विवादों में योग गुरु रामदेव: आईएमए से पूछे 25 सवाल में तीन ऐसे कि आपका भी सिर चकरा जाए
बाबा रामदेव ने अपने सवाल में पूछा कि इंसान क्रूर हो चुका है, हैवान हो चुका है, हिंसक हो चुका है। बताओ एलोपैथ में इसका क्या इलाज है। एलोपैथ इतनी अच्छी साइंस है तो उसके डॉक्टर बीमार क्यों होते हैं। ऐसे सवालों से आईएमए समेत डॉक्टरों के सिर चकरा गए...
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बाबा रामदेव और एलोपैथी समेत उनके चिकित्सकों का इन दिनों छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है। बाबा रामदेव ने जब एलोपैथ को 'स्टूपिड साइंस' कहा तो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने भी नाराजगी व्यक्त करते हुए दखल दिया और उनसे खेद व्यक्त करने को कहा। बाबा ने खेद भी प्रकट किया। अपने कहे हुए शब्दों को वापस लिया। लेकिन अगले ही दिन उन्होंने 25 सवालों की ताबड़तोड़ बौछार करते हुए एलोपैथ के डॉक्टरों और फार्मा कंपनियों से ऐसे सवाल कर डाले, जिनमें कई सवाल तो लोगों के ऊपर से निकल गए। सवाल ऐसे कि लोगों के सिर चकरा जाएं। आईएमए ने तो बाबा के कुछ सवालों पर ही सवाल खड़े करते हुए कहा कि अगर उनको कुछ पूछना ही था तो कम से कम लॉजिकल तो पूछते।
बाबा रामदेव के 25 सवालों की झड़ी में सवाल नंबर 21 तो ऐसा था जिसे पढ़कर एलोपैथिक चिकित्सकों से लेकर मेडिकल एसोसिएशन और तमाम अन्य लोगों के सिर ही चकरा गए। क्योंकि बाबा सवाल तो एलोपैथ के चिकित्सकों और उनके द्वारा किए जा रहे इलाज और बीमारी पर कर रहे थे, लेकिन यह सवाल नंबर 21 कैसा था। इसमें ना बीमारी थी ना इलाज था अगर कुछ था तो एक ऐसा सवाल जिससे सिर चकरा जाए। बाबा ने इस सवाल में डॉक्टरों से पूछा आदमी बहुत हिंसक है। क्रूर है और हैवानियत कर रहा है। क्या उसे इंसान बनाने वाली एलोपैथी में कोई दवा है। अगर है तो बताई जाए।
बाबा के इस सवाल पर एलोपैथ के चिकित्सक क्या जवाब देते हैं। आईएमए के सदस्य डॉक्टर एम खरबंदा कहते हैं बाबा का यह सवाल डॉक्टरों की बजाए पूरे समाज से होता तो ज्यादा बेहतर रहता। क्योंकि इंसान की हिंसा, क्रूरता और हैवानियत को दूर करने की जिम्मेदारी हमारे पूरे समाज की है। उस समाज में हर विधा के डॉक्टरों से लेकर के हर तबके के लोग शामिल हैं जो समाज को एक नई दिशा देकर इंसान को इंसानियत के रास्ते पर ला सकते हैं। डॉक्टर खरबंदा ने बाबा रामदेव से सवाल किया कि इसमें एलोपैथ से लेकर आयुर्वेद समेत भारतीय पुरातन चिकित्सा पद्धति की दवाएं कैसे इंसान की क्रूरता हिंसा और हैवानियत को दूर कर सकती हैं।
बाबा रामदेव का सवाल नंबर 23 तो और भी कठिन था। क्योंकि बाबा रामदेव ने अपने इस सवाल में मान लिया था कि एलोपैथी और आयुर्वेद का आपस में झगड़ा है। बाबा ने देश की फार्मा इंडस्ट्री से सवाल किया और पूछा क्या उनके पास कोई ऐसी दवाई है जो एलोपैथी और आयुर्वेद के आपस में चल रहे झगड़े को खत्म कर दे। बाबा के इस सवाल पर तो फार्मा इंडस्ट्री भी सिर पकड़ कर बैठ गई।
हिमाचल प्रदेश के बद्दी में कई दवाओं को बनाने वाली कंपनी के सुनील बंसल कहते हैं पहली बात तो यह कि एलोपैथी और आयुर्वेद का आपस में कोई झगड़ा ही नहीं है। उन्होंने बाबा रामदेव पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह अकेले इस बात को कैसे तय कर सकते हैं कि आयुर्वेद का या एलोपैथ का आपस में झगड़ा है। सुनील बंसल कहते हैं जब केंद्र सरकार दोनों विधाओं को प्रमोट कर रही है। कोरोना जैसी महामारी में एलोपैथ और आयुर्वेद समेत भारतीय पुरातन चिकित्सा पद्धति ने लोगों को नई जिंदगी दी है, तो आपस में झगड़े का सवाल ही नहीं पैदा होता। बद्दी नालागढ़ फार्मा एसोसिएशन के कपिल साहनी के मुताबिक ना तो बाबा रामदेव के इस सवाल में कोई दम है और ना ही इसका कोई जवाब है। क्योंकि यह सिर्फ अपने मन की एक कुंठा से पैदा किया गया सवाल है।
बाबा रामदेव के इन दो सवालों के बाद आखिरी सवाल नंबर 25 आता है। बाबा ने अपने आखिरी सवाल में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और फार्मा कंपनियों से सवाल करते हुए कहा अगर एलोपैथी सर्वशक्तिमान है एवं सर्वगुण संपन्न है तो फिर एलोपैथी के डॉक्टर तो बीमार ही नहीं होने चाहिए। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की डॉक्टर शशि बाला कहती है यह सवाल तो एकदम बचकाना सा है। एम्स में मनोचिकित्सा विभाग के डॉक्टर एसएन धामी डॉक्टरों का कहना है कि इस सवाल का तो कोई जवाब देना ही उचित नहीं है। क्योंकि जो इंसान धरती पर आया है वह बीमार भी होगा और इस दुनिया से जाएगा भी। उन्होंने इस सवाल के जवाब में कहा कि वह बाबा रामदेव ही नहीं बल्कि किसी भी व्यक्ति से यह नहीं कहना चाहते हैं कि क्या आयुर्वेद पर भरोसा करने वाला व्यक्ति कभी बीमार नहीं होता है।
बाबा रामदेव के सबसे करीबी सहयोगी के बीमार होने और उनका एम्स ऋषिकेश में इलाज होने पर डॉ यशबाला ने कहा कि बाबा रामदेव को ऐसे सवाल करने से पहले अपने सहयोगी की बीमारी और उनके एलोपैथ से हुए इलाज के बारे में भी सोचना चाहिए था। ऐसा तो नहीं है कि बाबा के सहयोगी आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में भरोसा नहीं करते थे। जब बीमार हुए तो इंडियन मेडिकल एसोसिएशन से जुड़े एलोपैथिक डॉक्टरों ने ही उनका इलाज किया। वे कहती है इसमें कोई हमने बहुत बड़ा काम नहीं किया। पूरी मानवता की सेवा करना मॉडर्न मेडिकल साइंस और एलोपैथी की जिम्मेदारी है।
आयुर्वेद किसी एक व्यक्ति की जागीर नहीं हो सकती
अमेरिका की दी स्माइल ट्रेन प्रोजेक्ट के हेड डॉ वैभव खन्ना कहते हैं आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति तो हमारी अपनी चिकित्सा पद्धति है। इसे एलोपैथ और आयुर्वेद के बीच में बांटा नहीं जा सकता है। उनका कहना है कि देश के हर घर में पुरातन चिकित्सा पद्धति के माध्यम से या दादी मां के नुस्खे से आज भी इलाज होता है। वह कहते हैं कि यह सनातन प्रक्रिया भारत में सैकड़ों साल से चलती चली आ रही है। इसमें किसी एक व्यक्ति को अपने ऊपर सारा श्रेय नहीं लेना चाहिए।
उनका कहना है कि केंद्र सरकार ने तो बाकायदा भारतीय पुरातन चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने के लिए आयुष मंत्रालय का गठन किया है। केंद्र सरकार के सहयोग और आयुष मंत्रालय के कठिन प्रयासों से पूरी दुनिया भर में आज आयुर्वेद को मान्यता मिल रही है। इसलिए आयुर्वेद किसी एक व्यक्ति की जागीर तो हो ही नहीं सकती। एलोपैथ और आयुर्वेद का ना तो कभी कोई झगड़ा हो सकता है। जो चिकित्सा पद्धति इंसान की जिंदगी बचाए वही सबसे बड़ी साइंस है। इसमें आयुर्वेद, होम्योपैथ और एलोपैथ को किसी भी तरीके से विवाद में नहीं घसीटा जाना चाहिए।