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सीट का समीकरण: 18 में 14 बार परसा सीट पर जीता तेज प्रताप यादव के ससुर का परिवार, दरोगा प्रसाद रहे मुख्यमंत्री

Sat, 21 Jun 2025 09:56 AM IST
संध्या इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला
इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला Published by: संध्या Updated Sat, 21 Jun 2025 09:56 AM IST
सार

‘सीट का समीकरण’ सीरीज की बारहवीं कड़ी में आज हम आपको जोकीहाट विधानसभा सीट के बारे में बताएंगे। इस सीट पर सबसे बड़ा चेहरा तस्लीमुद्दीन थे। यह सीट उनका गढ़ रही थी। 2020 में उनके बेटे शाहनवाज ने यहां से चुनाव जीता था।

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बिहार चुनाव 2025 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बिहार में साल के अंत में चुनाव होने हैं। सभी पार्टियां चुनाव की तैयारियों में जुट चुकी हैं। इस चुनावी साल में अमर उजाला अलग-अलग सीरीज के जरिए बिहार की सियासत के बारे में बता रहा है। इसी से जुड़ी ‘सीट का समीकरण’ सीरीज की 12वीं कड़ी में आज परसा विधानसभा सीट की बात। 2020 में यहां से आरजेडी के छोटे लाल राय जीते थे।  इस सीट पर 18 बार चुनाव हुए हैं जिसमें से 14 बार बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा प्रसाद और उनके परिवार के लोगों को जीत मिली है। इस सीट पर हमेशा से यादव उम्मीदवार जीतता रहा है। 

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सारण जिले की सीट है परसा
बिहार के 38 जिलों में से एक सारण जिला भी है। यह जिला 3 अनुमंडल और 20 ब्लॉक में बंटा हुआ है। सारण जिले में कुल 10 विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें एकमा, मांझी, बनियापुर, तरैया, मढ़ौरा, छपरा, गरखा , अमनौर, परसा, सोनपुर विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। आज बात परसा विधानसभा सीट की करेंगे। परसा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र सारण लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है। इस सीट पर सबसे पहले 1952 में चुनाव हुआ था।  


 
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1952 में इस सीट से पहली बार जीते बिहार के 10वें मुख्यमंत्री 
पूरे देश के साथ बिहार की परसा सीट पर भी 1952 में पहली बार चुनाव हुए। इस चुनाव में कांग्रेस के दरोगा प्रसाद राय को जीत मिली।  राय ने सोशलिस्ट पार्टी के धरीक्षण राय को 6,502 वोट से हरा दिया। इसके बाद 1957, 1962, 1967, 1969, 1972 में बिहार के विधानसभा चुनाव में भी परसा सीट से दरोगा प्रसाद को जीत मिलती रही। यह सभी चुनाव उन्होंने कांग्रेस पार्टी के टिकट पर ही लड़े। 

1957 में दरोगा प्रसाद ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सुखदेव नारायण सिंह को 7,538 वोट से हराया। 1962 में पीएसपी के महेंद्र सिंह को दरोगा प्रसाद से 5,325 वोट से हार का सामना करना पड़ा। 1967 में दरोगा प्रसाद ने संघटा सोशलिस्ट पार्टी के वाई. प्रसाद 5,573 वोट से हराया। 1969 में कांग्रेस के दारोगा प्रसाद राय ने निर्दलीय निरंजन प्रसाद सिंह को 7,793 वोट से हराया। इसी चुनाव के बाद ही दारोगा प्रसाद राय बिहार के मुख्यमंत्री बने।  1972 में कांग्रेस के दरोगा प्रसाद ने निर्दलीय रामा नंद प्रसाद यादव 23,633 वोट से हरा दिया था। यह जीत दरोगा प्रसाद की अब तक की सबसे बड़ी जीत थी। 

 

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कैसे मुख्यमंत्री बने दरोगा प्रसाद? 
बात 1969 की है, बिहार में किसी दल के सरकार न बना पाने की वजह से राज्य में 4 जुलाई 1969 को राष्ट्रपति शासन का एलान कर दिया गया। यह वह दौर था, जब कांग्रेस आंतरिक कलह से जूझ रही थी और इसके दो धड़े कांग्रेस-आर (इंदिरा गांधी गुट)  और कांग्रेस-ओ (कामराज गुट) के बीच सत्ता का संघर्ष गहराता जा रहा था। कांग्रेस के दो धड़ों- कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर) में टूटने का असर बिहार में भी दिखा और यहां पार्टी के 50 विधायक के. कामराज के नेतृत्व वाली कांग्रेस (ओ) और 60 विधायक इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस (आर) का हिस्सा बने। 

बिहार में 16 फरवरी 1970 को राष्ट्रपति शासन तब हटा, जब कांग्रेस-रेक्विजिशनिस्ट यानी कांग्रेस (आर) के नेतृत्व में छह पार्टियों के गठबंधन ने राज्य में सरकार बनाई। इसका नेतृत्व पार्टी नेता दरोगा प्रसाद राय ने किया, जिनका सीएम पद का रास्ता कभी हरिहर सिंह ने रोका था। इस गठबंधन में पीएसपी, भाकपा, एचयूआई झारखंड, शोषित दल और भारतीय क्रांति दल शामिल थे। 


 

बस कंडक्टर की वजह से एक साल भी सीएम पद पर नहीं रह सके दरोगा प्रसाद 
पिछली सरकारों की तरह ही इस सरकार को भी गठबंधन रास नहीं आया और 18 दिसंबर 1970 को बिहार विधानसभा में लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को डीपी राय हरा नहीं पाए। बताया जाता है कि दरोगा प्रसाद राय के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास होने की वजह एचयूआई झारखंड की नाराजगी भी थी और इसके पीछे वजह थी एक कंडक्टर के निलंबन की घटना। बताया जाता है कि बिहार राज पथ परिवहन के एक आदिवासी कंडक्टर को सेवा से निलंबित कर दिया गया था। जब यह कंडक्टर झारखंड की मुख्य पार्टी के नेता बागुन सुम्ब्रई के पास मदद के लिए पहुंचा, तो उन्होंने सीएम दरोगा प्रसाद से कंडक्टर का निलंबन वापस लेने के लिए कहा। हालांकि, सीएम राय ने जब एक हफ्ते तक प्रतिक्रिया नहीं दी, तो बागुन सुम्ब्रई ने समर्थन वापस लेने का ऐलान कर दिया।

उनकी सरकार के खिलाफ में पड़े 164 वोट, जबकि पक्ष में आए 146 वोट। इस अविश्वास प्रस्ताव को कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व वाली एसएसपी, जनसंघ, पीएसपी के बागी गुट, जनता पार्टी, कांग्रेस (ओ), स्वतंत्र पार्टी और शोषित दल के बीपी मंडल धड़े ने समर्थन दिया। सत्तासीन गठबंधन में दो धड़ों के बागी हो जाने की वजह से ही दरोगा प्रसाद राय महज 10 महीने ही सरकार चला पाए। 

1977 में चुनाव हारे दरोगा प्रसाद 
परसा से लगातार 6 बार चुनाव जीतने के बाद 1977 के बिहार विधानसभा चुनाव में दरोगा प्रसाद को हार का सामना करना पड़ा। अप्रैल 1975 से अप्रैल 1977 का दौर बिहार के साथ-साथ पूरे देश के लिए कई बदलावों का दौर रहा। जेपी आंदोलन की लहर में दरोगा प्रसाद को भी हार का सामना करना पड़ा। इस चुनाव में जनता पार्टी के रामानंद प्रसाद यादव ने कांग्रेस के दरोगा प्रसाद रॉय 12,780 वोट से हरा दिया था।

1980:  दरोगा प्रसाद ने फिर दर्ज की जीत
1977 में हार का सामना करने के बाद एक बार फिर से 1980 में दरोगा प्रसाद की परसा सीट पर वापसी हुई। इस चुनाव में दरोगा प्रसाद राय ने कांग्रेस (आई) के टिकट पर चुनाव लड़कर सीपीआई के राम नाथ सिंह को 41,292 वोट से हरा दिया। 


 

1981: दरोगा प्रसाद राय का निधन
15 अप्रैल 1981 को दरोगा प्रसाद राय का निधन हो गया। उनके निधन के बाद परसा सीट खाली हो गई। इसके बाद सीट पर उपचुनाव कराए गए। उपचुनाव में दरोगा प्रसाद की पत्नी ने चुनाव जीत लिया। कांग्रेस (आई) से पार्वती देवी ने जनता पार्टी के बी.पी.सिंह को 15,563 वोट से हरा दिया था। 

लगातार पांच बार परसा से जीते दरोगा प्रसाद राय के बेटे 
1985 में दरोगा प्रसाद के बेटे चंद्रिका राय ने परसा सीट से जीत दर्ज की। चंद्रिका प्रसाद ने परसा सीट से पहली बार चुनाव लड़कर अपने चुनावी करियर की शुरुआत की। चंद्रिका राय ने अपने पिता की जगह लेते हुए कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की थी। कांग्रेस के चंद्रिका राय ने सीपीआई के राम नाथ विद्यार्थी  को 11,574 वोट से हरा दिया। इसके बाद 1990, 1995, 2000, 2005 के चुनाव में लगातार चंद्रिका राय को जीत मिलती रही। लेकिन इस दौरान वह अपनी पार्टी लगातार बदलते रहे। 

1990 में चंद्रिका राय ने कांग्रेस से अलग होकर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। चंद्रिका राय ने सीपीआई के राम नाथ विद्यार्थी को 26,835 वोट से हरा दिया। 1995 में चंद्रिका राय ने जनता दल के टिकट पर जीत हासिल की। इस चुनाव में उन्होंने समता पार्टी के राम नाथ विद्यार्थी को 14,588 वोट से हराया। 2000 में चंद्रिका राय ने राजद के टिकट पर जीत हासिल की। उन्होंने कांग्रेस के राम नाथ विद्यार्थी को 45,510 वोट से हराया। 

2005 में बिहार में दो बार चुनाव हुए थे। पहली बार फरवरी और दूसरी बार अक्तूबर में यह चुनाव हुए थे। उनमें से पहला चुनाव तो चंद्रिका प्रसाद जीत गए थे लेकिन दूसरा चुनाव वह हार गए थे। फरवरी 2005 में चंद्रिका राय राजद के टिकट पर जीते। उन्होंने जदयू) के छोटेलाल राय को 3072 वोट से हराया। 

 

अक्तूबर 2005: चंद्रिका राय को मिली पहली हार
2005 में जब दूसरी बार अक्तूबर में चुनाव हुए तो इस बार चंद्रिका राय को हार का सामना करना पड़ा। चंद्रिका राय को जदयू के छोटेलाल राय ने 10,373 वोट से हरा दिया। 2010 के चुनाव में भी चंद्रिका राय को हार का सामना करना पड़ा था। 2010 में भी जदयू के छोटेलाल राय को ही जीत मिली। इस चुनाव में जदयू के छोटेलाल राय ने राजद के चंद्रिका राय को 4,689 वोट से हराया। 



 

चंद्रिका राय से छोड़ी राजद
2015 में चंद्रिका राय ने राजद के टिकट पर एक बार फिर चुनाव जीता। इस बार उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी से चुनाव लड़ रहे छोटेलाल राय को 42,335 वोट से हराया। 2018 में राजद से चंद्रिका राय का रिश्ता सिर्फ चुनावों का नहीं रहा बल्कि पारिवारिक हो गया। चंद्रिका राय की बेटी ऐश्वर्या राय की शादी लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव से हुई। इसके बाद दोनों परिवारों में संबंध और मजबूत होते दिखे। हालांकि छह महीने बाद ही शादी में दरार पड़ गई। इसके बाद दोनों अलग रहने लगे। तलाक की अर्जी को कोर्ट में दाखिल किया गया। 

इसके बाद फरवरी 2020 में चंद्रिका राय ने राजद से इस्तीफा दे दिया। पार्टी छोड़ने के साथ राय ने एएनआई से कहा, "मैंने पहला कदम उठाया है और राजद छोड़ दी है। देखते हैं क्या होता है। पार्टी में चीजें जिस तरह से चल रही हैं, वह मेरी समझ से परे है। मुझे यह भी नहीं पता कि पार्टी में कौन काम करता है।”

अक्तूबर 2020 में बिहार में फिर से विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में चंद्रिका राय ने जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ा। राजद ने इस बार छोटेलाल राय को टिकट दिया। चुनाव के नतीजे आए तो चंद्रिका राय को हार का सामना करना पड़ा। राजद के छोटेलाल राय ने उन्हें 17,293 वोट से हरा दिया।


 
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