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आजाद भारत में दो बार बंद हुए बड़े नोट, दोनों ही बार गुजराती पीएम ने किया फैसला
अमर उजाला ब्यूरो/ नई दिल्ली
Updated Thu, 10 Nov 2016 04:49 AM IST
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- फोटो : PTI
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आजाद भारत में बड़े नोटों को प्रचलन से हटाने का फैसला दो बार हुआ। जिस समय और जिन परिस्थितियों में दोनों ही मामलों में यह फैसला लिया गय उसमें कई अदभुत करने वाली समानता है। मसलन बड़े नोट को बंद करने का फैसला लेने वाले न सिर्फ दोनों प्रधानमंत्रियों बल्कि इस फैसले में अहम भूमिका निभाने वाले भारतीय रिजर्व बैंक केगवर्नरों का ताल्लुक गुजरात से है। दोनों ही बार फैसले केंद्र की सत्ता परिवर्तन के बाद लिए गए। हालांकि पहली बार जब बड़े नोटों को प्रचलन से हटाने का निर्णय लिया गया तब देश के वित्त मंत्री एचएम पटेल भी गुजरात के ही थे।
जेपी आंदोलन के दौरान बतौर युवा छात्र नेता अहम भूमिका निभाने वाले पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी बताते हैं कि उस दौरान भी बेहद गुपचुप तरीके से निर्णय लिया गया और ठीक इस बार की तरह मोरारजी देसाई सरकार ने भी फैसला लेने के एक दिन बाद तक बैंक को बंद रखने का फैसला किया।
उस समय भी आज की तरह ही कालाधन के खिलाफ देश में माहौल बना था। हालांकि तब बड़े नोटों तक बहुत कम लोगों की पहुंच होने के कारण फैसले से अफरातफरी वाले हालात पैदा नहीं हुए थे। एक अंतर यह भी है कि मोरारजी ने इस आशय की घोषणा सुबह की थी जबकि पीएम मोदी ने देर शाम इसकी घोषणा की।
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गौरतलब है कि साल 1977 के अंत में सत्ता पर काबिज होने केकुछ महीने बाद ही 16 जनवरी 1978 को प्रधानमंत्री देसाई ने 1000, 5000 और 10000 के नोट वापस लेने की घोषणा कर दी थी। इसके लिए सरकार ने अध्यादेश का सहारा लिया था। आजादी से ठीक पहले 1946 में बड़े नोट बंद किए गए थे, हालांकि साल 1954 में नेहरू सरकार ने बड़े नोटों को फिर से प्रचलन में लाने का फैसला किया था।
इस पर 24 साल पर देसाई सरकार ने रोक लगाई। हालांकि तब देसाई ने बड़े नोटों को बंद करने के बाद नई श्रेणी की किसी भी तरह के बड़े नोट का चलन शुरू करने की घोषणा नहीं की थी। जबकि मोदी सरकार ने 500 के नोट को नए डिजाइन में जबकि 2000 के नोट को पहली बार उतारने की घोषणा की है।
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जेपी आंदोलन के दौरान बतौर युवा छात्र नेता अहम भूमिका निभाने वाले पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी बताते हैं कि उस दौरान भी बेहद गुपचुप तरीके से निर्णय लिया गया और ठीक इस बार की तरह मोरारजी देसाई सरकार ने भी फैसला लेने के एक दिन बाद तक बैंक को बंद रखने का फैसला किया।
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उस समय भी आज की तरह ही कालाधन के खिलाफ देश में माहौल बना था। हालांकि तब बड़े नोटों तक बहुत कम लोगों की पहुंच होने के कारण फैसले से अफरातफरी वाले हालात पैदा नहीं हुए थे। एक अंतर यह भी है कि मोरारजी ने इस आशय की घोषणा सुबह की थी जबकि पीएम मोदी ने देर शाम इसकी घोषणा की।
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गौरतलब है कि साल 1977 के अंत में सत्ता पर काबिज होने केकुछ महीने बाद ही 16 जनवरी 1978 को प्रधानमंत्री देसाई ने 1000, 5000 और 10000 के नोट वापस लेने की घोषणा कर दी थी। इसके लिए सरकार ने अध्यादेश का सहारा लिया था। आजादी से ठीक पहले 1946 में बड़े नोट बंद किए गए थे, हालांकि साल 1954 में नेहरू सरकार ने बड़े नोटों को फिर से प्रचलन में लाने का फैसला किया था।
इस पर 24 साल पर देसाई सरकार ने रोक लगाई। हालांकि तब देसाई ने बड़े नोटों को बंद करने के बाद नई श्रेणी की किसी भी तरह के बड़े नोट का चलन शुरू करने की घोषणा नहीं की थी। जबकि मोदी सरकार ने 500 के नोट को नए डिजाइन में जबकि 2000 के नोट को पहली बार उतारने की घोषणा की है।