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विवादों के तमगे, लेखन के इनाम: सुजाना अरुंधति रॉय की शख्सियत से जुड़ी दिलचस्प बातें जानिए, UAPA के तहत आरोपी

Sat, 22 Jun 2024 08:52 AM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 22 Jun 2024 08:52 AM IST
सार

सुजाना अरुंधति रॉय किसी परिचय की मोहताज नहीं। करीब 14 साल पहले 2010 में दिए गए बयान के लिए दर्ज एफआईआर के आधार पर अब इनके खिलाफ यूएपीए के तहत राजद्रोह का मुकदमा चलाने की तैयारी हो रही है। कभी आतंकी अफजल गुरु को बलि का बकरा बताती हैं, तो कभी नक्सलियों को देशभक्त। ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ के लिए बुकर प्राइज जीतने वाली अरुंधति रॉय अपनी टिप्पणियों के जरिये हमेशा विवाद में रही हैं।

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Author Arundhati Roy Controversies and personality know about first Indian booker prize winner
अरुंधती रॉय - फोटो : amar ujala graphics

विस्तार

भारत की पहली बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका- अरुंधति रॉय अपने बयानों से हमेशा विवादों में घिरी रहती हैं। अरुंधति का लेखन जितना पुरस्कृत है,  उनकी गतिविधियां और बयान उतने ही विवादित। 1997 में, प्रसिद्ध लेखिका सुजाना अरुंधति रॉय ने अपने पहले उपन्यास, 'द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स' के लिए प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार जीता। फिर, जुलाई 1998 में, उन्होंने भारत की परमाणु नीति की आलोचना पर एक विवादित लेख प्रकाशित किया। इसने रॉय को आलोचना और विवादों की ऐसी गहराइयों में डुबो दिया कि वह अब तक उससे उबर नहीं पाई हैं।
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ताजा मामला अरुंधति रॉय के खिलाफ 2010 की एक एफआईआर के संबंध में यूएपीए के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी से जुड़ा है। आरोप है कि 21 अक्तूबर, 2010 को इस विवादास्पद लेखिका ने 'आजादी द ओनली वे' नामक एक सेमिनार में देश विरोधी भाषण दिया और लोगों को भारतीय राज्य के खिलाफ कथित तौर पर भड़काया। इस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं रहा। तब यूपीए सरकार थी और उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दायर किया गया। तब कांग्रेस और भाजपा, दोनों ने ही रॉय की आलोचना की थी। यह कोई पहला मामला नहीं था, जब उन्होंने देश-विरोधी बयान दिए हों। वे हर नाजुक मसले पर बयान देती हैं और अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों में लंबेे निबंध लिखती हैं। विवादित बयानों को लेकर अरुंधति के खिलाफ 100 से ज्यादा शहरों में मुकदमे दर्ज हैं।
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मां ईसाई और पिता हिंदू

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अरुंधती रॉय - फोटो : amar ujala graphics
24 नवंबर, 1961 को शिलांग, असम (अब मेघालय) में पैदा हुई अरुंधति की मां ईसाई और पिता बंगाली हिंदू थे। जब वह दो साल की थीं, तभी उनके माता-पिता का तलाक हो गया। उसके बाद वह मां के साथ केरल आकर रहने लगीं और उनका बचपन यहीं पर बीता। उन्होंने स्कूली शिक्षा केरल से हासिल की। दिल्ली से आर्किटेक्चर की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने प्रोडक्शन डिजाइनर के तौर कॅरिअर की शुरुआत की।

मां के साथ दिलचस्प रिश्ता
रॉय का अपनी मां के साथ दिलचस्प रिश्ता है। उन्होंने बताया कि मेरी मां ने मुझे तोड़ा और बनाया। उन्हें बहुत छोटी उम्र से ही पता था कि वह एक लेखिका बनेंगी, क्योंकि उन्होंने अपनी मां की व्यक्तिगत पीड़ा को तब समझा था, जब वह सिर्फ तीन साल की थीं। वह बेगम फैलथी जान और माटी के लाल नामक दो कुत्ते भी पालती हैं। दूसरे पति प्रदीप कृष्ण से उनका तलाक नहीं हुआ है, लेकिन दोनों अलग रहते हैं। उनकी दो बेटियां हैं। वे टाइम मैगजीन की 2014 की 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल रही हैं।

फिल्मों से लेकर एक्टिविज्म तक

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अरुंधती रॉय - फोटो : amar ujala graphics
पहले पति गेरार्ड दा कुन्हा आर्किटेक्ट थे, जिनके साथ वह दिल्ली और गोवा में रहीं। उनसे तलाक के बाद वह फिल्मकार प्रदीप कृष्ण के संपर्क में आईं। फिल्म मैसी साब में एक छोटी-सी भूमिका के बाद में उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन पर एक टेलीविजन शृंखला और दो फिल्मों, एनी और इलेक्ट्रिक मून के लिए लेखन किया। व्हिच एनी गिव्स दोज वन्स के स्क्रीन प्ले के लिए उन्हें नेशनल अवाॅर्ड मिला। 1997 में गॉड ऑफ स्माल थिंग्स के लिए बुकर अवॉर्ड मिलते ही उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिल गई। हालांकि इस लेखन के लिए केरल के नेता ई. के. नयनार सहित कई लोगों के आरोप भी झेलने पड़े। इसके बाद तो राजनीतिक एक्टिविज्म की एक शृंखला ही शुरू हो गई। उन्होंने फूलन देवी पर बैंडिट क्वीन फिल्म को स्त्री-विरोधी बताया। अफगानिस्तान से लेकर ईराक और इस्रायल तक उनके तर्क थे। भारतीय संसद पर आतंकी हमले पर भी उनके तर्क अलग ही रहे। सलमान रश्दी ने उन्हें उनकी कई बातों पर आड़े हाथों लिया।

परमाणु परीक्षण का विरोध और आतंकियों का समर्थन
भारत के परमाणु परीक्षण के खिलाफ टिप्पणी करते हुए उन्होंने इसे 'नरसंहार की क्षमता से भरा हुआ' प्रयोग बताया। भारत, श्रीलंका और अमेरिका की कई सरकारी नीतियों के खिलाफ लंबेे-लंबे आलेख देशी-विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में लिखे। बाटला हाउस हो या मुंबई त्रासदी उनके पास आतंकियों के पक्ष में तर्क थे। वर्ष 2013 में नरेंद्र मोदी के नामांकन को 'त्रासदी' कहने और मोदी को 'सबसे सैन्यवादी और आक्रामक' प्रधानमंत्री उम्मीदवार बताने के लिए उनकी काफी आलोचना हुई थी।
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अरुंधती रॉय - फोटो : amar ujala graphics
नर्मदा आंदोलन में भी
नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध के खिलाफ मेधा पाटकर के साथ आंदोलन में हिस्सा लिया और फैसले को लेकर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की। इतिहासकार रामचंद्र गुहा रॉय के साहस की तो प्रशंसा करते हैं, लेकिन यह भी कहते हैं कि लेखन में अति आत्मकेंद्रीयता और सरलीकरण से उन्होंने आंदोलन के विमर्श को नुकसान पहुंचाया।

जेल भी गईं
एक मसले पर सुनवाई को लेकर उन्होंने अदालत के खिलाफ जो कुछ कहा, उस पर उन्हें जब अवमानना का नोटिस मिला, तो उन्होंने उल्टा बयान दिया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने दोषी करार देते हुए एक दिन की सांकेतिक जेल और 2,500 के जुर्माने की सजा सुनाई।

गुजरात दंगों पर भी लिखा
गुजरात दंगों पर उन्होंने आउटलुक पत्रिका में लंबा निबंध लिखा, जिसमें सांसद एहसान जाफरी की हत्या और उनकी बेटी को दंगाइयों द्वारा निर्वस्त्र करके जला देने का वर्णन था। असल में दंगाइयों ने जाफरी की हत्या तो की थी, किंतु उनकी बेटी उस समय गुजरात में न होकर अमेरिका में थी। तथ्यों की इस तोड़-मरोड़ के लिए उन्हें काफी आलोचना झेलनी पड़ी।
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