के नेताओं ने बगावत की है। जनता त्रस्त है। इस स्थिति में भाजपा के हौसले पस्त हैं और वह अपना आखिरी दांव आजमा रही है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने राज्य के चुनाव प्रचार में जोरदार एंट्री लेकर इसे बहुत दिलचस्प बना दिया है। ऐसे में कांग्रेस के नेता पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के सपने संजोने लगे हैं।

हे बजरंग बली हनुमान, करो कल्याण: प्रधानमंत्री मोदी

प्रधानमंत्री मोदी ने कर्नाटक की तीन मई को तीनों जनसभाओं में मंच से जय बजरंग बली का नारा लगाया था। उत्तर कन्नड़ के अंकोला में पद्म पुरस्कार से सम्मानित तुलसी गौड़ा को झुककर प्रणाम किया। सुकरी बोम्मागौड़ा का सिर झुकाकर अभिवादन किया। दोनों महिलाएं हलक्की वोक्कालिगा समाज से आती हैं। यह प्रधानमंत्री का एक विशिष्ट तरीका भी है। प्रधानमंत्री प्रचार के लिए 6, 7 मई को भी कर्नाटक में ही हैं। बेंगलुरु में बड़े रोड शो की तैयारी अंतिम रूप ले रही है। गृहमंत्री अमित शाह संगठन से लेकर प्रचार तक में भरपूर समय दे रहे हैं। केंद्रीय मंत्रियों में स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जैसे नेता लगातार कर्नाटक का रुख कर रहे हैं। इन सबके बीच में कर्नाटक से आने वाले केंद्रीय मंत्री का दावा है कि भाजपा स्पष्ट बहुमत से जीत रही है। 14 मई को चुनाव के नतीजे आएंगे तो भाजपा को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का जनादेश मिलेगा। दरअसल 10 मई को कर्नाटक की 224 विधानसभा क्षेत्रों के लिए मतदान होना है। 14 मई को नतीजा आएगा और 8 मई को चुनाव प्रचार अभियान बंद हो जाएगा। इसलिए भाजपा प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती।

कहां है कांग्रेस भारी और कहां से है भाजपा को उम्मीद

कर्नाटक में पिछले छह महीने से एक चुनाव पूर्व सर्वेक्षण एजेंसी के लिए काम कर रहे बालकृष्णा का कहना है कि भाजपा की बोम्मई सरकार के खिलाफ सरकार विरोधी लहर है। दूसरे, सत्ताधारी दल को लिंगायतों में इस बार सेंध लगने की संभावना नजर आ रही है। इसे ध्यान में ध्यान रखकर भाजपा ने सामाजिक विकल्पों पर काफी काम किया है। इसका उसे कुछ फायदा मिलेगा। भाजपा को कुछ फायदा प्रधानमंत्री मोदी के प्रचार में उतरने और उनकी छवि का मिलेगा। भाजपा ने इस बार 27 फीसदी नए उम्मीदवार उतारे हैं। पुराने और जनता के बीच में अलोकप्रिय चेहरों को हटाया है। इसका उसे नफा और नुकसान दोनों मिल सकता है। पार्टी के स्थानीय नेता, स्थानीय मुद्दे और समीकरण उसे तंग कर सकते हैं।

देखें यह वीडियो: कर्नाटक चुनाव: डीके शिवकुमार का दावा- बीजेपी को 60 और कांग्रेस को मिलेगी 140 से अधिक सीटें

कांग्रेस को सबसे अधिक उम्मीद लिंगायत मतों में सेंध लगने, जेडीएस के छिटके वोट पाले में आने और भाजपा के प्रति जनता में बढ़ी नाराजगी से है। कांग्रेस ने राज्य में इसके साथ पिछड़ी और दलित जातियों का भी कार्ड खेला है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की छवि है और इसका भी उसे लाभ मिलने की संभावना है। मल्लिकार्जुन खरगे की तुलना में बीएस येदियुरप्पा की कर्नाटक में छवि को झटका भी लगा है। जगदीश शेट्टार जैसे नेता के पार्टी छोड़ने का भी भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

क्या कहते हैं कर्नाटक के जातीय समीकरण?

भाजपा (30 फीसदी) और कांग्रेस (23 फीसदी) दोनों ने सबसे अधिक टिकट लिंगायत उम्मीदवारों को दिए हैं। जेडीएस (20 फीसदी) ने वोक्कालिगा प्रत्याशियों को सबसे अधिक संख्या में मैदान में उतारा है। कांग्रेस ने 15 मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भी मैदान में उतारा है और पीएफआई तथा बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने का घोषणा पत्र में वादा भी किया है। राज्य में लिंगायत करीब 17 फीसदी हैं। जबकि वोक्कालिगा 14 फीसदी के करीब हैं। वोक्कालिगा बेंगलुरु के आस-पास 27-28 सीटों पर अपना असर भी रखते हैं। वहीं 78 सीटों पर लिंगायतों की आबादी 25 फीसदी से अधिक (प्रभावी) है। 2018 में भाजपा ने लिंगायत बहुल वाली 37 सीटें जीत ली थीं।

वहीं वोक्कालिगा बहुल वाली सबसे अधिक 22 सीटें जेडीएस के खाते में गई थी। राज्य में तीसरे नंबर पर कोरबा कोई सात फीसदी हैं। कर्नाटक में दलितों और अल्पसंख्यक मुस्लिमों की आबादी लिंगायतों से अधिक है। खास बात यह है कि कांग्रेस ने सात फीसदी मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिया है। दलित चेहरा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे खुद हैं। डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया अपने समुदाय का चेहरा हैं। इन्हीं सामाजिक समीकरणों के आधार पर कांग्रेस के नेता इस चुनाव में बड़ी उम्मीद पाले बैठे हैं।

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