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Seat Ka Samikaran: सिकटा सीट पर लंबे समय तक रहा है दो परिवारों का दबदबा, ऐसा है इसका चुनावी इतिहास

Thu, 21 Aug 2025 05:13 AM IST
संध्या इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला
इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला Published by: संध्या Updated Thu, 21 Aug 2025 05:13 AM IST
सार

बिहार की विधानसभा सीटों से जुड़ी खास सीरीज ‘सीट का समीकरण’ में आज सिकटा विधानसभा सीट की बात करेंगे। इस सीट पर 2020 में भाकपा माले के वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता को जीत मिली थी। 

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Bihar Assembly Election sikta Constituency Seats Dilip Varma Feroz Ahmad Birendra Prasad Gupta Faiyazul Azam
बिहार चुनाव 2025 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बिहार के चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। पार्टियां अपने उम्मीदवार तय करने के लिए विश्लेषण कर रही हैं। कई सीटें ऐसी हैं जहां किसी परिवार विशेष का वर्चस्व रहा है। ऐसी ही एक सीट है सिकटा, यहां रायफुल आजम के परिवार का लंबे समय तक दबदबा रहा। इसी तरह दिलीप वर्मा और उनके भाई भी यहां से कई बार जीते। कुछ मौकों को छोड़कर यह सीट ज्यादातर इन दो परिवारों के पास रही है। ‘सीट का समीकरण’ सीरीज में आज इसी सिकटा विधानसभा सीट की बात।

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पहले जानते हैं सिकटा सीट के बारे में 

बिहार के 38 जिलों में से एक पश्चिमी चंपारण जिला भी है। सिकटा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र वाल्मीकि नगर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है। वाल्मीकि नगर लोकसभा में कुल छह विधानसभा सीटें आती हैं। इसमें वाल्मीकि नगर, रामनगर (एससी), नरकटियागंज, बगहा, लौरिया, सिकटा शामिल हैं। सिकटा सीट पर 1952 से चुनाव होते रहे हैं। 

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1952: कांग्रेस को मिली जीत 

1952 में यहां सबसे पहले चुनाव हुए। इस चुनाव में कांग्रेस के फजलुर रहमान को जीत मिली। उन्होंने माकपा के केदार मणि शुक्ला को 3,801 वोट से हरा दिया था।

1957 में एक बार फिर से इस सीट पर कांग्रेस के फजलुर रहमान को ही जीत मिली। उनका मुकाबला एक बार फिर पिछले चुनाव की तरह ही माकपा के केदार मणि शुक्ला से था। उन्होंने माकपा उम्मीदवार को 1749 वोट से हरा दिया था। 

फजलुर रहमान 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर लोकसभा पहुंच गए थे। फजलुर रहमान स्वतंत्रता आंदोलन में भी काफी सक्रिय थे। सुभाष चंद्र बोस के द्वारा बनाए गए फॉर्वर्ड ब्लॉक का भी वह हिस्सा रहे। 1942-45 के बीच वह फॉरवर्ड ब्लॉक आंदोलन में जेल गए। लोकसभा में चुनने के बाद उन्हें 1977 से ऊर्जा मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाया गया। 

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1962: आजम के जीतने का सिलसिला शुरू

1962 में रायफुल आजम को स्वतंत्र पार्टी से पहली बार सीट पर जीत मिली। उन्होंने कांग्रेस के मोहम्मद ओबैदुल्लाह को 392 वोट से हरा दिया। 

1967 में सिकटा सीट पर कांग्रेस के रायफुल आजम को हार का सामना करना पड़ा। इस चुनाव में माकपा के यू.एस. शुक्ला ने कांग्रेस के रायफुल आजम को 2,481 वोट से हरा दिया। 

1969 के चुनाव में रायफुल आजम को एक बाद फिर जीत मिली। उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लोकतांत्रिक कांग्रेस के हरगुन प्रसाद शाही को 2685 वोट से हरा दिया था। 

फैयाजुल आजम को मिली जीत 

1972 में  फैयाजुल आजम के कांग्रेस ऑर्गनाइजेशन के टिकट पर चुनाव लड़ा था। फैयाजुल आजम यहां से दो बार जीते रायफुल आजम के पुत्र हैं। उन्होंने माकपा के श्रीनिवास पांडे को 1053 वोट से हरा दिया था। 

1977 में एक बार फिर कांग्रेस के टिकट पर फैयाजुल आजम को जीत मिली थी। एक बार फिर आजम ने माकपा के श्रीनिवास पांडे को 18907 वोट से हरा दिया था। 

धर्मेश प्रसाद वर्मा के मिली जीत 

1980 में कांग्रेस (इंदिरा) से चुनाव लड़ रहे और दो बार के विधायक फैयाजुल आजम को हार का सामना करना पड़ा था। उन्हें जनता पार्टी के धर्मेश प्रसाद वर्मा ने 11,296 वोट से हरा दिया। धर्मेश प्रसाद वर्मा पश्चिमी चंपारण के शिकारपुर घराने के सदस्य हैं। इसी घराने से आने वाले आलोक वर्मा की पत्नी रश्मि वर्मा अभी जिले की नरकटियागंज सीट से विधायक हैं।  

1985 में भी जनता पार्टी से धर्मेश प्रसाद वर्मा ने ही जीत दर्ज की। इस बार उन्होंने कांग्रेस के गौसुल आजम को 16,522 वोट से हरा दिया था। गौसुल आजम फैयाजुल आजम के भाई हैं। 1989 में धर्मेश प्रसाद वर्मा लोकसभा पहुंचे। उन्होंने 1989 से 1991 तक लोकसभा में बेतिया सीट का प्रतिनिधित्व किया। 

1990 में फैयाजुल आजम का वापसी

1990 के विधानसभा चुनाव में फैयाजुल को कांग्रेस से टिकट नहीं मिला तो वह निर्दलीय ही चुनावी मैदान में उतर गए। निर्दलीय उतरे फैयाजुल ने जनता दल के दिलीप कुमार को 6947 वोट से हरा दिया था। 

1991: दिलीप वर्मा की जीत का सिलसिला शुरू

फैयाजुल आजम को बेतिया से लोकसभा से जीतने पर यह सीट सीट खाली हो गई। इसके बाद 1991 में उपचुनाव कराने पड़े। इस उपचुनाव में पहली बार दिलीप वर्मा को जीत मिली। इस बार वह निर्दलीय चुनाव लड़े थे। उन्होंने जनता दल के सलाउद्दीन 8,246 वोट से हरा दिया था। 

इसके बाद 1995, 2000, 2005 (फरवरी) और 2010 का चुनाव भी दिलीप वर्मा ने अलग-अलग पार्टी से जीता। 1995 में उन्होंने चंपारण विकास पार्टी से चुनाव लड़कर जनता दल के फैयाजुल आजम को 18,858 वोट से हरा दिया।

2000 में दिलीप कुमार वर्मा को भाजपा से टिकट मिला। उन्होंने मोतीउर रहमान को 26445 वोट से हरा दिया था। 

2005 में बिहार में दो बार चुनाव हुए थे। एक चुनाव फरवरी में हुए थे, वहीं दूसरे चुनाव अक्तूबर में हुए थे। 2005 में उन्होंने फरवरी का चुनाव जीता था लेकिन अक्तूबर का चुनाव हार गए थे। 2005 फरवरी में दिलीप वर्मा समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़कर निर्दलीय फिरोज आलम को 6657 वोट से हरा दिया था। 


 

2005 अक्तूबर में फिरोज आलम को मिली जीत 

अक्तूबर 2005 के विधानसभा चुनाव में फिरोज आलम कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे। उन्होंने समाजवादी पार्टी के चुनाव लड़ रहे और लगातार चार बार जीते दिलीप वर्मा को 7599 वोट से हरा दिया। 

2010: फिर दिलीप वर्मा को जीत 

2010 में एक बार फिर दिलीप वर्मा ने सीट पर वापसी की। मुकाबला फिर से फिरोज आलम के साथ ही था। दिलीप वर्मा ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जदयू के फिरोज आलम को 8779 वोट से हरा दिया था। 

दो भाइयों की लड़ाई, दोनों हारे

2015 में भाजपा ने दिलीप वर्मा को टिकट दिया। लेकिन वह जीत नहीं पाए। इस बार जदयू के फिरोज आलम को जीत मिली थी। दिलीप वर्मा ने फिरोज आलम को 2835 वोट से हरा दिया था। इस बार दिलीप वर्मा के सगे भाई धर्मेश कुमार वर्मा भी उनके खिलाफ चुनावी मैदान में थे। उन्हें सपा से टिकट मिला था। हालांकि वह 693 वोट से साथ 11वें स्थान पर थे। 

भाकपा (माले) को मिली जीत

2020 के विधानसभा चुनाव में सिकटा सीट पर भाकपा (माले) के वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता ने निर्दलीय दिलीप वर्मा को 2,302 वोट से हरा दिया। इस चुनाव में फिरोज आलम ने जदयू से चुनाव लड़ा था। वह तीसरे नंबर पर रहे। उन्हें 21.05 वोट मिले थे। 


 
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