महामारी से जंग की शुरुआत में जिन उपकरणों की थी किल्लत, अब उन्हीं की बाजार बना भारत
भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने स्वदेशी कंपनियों को एन95 मास्क बनाने के लिए कुछ नियमों में ढील दे दी। यह मास्क तैयार करने वाली स्वदेशी कंपनियों के लिए अब इन हाउस टेस्टिंग की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है...
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कुछ ही दिन में तब कोरोना की लड़ाई आसान बन गई, जब अपना देश इन्हीं उपकरणों की बड़ी मार्केट बन गया। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह बोले, कोरोना की लड़ाई के लिए जरूरी उपकरण जैसे पीपीई, मास्क और वेंटिलेटर आदि के निर्माण में भारतीय रक्षा उद्योग काफी आगे निकल गया है।
अब हम अपने पड़ोसी देशों की मदद के बारे में सोच सकते हैं। भारत को इस स्थिति में लाने के लिए सेना, अर्धसैनिक बल, पुलिस और दूसरे सामाजिक एवं औद्योगिक संगठनों ने भरपूर सहयोग दिया है।
सबसे पहले हमारे देश में एन-95 मास्क की दिक्कत आ रही थी। हालांकि बाद में ये मास्क भी बड़े पैमाने पर बनने लगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वदेशी अपनाने की अपील पर काम शुरू हो गया।
भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने स्वदेशी कंपनियों को एन95 मास्क बनाने के लिए कुछ नियमों में ढील दे दी। यह मास्क तैयार करने वाली स्वदेशी कंपनियों के लिए अब इन हाउस टेस्टिंग की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है।
कोई भी स्वदेशी कंपनी जो इस मास्क को तैयार करेगी, वह बीआईएस की किसी भी लैब में जाकर अपने प्रोडेक्ट की जांच करा सकती है। साथ ही किसी दूसरे ऐसे निर्माता या संस्था, जिसके पास बीआईएस जांच का लाइसेंस है, वहां पर भी अपने उत्पाद की टेस्टिंग कराई जा सकती है।
डीआरडीओ ने एक दिन में बीस हजार से अधिक पीपीई किट तैयार कर दीं। पचास हजार लीटर सैनिटाइजर विभिन्न जगहों पर पहुंचा दिया गया। नेनो टेक्नोलॉजी की मदद से एन99 मास्क तैयार होने लगा।
ऐसे बीस हजार मास्क रोजाना देश के अलग अलग हिस्सों में भेजे गए। भारत-चीन सीमा पर दुर्गम बर्फीले मौसम में ड्यूटी देने वाले आईटीबीपी के जवान भी कोरोना की लड़ाई में आगे आ गए।
इन जवानों ने बहुत ही कम समय में उच्च गुणवत्ता वाले ऐसे पीपीई और मास्क तैयार कर दिए। एनआईटीआरए और एम्स के तकनीकी विशेषज्ञों ने इन्हें तुरंत मंजूरी दे दी। इस बल के बनाए गए पीपीई व मास्क की सप्लाई के लिए अब दूसरे संगठनों से आपूर्ति का आग्रह मिल रहा है।
कई राज्यों गुजरात, पश्चिम बंगाल और हरियाणा के सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठन अधिक से अधिक ऑर्डर देने के लिए तैयार हैं। आईटीबीपी प्रवक्ता विवेक पांडे बताते हैं कि हमारे पीपीई सूट की लागत सौ रुपए और ट्रिपल लेयर मास्क पांच रुपये में तैयार हो जाता है।
पीपीई किट और मास्क गुणवत्ता की कसौटी पर खरे उतरते हैं। साथ ही इनका मूल्य भी कम है। यही वजह है कि अब इनकी देश में मांग बढ़ रही है। बल के परिवारों के संगठन, हिमवीर वाइव्स वेलफेयर एसोसिएशन (हावा) ने भी पीपीई और मास्क के निर्माण में अपना योगदान दिया है।
बल परिवार की महिलाओं ने अपने घरों से ही रोजाना सैकड़ों मास्क बनाने का काम शुरू किया है। अभी तक ये महिलाएं 30 हजार से अधिक मास्क बना चुकी हैं।
सीआरपीएफ और बीएसएफ भी इस मामले में आगे आई। डीआईजी एम. दिनाकरण कहते हैं कि सीआरपीएफ ने एक दिन में ट्रिपल लेयर वाले करीब डेढ़ लाख मास्क तैयार करा दिए।
इनकी कीमत पांच रुपये रखी गई, जबकि बाजार में ये 15 रुपये में मिल रहे थे। इसके बाद रोजाना पांच सौ पीपीई किट बनाई।एक पीपीई किट का दाम 450 रुपये रखा गया। बीएसएफ ने ये सभी उपकरण बनाने शुरू कर दिए।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले सप्ताह वैश्विक कोरोनोवायरस महामारी के खिलाफ भारतीय रक्षा उद्योग द्वारा उठाए गए कदमों की सराहना करते हुए कहा था कि कोरोना की लड़ाई के लिए जरूरी उपकरण तैयार करने में हम काफी आगे निकल गए हैं।
एसआईडीएम ने डीआरडीओ रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन के साथ मिलकर कोरोना की लड़ाई के लिए जरूरी उपकरणों का निर्माण कार्य पहले के मुक़ाबले बहुत तेज कर दिया है।
इन संगठनों ने पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट किट, मास्क और वेंटिलेटर तैयार करने में जो प्रतिभा दिखाई है, वह काबिले तारीफ है। दो महीने से भी कम समय में, हमने न केवल अपनी घरेलू मांग को पूरा किया है, बल्कि हम आने वाले समय में पड़ोसी देशों की मदद करने के बारे में विचार कर सकते हैं।