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Landslides: पर्वतीय इलाकों में बारिश से बड़ा खतरा मंडराया, पहाड़ों की टो कटिंग से खिसक रहा गुरुत्वाकर्षण!

Wed, 31 Jul 2024 06:53 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Wed, 31 Jul 2024 06:53 PM IST
सार

केरल में पहाड़ के खिसकने के बाद मची तबाही से अब वैज्ञानिकों में उत्तर भारत के बेतरतीब बसे पहाड़ों को लेकर चिंता सताने लगी है। भू वैज्ञानिकों का कहना है पहाड़ों का गुरुत्वाकर्षण केंद्र अपनी जगह से खिसकने लगा है। यही नहीं आबादी वाले पहाड़ खोखले भी होने लगे हैं।

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Big danger looms over mountainous areas due to rain, gravity is shifting due to toe cutting of mountains!
encroachment - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

केरल में लगातार बारिश के बाद हुई लैंडस्लाइडिंग से बड़ी तबाही मच गई। वायनाड में तकरीबन डेढ़ सौ लोगों की मौत हो चुकी है। जबकि अभी भी लगातार मलबे से शव और फंसे लोग निकाले जा रहे हैं। केरल में हुई इस घटना के बाद सबसे ज्यादा चिंता अब उत्तर भारत के उन पहाड़ी क्षेत्रों को लेकर हो रही है, जहां पर बीते कुछ वर्षों में सबसे ज्यादा पहाड़ों के खिसकने की घटनाएं सामने आई हैं। देश के प्रमुख भौगोलिक विशेषज्ञों और मौसम के जानकारों का मानना है लगातार हो रही बारिश और बेतरतीब बसावट से पहाड़ों का न सिर्फ गुरुत्वाकर्षण केंद्र अपने स्थान से खिसक रहा है, बल्कि यह पहाड़ अंदर से खोखले भी होने लगे हैं। बारिश के दौरान ऐसे ही पहाड़ों पर सबसे ज्यादा तबाही की आशंका बनी रहती है।

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केरल में पहाड़ के खिसकने के बाद मची तबाही से अब वैज्ञानिकों में उत्तर भारत के बेतरतीब बसे पहाड़ों को लेकर चिंता सताने लगी है। भू वैज्ञानिकों का कहना है पहाड़ों का गुरुत्वाकर्षण केंद्र अपनी जगह से खिसकने लगा है। यही नहीं आबादी वाले पहाड़ खोखले भी होने लगे हैं। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया से ताल्लुक रखने वाले वैज्ञानिकों ने बताया कि आने वाले दिनों में पहाड़ों के खिसकने की जो घटना केरल में हुई है, वह उत्तराखंड समेत हिमाचल और पूर्वोत्तर के राज्यों में भी देखी जा सकती है। 
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जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व वैज्ञानिक डॉक्टर एसएन चंदेल कहते हैं कि दक्षिण में जिस तरीके से यह बड़ी घटना हुई है, ठीक उसी तरह पिछले साल हिमाचल, उत्तराखंड में भी ऐसी ही घटनाएं सबसे ज्यादा हुई थीं। उनका कहना है कि पहाड़ों पर हो रहे लगातार अतिक्रमण से पहाड़ों का पूरा गुरुत्वाकर्षण केंद्र डिस्टर्ब हो गया है। पहाड़ों की टो कटिंग और बेतरतीब तरीके से हो रहे निर्माण की वजह से ऐसे हालात बने हैं। डॉक्टर चंदेल का कहना है कि कोई भी पहाड़ तभी तक टिका रह सकता है, जब उसका गुरुत्वाकर्षण केंद्र स्थिर हो। पहाड़ों की तोड़फोड़ और पहाड़ों पर बेवजह के बोझ से उसका स्थिर रखने वाला गुरुत्वाकर्षण केंद्र अपनी जगह छोड़ देता है। इस बात की जानकारी अतिक्रमण करने वालों को नहीं होती है और नतीजा पहाड़ों के खिसकने से लेकर अकसर होने वाली लैंडस्लाइड के तौर पर सामने आता है। वह कहते हैं कि बारिश के दौरान ऐसी घटनाएं पहाड़ों के खिसके हुए गुरुत्वाकर्षण और कमजोर तथा खोखले होने में सबसे ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं।
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डॉक्टर चंदेल बताते हैं कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर से लेकर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से लेकर नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में पहाड़ों पर एक शोध किया था। इस शोध में पहाड़ों की मजबूती और पहाड़ों की मिट्टी से लेकर उसके पूरे भौगोलिक परिदृश्य को शामिल किया गया था। डॉक्टर चंदेल बताते हैं कि उन्होंने अपने अध्ययन में पाया था कि वह पहाड़ जहां पर इंसानी बस्तियां बहुत ज्यादा बसने लगी है, वह पहाड़ धीरे-धीरे ही सही लेकिन खोखले होते जा रहे हैं। उनका कहना है कि पहाड़ पर बनने वाले एक मकान या एक सड़क या एक टनल के लिए भी वैज्ञानिक सर्वेक्षण बहुत जरूरी होता है। उनका कहना है क्योंकि पहाड़ की मजबूती बनाए गए मकान, बनाई गई सड़कों और बनाई गई टनल के दौरान काटे गए पहाड़ के मलबे से ही जुड़ी होती है। वह कहते हैं कि पहाड़ का जितना मलबा पहाड़ से अलग हो जाता है दरअसल वह पहाड़ को खोखला ही करता है। डॉक्टर चंदेल ने अपनी इस रिपोर्ट को पहाड़ी राज्यों को भी सौंपी थी और उनकी सिफारिश थी कि जिन राज्यों में ऐसे मकान बनाए जाते हैं या ऐसा विकास होता है वहां पर पहाड़ों की कटिंग के बैलेंस का पूरा ध्यान रखा जाए। क्योंकि इस बैलेंस के बिगड़ने से पहाड़ों के खोखले होने से लेकर पहाड़ों के दरकने, टूटने, चिटकने और बिखरने का पूरा खतरा बढ़ जाता है।


भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वे के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक डॉक्टर चंदेल के मुताबिक, वैसे तो पहाड़ों के खिसकने की घटनाएं पहाड़ी इलाकों में सामान्य सी बात हैं, लेकिन जब यह घटनाएं किसी मानव निर्मित निर्माण के साथ होती हैं, तो इस पर चिंता करने की आवश्यकता बढ़ जाती है। डॉक्टर चंदेल का कहना है कि बरसात के दौरान पहाड़ों पर अधिक बारिश होने की वजह से लैंडस्लाइड होना आम बात है। इसलिए आज से नहीं दशकों से मानसून के दौरान पहाड़ों पर रहने वाले लोगों को हमेशा से अलर्ट किया जाता रहा है। मैदानी इलाकों से पहाड़ों पर जाने वाले लोगों को इस बात के लिए आगाह किया जाता रहा है कि वह इन इलाकों में जाने से बचें। उनका कहना है कि वह तेज बारिश और कमजोर हो चले पहाड़ों के चलते ही हुई है।

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