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Bilkis Bano Case: मामला विचाराधीन होने पर जुर्माना जमा करने पर 'सुप्रीम' सवाल; वकील ने दिया ये तर्क

Thu, 31 Aug 2023 08:15 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Thu, 31 Aug 2023 08:15 PM IST
सार

मामले में बिलकिस बानो द्वारा दायर याचिका के अलावा माकपा नेता सुभाषिनी अली, स्वतंत्र पत्रकार रेवती लौल और लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रूप रेखा वर्मा द्वारा दायर याचिका सहित कई अन्य जनहित याचिकाओं में छूट को चुनौती दी गई है। तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा ने भी सजा माफी के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की है।

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Bilkis Bano case: Supreme Court questions convict for depositing fine when matter is under consideration
बिलकिस बानो(फाइल) - फोटो : PTI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बिलकिस बानो की याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान शीर्ष कोर्ट ने मामला विचाराधीन होने के बाद भी एक दोषी द्वारा जुर्माना जमा करने पर सवाल खड़े किए। बता दें कि साल 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो से सामूहिक दुष्कर्म और उसके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के सभी 11 दोषियों को दी गई छूट को चुनौती दी गई है। 

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न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ मामले की सुनवाई कर रही थी। इस दौरान दोषी रमेश रूपाभाई चंदना की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने पीठ को बताया कि दोषियों ने मुंबई में ट्रायल कोर्ट से संपर्क किया है और उन पर लगाया गया जुर्माना जमा कर दिया है। इस पर पीठ ने कहा, 'क्या जुर्माना जमा न करने से छूट पर कोई असर पड़ता है? क्या आपको डर था कि जुर्माना जमा न करने से मामले के गुण-दोष पर असर पड़ेगा। पहले आप अनुमति मांगते हैं और अब बिना अनुमति के आपने जुर्माना जमा कर दिया है।'
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अदालत के सवाल का जवाब देते हुए वरिष्ठ वकील लूथरा ने कहा कि जुर्माना जमा न करने से छूट के फैसले पर कोई असर नहीं पड़ता है। लेकिन उन्होंने अपने मुवक्किल को विवाद को कम करने के लिए जुर्माना जमा करने की सलाह दी थी। 
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बता दें कि इस मामले में दोषियों को दी गई छूट को चुनौती देने वाले जनहित याचिका के याचिकाकर्ताओं में से एक ने यह तर्क देते हुए कि उनकी समय से पहले रिहाई इसलिए अवैध है क्योंकि उन्होंने अपनी सजा पूरी तरह से नहीं काटी है। चूंकि दोषियों ने 34,000 रुपये की जुर्माना राशि का भी भुगतान नहीं किया है। ऐसे में उन्हें अतिरिक्त सजा काटनी चाहिए, जो कि उन्होंने पूरी नहीं की है। 

सुनवाई शुरू होते ही लूथरा ने मामले में अपने मुवक्किल को दी गई छूट का बचाव करते हुए कहा कि सुधार आपराधिक न्याय प्रणाली का अंतिम उद्देश्य है। अन्यथा हत्या के मामले में अदालतें ज्यादातर मौत की सजा देंगी। लेकिन इसे दुर्लभतम मामलों में लागू किया जाता है। ये ऐसे मामले नहीं हैं जो सुधार की सीमा से परे हैं। लूथरा ने कहा, ये वे मामले नहीं हैं जहां निश्चित अवधि की सजा थी। न्याय के लिए समाज की पुकार, जघन्य अपराध पर दलीलें इस स्तर पर प्रासंगिक नहीं हैं क्योंकि अदालत ने यह नहीं कहा है कि सजा में छूट स्वीकार्य नहीं है। इस मामले में अगली सुनवाई 14 सितंबर को होगी।

गुजरात सरकार ने मामले के सभी 11 दोषियों को 1992 की माफी नीति के आधार पर रिहा किया था, न कि 2014 में अपनाई गई नीति के आधार पर, जो अब लागू है। 2014 की नीति के तहत राज्य सीबीआई द्वारा जांच किए गए अपराध के लिए छूट नहीं दे सकता है या जहां लोगों को दुष्कर्म या सामूहिक दुष्कर्म के साथ हत्या का दोषी ठहराया गया है।

बिलकिस बानो द्वारा दायर याचिका के अलावा माकपा नेता सुभाषिनी अली, स्वतंत्र पत्रकार रेवती लौल और लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रूप रेखा वर्मा द्वारा दायर याचिका सहित कई अन्य जनहित याचिकाओं में छूट को चुनौती दी गई है। तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा ने भी सजा माफी के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की है।


जब गोधरा ट्रेन अग्निकांड के बाद भड़के सांप्रदायिक दंगों के डर से भागते समय बिलकिस बानों के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया था। उस समय, बिलकिस बानो 21 साल की थीं और पांच महीने की गर्भवती थीं। दंगों में मारे गए उनके परिवार के सात सदस्यों में उनकी तीन साल की बेटी भी शामिल थी।

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