फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Before the Adani case demand for JPC on Rafale-Pegasus was also rejected BJP is getting Sanjivani from here

JPC: अदाणी मामले से पहले राफेल-पेगासस पर भी जेपीसी की मांग हुई थी खारिज, भाजपा को यहां से मिल रही संजीवनी

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Wed, 12 Apr 2023 09:03 PM IST
विज्ञापन
सार
अदाणी मामले को लेकर कांग्रेस सहित करीब 19 विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार और भाजपा पर निशाना साधा है। इन दलों की मांग है कि उक्त मामले की जांच के लिए 'जेपीसी' गठित की जाए। बजट सत्र के दूसरे चरण में इस मुद्दे को लेकर जबरदस्त हंगामा हुआ था।
loader
Before the Adani case demand for JPC on Rafale-Pegasus was also rejected BJP is getting Sanjivani from here
मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी। - फोटो : Social Media

विस्तार

केंद्र सरकार ने विपक्षी दलों की उस मांग को खारिज कर दिया है, जिसमें अदाणी मामले की जांच, ज्वाइंट पार्लियामेंट्र्री कमेटी (जेपीसी) से कराने की मांग की जा रही थी। हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट सामने आने के बाद शुरु हुए विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने छह सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एएम सप्रे को इस समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। 'अदाणी' मामले से पहले 'राफेल' लड़ाकू हवाई जहाज और 'पेगासस' कथित जासूसी प्रकरण पर भी कांग्रेस व दूसरे कई विपक्षी दलों ने जेपीसी गठित करने की मांग की थी। तब भी केंद्र की भाजपा सरकार ने विपक्ष की उस मांग को खारिज कर दिया था। खास बात है कि राफेल और पेगासस, इन दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट से सरकार को राहत मिल गई। सर्वोच्च अदालत की तरफ से ऐसी कोई बात नहीं कही गई, जिससे विपक्षी दलों को केंद्र सरकार को घेरने का कोई बड़ा मौका मिलता।



जब पवार ने यू-टर्न लेने में भी देर नहीं लगाई
बता दें कि अदाणी मामले को लेकर कांग्रेस सहित करीब 19 विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार और भाजपा पर निशाना साधा है। इन दलों की मांग है कि उक्त मामले की जांच के लिए 'जेपीसी' गठित की जाए। बजट सत्र के दूसरे चरण में इस मुद्दे को लेकर जबरदस्त हंगामा हुआ था। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख शरद पवार, जो पहले इस मामले पर विपक्ष के साथ खड़े थे। हाल ही में उन्होंने जेपीसी की मांग से किनारा कर लिया था। पवार ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट की जांच से ही सही नतीजे सामने आएंगे। जेपीसी में तो सरकार के ही ज्यादा लोग होते हैं। विपक्षी दलों, खासतौर से कांग्रेस पार्टी में जब पवार के इस बयान पर खलबली मची तो उन्होंने यू-टर्न लेने में भी देर नहीं लगाई। पवार ने कहा, हमारे गठबंधन के सहयोगियों का मत मुझसे अलग है, लेकिन हमें एकजुट होकर काम करना है। मैंने तो केवल अपना मत सार्वजनिक तौर पर रखा था। अब मेरे सहयोगियों को लगता है कि जेपीसी की जांच होनी चाहिए तो हमारी पार्टी इसका विरोध नहीं करेगी। 


राफेल मामले में भी जेपीसी से परहेज
इससे पहले राफेल लड़ाकू हवाई जहाज के सौदे की जाँच के लिए कांग्रेस पार्टी ने जेपीसी गठित करने की मांग की थी। राहुल गांधी ने इस मामले में केंद्र सरकार को घेरने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। पांच साल पहले केंद्र ने कांग्रेस की मांग को सिरे से नकार दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने राफेल डील को तय प्रक्रिया के अनुसार बताते हुए सरकार को क्लीनचिट दे दी थी। राहुल गांधी को सर्वोच्च अदालत से माफी मांगनी पड़ी थी। वजह, राहुल ने राफेल केस में सुप्रीम कोर्ट के बयान को सार्वजनिक मंच पर गलत तरह से पेश कर दिया था। यह मामला उस वक्त सामने आया था, जब राफेल डील के लीक दस्तावेजों को सबूत मानकर सर्वोच्च अदालत, केस की दोबारा सुनवाई के लिए तैयार हो गया था। 

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था पेगासस मामला
पेगासस मामले की जांच के लिए भी कांग्रेस पार्टी व दूसरे कई दलों ने जेपीसी के गठन की मांग की थी। हालांकि बाद में कांग्रेस ने कहा, अगर केंद्र सरकार जेपीसी जांच के लिए तैयार नहीं है तो इसकी न्यायिक जांच कराई जाए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट, जांच कमेटी का गठन कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस रवींद्रन की अध्यक्षता में एक टेक्निकल कमेटी गठित कर दी थी। जब इस कमेटी की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश की गई तो उसमें 29 में से पांच मोबाइल फोन में मैलवेयर मिलने की बात कही गई। यह भी कहा गया कि इसे जासूसी नहीं माना जा सकता। इस मामले में भी विपक्ष के हाथ कुछ नहीं लग सका। ये तीनों ही मामले सुप्रीम कोर्ट पहुँचे हैं।अदाणी मामले की जाँच अभी चल रही है। भाजपा को अदालती जाँच से परहेज नहीं है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले की जाँच के लिए कमेटी गठित करने के बाद भाजपा ने भी राहत की साँस ली थी। राहुल गांधी की सांसदी खत्म होने के बाद जब कांग्रेस पार्टी ने प्रदर्शन किया तो गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें अदालत में जाने की सलाह दी थी।

जेपीसी के गठन से दूर क्यों भागती हैं सरकारें
इस तरह की जांच से सत्ताधारी दल दूर क्यों भागते हैं, इसके पीछे कई तर्क दिए जाते हैं। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा है, जेपीसी के गठन का कोई नुकसान भी नहीं है। लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचारी के अनुसार, ये बात सही है कि जेपीसी में बहुमत, सत्ताधारी पार्टी का ही रहता है। कमेटी का चेयरमैन भी उसी पार्टी का सांसद होता है। इन परिस्थितियों में ऐसा संभव है कि कमेटी का चेयरमैन अपने दल के नेतृत्व के मुताबिक रिपोर्ट को आकार दे। जेपीसी गठित होती है तो सत्ताधारी पार्टी के भीतर एक अपराध बोध रहता है। सरकार, पार्टी नेतृत्व और दूसरे लोग डरते हैं। उन्हें भय रहता है कि जेपीसी के समक्ष कई 'राज' खुल जाएंगे। जेपीसी में तो अनेक राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि रहते हैं। वे अपने तरीके से बात रखते हैं। जब भी 'ज्वाइंट पार्लियामेंट कमेटी' गठित हुई है, उससे फायदा ही हुआ है। जेपीसी को एक तय प्रक्रिया के तहत सबूत जुटाने का हक होता है। वह अपने समक्ष किसी भी व्यक्ति या संस्था को बुला सकती है। पूछताछ करने के अलावा विभिन्न पक्षों से दस्तावेज तलब करने का अधिकार जेपीसी के पास रहता है। अगर वह व्यक्ति या संस्था, जेपीसी के सामने पेश नहीं होता है तो उसे संसद की अवमानना समझा जाता है। 

'राज' खुलने का डर बना रहता है
पीडीटी आचारी के मुताबिक, जेपीसी में बाकी राजनीतिक दलों के लोग भी होते हैं। अनेक ऐसी बातें जो पहले सार्वजनिक प्लेटफार्म पर नहीं थी, संभव है कि वे बाहर आ जाएं। जेपीसी के समक्ष, मामले से जुड़े लोगों को बुलाया जाता है। सारा रिकॉर्ड तलब होता है। जिस कंपनी या संगठन पर आरोप लगे हैं, उसके लोग भी कमेटी के सामने आएंगे। बहुत सी ऐसी बातें, जो पर्दे के पीछे छिपी रहती हैं। सत्ताधारी दल भी नहीं चाहता कि वे सार्वजनिक हों। जेपीसी में वह पर्दा उठने की संभावना बनी रहती है। हालांकि जेपीसी के बल पर चुनाव नहीं लड़ा जाता। इसकी वजह से चुनाव में हार या जीत जैसा कुछ नहीं होता। पार्टी के भीतर एक अपराध बोध रहता है। नेतृत्व और पार्टी के दूसरे लोग डरते हैं। उन्हें भय रहता है कि कई 'राज' खुल जाएंगे। बाकी कोई विशेष तर्क नहीं है। ऐसा जरुरी नहीं है कि जेपीसी की जांच में अवश्य कुछ ठोस निकलेगा। केवल कुछ राज ही मालूम चलेंगे। बस इसी वजह से सत्ताधारी पार्टी, जेपीसी का गठन करने से बचती है। 
  
इन मामलों में गठित हुई है जेपीसी
1987 में जब राजीव गांधी सरकार पर बोफोर्स तोप खरीद मामले में घोटाले के आरोप लगे तो जेपीसी गठित की गई थी। इसके बाद 1992 में जब केंद्र में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी तो सुरक्षा एवं बैंकिंग लेन-देन में अनियमितता का आरोप लगा। उस वक्त पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। मामले की जांच के लिए विपक्ष ने जेपीसी गठित करने की मांग उठाई। नतीजा, दूसरी बार जेपीसी का गठन हुआ। साल 2001 में स्टॉक मार्केट घोटाला सामने आया। इस मामले में भी विपक्षी दलों ने जेपीसी के गठन को लेकर सरकार पर दबाव डाला। उस साल तीसरी जेपीसी गठित की गई। इसके बाद देश में सॉफ्ट ड्रिंक्स और अन्य पेय पदार्थों में कीटनाशक पाए जाने का मामला गूंज उठा। संसद में जमकर हंगामा हुआ। 2003 में इस मामले की जांच के लिए जेपीसी गठित कर दी गई। यूपीए 2 के दौरान टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर विपक्ष ने कांग्रेस एवं उसके सहयोगी दलों को घेर लिया। 2011 में पांचवीं बार जेपीसी का गठन हुआ। दो साल बाद वीवीआईपी चॉपर घोटाला सामने आ गया। इसके चलते संसद की कार्यवाही बाधित रही। विपक्ष के भारी विरोध के बीच साल 2013 में यूपीए सरकार को जेपीसी गठित करनी पड़ी। यह 6वीं जेपीसी थी। मोदी सरकार में 2015 में भूमि अधिग्रहण व पुनर्वास बिल को लेकर जेपीसी का गठन किया गया। इसके बाद 2016 में आठवीं जेपीसी गठित की गई। इस बार जांच के दायरे में एनआरसी मुद्दा था। 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed