गोवा: विकल्प के अभाव में भाजपा की दोबारा लग सकती है लॉटरी
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विकल्प के अभाव (टीना फैक्टर) में भाजपा दोबारा से गोवा की सत्ता के करीब दिख रही है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले पार्टी के सामने इस दफे चुनौतियां बेशक ज्यादा है। मगर सूबे की सत्ता पर कब्जा बरकरार रखने को लेकर पार्टी की उम्मीदें बनी हुई हैं।
कांग्रेस पार्टी अपने मजबूत आधार वाले नेताओं के जरिए भाजपा को चुनौती देती तो दिख रही है। लेकिन प्रदेश में भाजपा के खिलाफ माहौल खड़ा कर विकल्प बनने की उसकी स्थिति नजर नहीं आ रही है। हालांकि भाजपा से ईसाई वोटरों के हुए मोह भंग से कांग्रेस की उम्मीदें बन सकती हैं।
परंतु दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी यहां भी कांग्रेस के पारंपरिक ईसाई वोटरों पर ही चोट कर रही है। तो भाजपा के लिए मुश्किल बनने वाले सुभाष वेलिंगकर ने अपने सियासी चालों के वजह से ही साख खोते दिख रहे हैं। मातृभाषा की लड़ाई के नाम पर उन्होंने शिव सेना से हाथ मिला लिया है। उनके विश्वसनीय भी उनका साथ छोड़ते दिख रहे हैं।
भाजपा नेता बड़ी जीत का दावा कर रहे हैं
उधर भाजपा नेता वर्ष 2012 के मुकाबले बड़ी जीत का दावा कर रहे हैं। लेकिन उनके दावों के इतर भी भाजपा तमाम चुनौतियों के बवजूद सबसे बडे़ दल के रूप में उभरती दिख रही है। पिछले चुनाव के मुकाबले उसकी राह में पार्रिकर के नेतृत्व का अभाव, एमजीपी का अलगाव, संघ-भाजपा की एकजूटता का टूटन, कांग्रेस के खिलाफ माहौल न होना और ईसाईयों की नाराजगी सरीखे प्रमुख रोड़े हैं। लेकिन भाजपा ने चालाकी से इन अवरोधों से सूबे की जनता का ध्यान हटाने की कोशिश की है।
भाजपा ने पर्रिकर के नाम की राग अलाप कर नेतृत्व के खामियाजे की भरपाई का दांव चल दिया है। जोकि जनता के बीच फिट उतरता भी दिख रहा है। सूबे की सत्ता में पर्रिकर की वापसी की चर्चा ने भाजपा को न सिर्फ सत्ता विरोधी वोट की चोट से उबार दिया है बल्कि उसके विकास कार्यों की चर्चाएं लोगों के जुबान पर आने लगी हैं। तो पिछले चुनाव में पार्टी को कांग्रेस के सत्ता विरोधी रूझान का लाभ सीधे मिला था।
लेकिन इस दफे कांग्रेस पार्टी भाजपा के सत्ता विरोधी कदम का लाभ बटोरती नहीं दिख रही है। हालांकि भाजपा से छीटक रहे ईसाई मतों से उसे लाभ जरूर है। मगर यहां भी केजरिवाल ने एलविस गोम्स को अपनी ओर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस की परंपरागत वोट पर चोट मार दिया है।
केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का प्रचार दक्षिण गोवा के इलाकों में ज्यादा है जहां ईसाई मतों के कांग्रेस को भरोसा ज्यादा है। हालांकि भाजपा ने पिछले चुनाव के मुकाबले इस दफे ईसाई उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाई है।
एमजीपी ने दिए भाजपा से दोस्ती के संकेत
बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ रही एमजीपी बेशक अलग हटकर वेलिंगकर और शिवसेना के साथ चुनाव मैदान में है। मगर उसके नेताओं ने भाजपा के प्रति नरमी बरतनी शुरू कर दी है। इसे सूबे की सियासी हवा के रूप में देखा जा रहा है। एमजीपी ने कहा है कि यदि भाजपा उनके अनुकूल व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाए तो वह उसका साथ दोबारा देने को तैयार हैं।
गड़करी दांव के जरिए भाजपा ने वेलिंगकर को किया बेअसर
भाजपा ने केंद्रीय मंत्रि नितिन गड़करी को गोवा का चुनाव प्रभारी बनाकर सुभाष वेलिंगकर के जरिए संघ में की गई टूट के खामियाजे की भरपाई की कोशिश की है। गड़करी के रिश्ते संघ से बेहद अच्छे हैं। इसके वजह से उन्होंने सूबे के संघ कार्यकर्ताओं को साथ रखने में कामयाबी पा ली है।
उपर से वेलिंगकर ने शिव सेना से हाथ मिला लिया है। वे केवल 6 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। इससे भी भाजपा का विकल्प बनने के उनके दावे कमजोर हुए हैं। हालांकि भाजपा भी मान रही है कि वेलिंगकर के उम्मीदवार बेशक जीत न दर्ज करें लेकिन 3 सीटों पर वोट काटकर उसकी बढ़त को कम कर सकते हैं।
भाजपा ने साधा जातिय संतुलन
गोवा की सामाजिक रचना में ईसाईयों की आबादी करीब 21 प्रतिशत है, तो मुस्लिम आबादी बढ़कर 5 प्रतिशत पहुंच गई है, शेष आबादी हिन्दू हैं। जिसमें 33 से 35 प्रतिशत जनसंख्या भंडारी बिरादरी के लोगों की है। 10 प्रतिश के करीब सूबे में ब्राहण हैं। प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर ब्राहणों का दबदबा होने की वजह से सत्ता में उन्हीं का कब्जा रहा है।
पार्रिकर सारस्वत ब्राहण हैं तो सामाजिक संतुलन साधने के लिए भाजपा ने भंडारी बिरादरी के श्रीपाद नाईक को भी केंद्र में मंत्री बनाकर उनके चेहरे को आगे कर रखा है। पार्टी के सभी प्रचार सामग्री में पर्रिकर के साथ श्रीपद की तस्वीर है। तो भाजपा ने केंद्र में अपनी सरकार का भी भरोसा राज्य के विकास के लिए जगाया है। पार्टी ने नारा दिया है कि फोर गोवा गेन, भाजपा अगेन।
कांग्रेस के क्षत्रप चेहरे
बिना एकजूट नेतृत्व के भी गोवा में यदि कांग्रेस पार्टी भाजपा को टक्कर देती दिख रही है तो इसके पिछे पूर्व मुख्यमंत्री रहे कुछ कद्दावर चेहरे हैं। इन चेहरों को भाजपा भी धूल चटाने का दमखम नहीं देख पा रही है। ऐसे चेहरों में दिगम्बर कामत, प्रताप सिंह राणे, अलेमाओ चर्चिल, लिरिल फलेरियो और रवि नायक सरीखे ऐसे शूरमा चुनावी मैदान में हैं जिन्हें चुनौती दे पाना भाजपा को भी टेढ़ी खीर लग रही है।