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‘दिल्ली और लाहौर की दूरी कुछ कम हो गई है’

Sat, 18 Aug 2018 01:51 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 18 Aug 2018 01:51 AM IST
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atal bihari vajpayee says The distance between Delhi and Lahore is reduced
ATAL BIHARI VAJPAYEE - फोटो : file photo
कल आए थे, आज जा रहे हैं; दुनिया का यही तरीका है। लेकिन मैं अकेला नहीं जा रहा हूं। आया भी अकेला नहीं था। मेरे साथ एक प्रतिनिधि मंडल आया है, एक डेलीगेशन आया है। भारत के चुने हुए लोग। अलग-अलग क्षेत्रों में नाम कमाने वाले मेरे साथ आए हैं। मुझे चौबीस घंटे मिले। लेकिन इन चौबीस घंटों में मुझे ऐसा लगा है कि दिल्ली और लाहौर की दूरी कुछ कम हो गई है। हम कुछ नजदीक आ गए हैं। कुछ भरोसा बढ़ गया है। साथ मिलकर चलने के लिए कदम में कुछ तेजी आ गई है।
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मैं पहली बार नहीं आया हूं और आखिरी बार भी नहीं आया हूं। पहली दफा जब मैं पाकिस्तान आया, तो अंग्रेजों का राज था। मैं कुहाड़बनी तक गया था। तब मैं हाई स्कूल का विद्यार्थी था। उस समय अनारकली गया था। बाद में विदेश मंत्री बनने के बाद पाकिस्तान आया, तो रात में पंजाब के गवर्नर साहब से मैंने कहा था कि मेरा जो ऑफिशियल प्रोग्राम है, उसमें अनारकली जाने की कोई सूरत नजर नहीं आती, मगर अनारकली जाए बिना मैं कैसे दिल्ली वापस जा सकता हूं।
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चौबीस घंटे के भीतर हमने कुछ फैसले किए हैं, अच्छे फैसले किए हैं। मुझे भरोसा है, आपको पसंद आएंगे। दुनिया हैरान है और हम भी कभी-कभी सोच-सोचकर संकोच में गड़ जाते हैं कि आखिर हम दौड़ में पिछड़ क्यों रहे हैं? कल मियां साहब ने भी यह सवाल उठाया था। यह सवाल हम सबको कुरेदता है। दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है। साम्राज्यवाद समाप्त हो गया। कहते हैं, वह ऐसा राज था, जिसमें सूरज नहीं डूबता था। मगर सूरज के देखते-देखते वह राज डूब गया। बेड़ियां टूट गईं। हथकड़ियां छूट गईं। जब तक हम गुलाम थे, यह कहकर अपना मन बहला लिया करते थे कि जब हम आजाद हो जाएंगे, तो यह करेंगे, वह करेंगे। हर बात के लिए हम कोई न कोई बहाना ढूंढ लेते थे। 
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आज दुनिया कोई बहाना सुनने को तैयार नहीं है। आज हमारा मन भी नया बहाना गढ़ने को राजी नहीं है। भगवान का दिया सब कुछ है। प्रकृति ने दौलत लुटाई है यहां। इतनी बड़ी आबादी है, जन बल है, मेहनती किसान हैं, पसीना बहाने वाला मजदूर है, थोड़ी-सी आमदनी में घर को कुशलता से चलाने वाली गृहिणी है, विज्ञान और तकनीक पर प्रभुत्व जमाने वाले नौजवान हैं। फिर हम पिछड़ क्यों रहे हैं? कल प्रधानमंत्री जी ने मेरी कविता की कुछ पंक्तियां उद्धृत कीं-

भारत-पाकिस्तान पड़ोसी, साथ-साथ रहना है/प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है/तीन बार लड़ चुके लड़ाई, कितना महंगा सौदा/रूसी बम हो या अमेरिकी, खून एक बहना है/जो हम पर गुजरी, बच्चों के संग न होने देंगे/जंग न होने देंगे। ऐसा नहीं है कि हम निठल्ले बैठे हैं। निठल्ले बैठना भी नहीं चाहिए। जूझेंगे भी हम, लेकिन किससे जूझेंगे? पड़ोसी से नहीं, आपस में नहीं, हमने छेड़ी जंग भूख से, बीमारी से, आगे आकर हाथ बटाए दुनिया सारी। हम दुनिया को दावत दे रहे हैं, आइए, हमारी मदद करिए, साथ मिलकर चलिए। हम जानते हैं कि हमें अपना विकास आप करना होगा। अपने पैरों आप खड़े रहना पड़ेगा। मगर दुनिया इतनी छोटी हो गई है कि हम अपने को टापू नहीं बना सकते।


(बस द्वारा पाकिस्तान यात्रा के दौरान लाहौर में आयोजित नागरिक अभिनंदन समारोह में 21 फरवरी, 1999 को दिया गया तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल जी के भाषण का अंश)
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