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Ax-4: शुभांशु शुक्ला के मिशन से डायबिटीज इलाज में आ सकती है क्रांति, माइक्रोग्रैविटी में इंसुलिन पर रिसर्च

Sat, 21 Jun 2025 04:51 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पवन पांडेय Updated Sat, 21 Jun 2025 04:51 PM IST
सार

नासा का एक्सिओम-4 मिशन सिर्फ अंतरिक्ष विज्ञान के लिए नहीं, बल्कि धरती पर करोड़ों डायबिटीज मरीजों के लिए भी उम्मीद की एक नई किरण है। इस रिसर्च से भविष्य में ऐसी तकनीकें विकसित हो सकती हैं जो डायबिटीज का इलाज आसान, सटीक और हर जगह के लिए सुलभ बना दें - चाहे वह अंतरिक्ष हो या किसी दूर-दराज गांव का मरीज।

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Axiom-4 astronauts to study insulin behaviour in microgravity, revolutionise diabetes treatment
एक्सिओम-4 मिशन के सदस्य - फोटो : ANI

विस्तार

भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला के एक्सिओम-4 मिशन के जरिए डायबिटीज के मरीजों के लिए अंतरिक्ष यात्रा का रास्ता खुल सकता है। इस मिशन में अंतरिक्ष में इंसुलिन और ग्लूकोज (ब्लड शुगर) के व्यवहार पर एक अहम अध्ययन किया जाएगा। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की हेल्थकेयर कंपनी बुर्जील होल्डिंग्स और एक्सिओम स्पेस के सहयोग से 'सूट राइड' नाम का एक खास प्रयोग किया जा रहा है। इसमें एक्सिओम-4 मिशन के कुछ अंतरिक्ष यात्री 14 दिनों तक अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) में कंटीन्युअस ग्लूकोज मॉनिटर पहनकर रखेंगे।
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क्या है इस रिसर्च का मकसद?
बुर्जील होल्डिंग्स के चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. मोहम्मद फितयान ने बताया, 'हम यह जांचना चाहते हैं कि अंतरिक्ष में खून में शुगर का स्तर कैसे बदलता है।' इस रिसर्च के तहत इंसुलिन पेन को अंतरिक्ष में दो स्थितियों - रेफ्रिजरेटर में और सामान्य तापमान पर - ले जाया जाएगा, ताकि यह देखा जा सके कि माइक्रोग्रैविटी (कम गुरुत्वाकर्षण) में इंसुलिन के अणु कैसे व्यवहार करते हैं।
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अंतरिक्ष यात्रियों और मरीजों दोनों को होगा फायदा
इस प्रयोग के नतीजे उन मरीजों के लिए खास फायदेमंद हो सकते हैं जो बेड पर ही रहते हैं या जिनकी चलने-फिरने की क्षमता सीमित है जैसे कि लकवे के मरीज। इस रिसर्च से कई सफलताएं मिलने की संभावना हैं। जिसमें 
  • बेहतर और स्मार्ट पहनने योग्य डिवाइस तैयार करना जो लगातार शुगर की निगरानी कर सकें।
  • नई दवाइयां विकसित करना जो शरीर की इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ा सकें या बैठकर रहने वालों में कसरत जैसे फायदे दे सकें।
  • एआई आधारित तकनीकें जो अंतरिक्ष में वास्तविक समय के शरीर के डेटा से इंसुलिन की जरूरत का सटीक अनुमान लगा सकें, और जिसे धरती पर भी उपयोग किया जा सके।
  • रिमोट मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म तैयार करना, जिससे दूरदराज या कम स्वास्थ्य सुविधाओं वाले इलाकों में भी डायबिटीज की देखरेख बेहतर की जा सके।

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अंतरिक्ष में डायबिटीज मरीजों को नहीं मिलती इजाजत
फिलहाल एनएएसए (नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) किसी भी इंसुलिन पर निर्भर डायबिटीज मरीज को अंतरिक्ष में जाने की अनुमति नहीं देता। हालांकि, जिनकी डायबिटीज इंसुलिन-निर्भर नहीं है, उनके लिए कोई आधिकारिक रोक नहीं है, लेकिन अभी तक ऐसा कोई अंतरिक्ष यात्री नहीं गया है। डॉ. फितयान ने कहा, 'अगर इस रिसर्च में कुछ अहम जानकारियां मिलती हैं तो इससे अंतरिक्ष में इंसुलिन पर निर्भर डायबिटीज मरीजों के लिए भी दरवाजे खुल सकते हैं, जो अब तक असंभव माना जाता था।'

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