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Ayodhya Case Verdict: कौन हैं रामलला विराजमान, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने सौंपी पूरी जमीन

Sat, 09 Nov 2019 06:41 PM IST
Priyesh Mishra न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Priyesh Mishra Updated Sat, 09 Nov 2019 06:41 PM IST
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Ayodhya Case Verdict Who is Ram Lalla Virajman Supreme Court Possession of Disputed Ayodhya Land
अयोध्या मामला - फोटो : Amar Ujala

अयोध्या भूमि विवाद मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने 9 नवंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने 1045 पन्नों के अपने फैसले में रामलला विराजमान को विवादित भूमि सौंपी और मंदिर बनाने का रास्ता साफ कर दिया। इसी के साथ अयोध्या में ही मस्जिद बनाने का इंतजाम भी कर दिया। 

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रामलला विराजमान को विवादित भूमि सौंपने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े का दावा भी खारिज कर दिया। साथ ही सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को किसी दूसरे जगह पांच एकड़ भूमि देने का आदेश दिया है।
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अयोध्या की विवादित जमीन के मालिकाना हक की लड़ाई आज से लगभग 135 साल पहले यानी सन 1885 में शुरू हुई थी। लेकिन, इस मामले में हिंदू पक्ष ने रामलला विराजमान को भी एक पक्ष बनाने का फैसला 1989 में लिया था। बता दें कि रामलला विराजमान को भी एक पक्ष बनाने की पहल प्रसिद्ध वकील और भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल लाल नारायण सिन्हा ने की थी।

भारतीय कानून के अनुसार, हिंदू देवता मुकदमा दायर कर सकते हैं और उनके खिलाफ भी मुकदमा चल सकता है। उन्हें एक 'न्यायिक व्यक्ति' माना जा सकता है। अयोध्या के भगवान राम को शिशु रूप में माना जाता है जो कानून के तहत नाबालिग हैं। ऐसे में रामलला विराजमान स्वंय भगवान हैं जिन्हें कोर्ट ने जमीन सौंप दी है।

जब रामलला पहली बार बने अयोध्या मामले के पक्षकार

जन्मभूमि वाले मुकदमे में भगवान राम का प्रतिनिधित्व कोर्ट में उनके मानव मित्र विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता त्रिलोकी नाथ पांडे ने किया। दीवानी अदालत से इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा स्थानांतरित होने के दो साल बाद 1989 में रामलला पहली बार वादी बने। 

1989 में ही आम चुनाव से पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश देवकी नंदन अग्रवाल ने एक याचिका दायर की थी, जो मालिकाना हक मामले में भगवान राम के जन्मस्थान के केस में मित्र बनने की मांग की थी। वह उस समय विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के कार्यकारी अध्यक्ष थे। उन्होंने अपने दावे में कहा था कि भगवान राम ही इस संपत्ति के असली मालिक हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि विवादित 2.77 एकड़ भूमि का अधिकार देवता रामलला विराजमान को सौंपा जाएगा। हालांकि यह कब्जा केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगा।

बता दें कि अगस्त 2019 को अदालत ने इस मुद्दे की दैनिक सुनवाई सुनिश्चित की और 16 अक्तूबर तक 40 दिन की मैराथन सुनवाई के बाद अपना अंतिम फैसला नवंबर में सुनाने की तारीख दी थी। इस दौरान शीर्ष कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनी। सुप्रीम कोर्ट के लंबे फैसले में कुछ ऐसे तर्क रहे, जिनके आधार पर अयोध्या में विवादित जमीन पर राम मंदिर बनने का रास्ता साफ हुआ। 

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