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कुरुक्षेत्र: पहले दलित मुख्यमंत्री का दांव अगर चला तो बदल सकता है पंजाब का चुनाव
सार
चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला भी बेहद दिलचस्प है। कांग्रेस के सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी की पहली पसंद पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ थे। लेकिन अंबिका सोनी ने कहा कि पंजाब में 1966 के बाद से राज्य विभाजन के बाद कोई भी गैर सिख मुख्यमंत्री नहीं बन सका है क्योंकि राज्य की पूरी राजनीति सिखों के इर्द गिर्द घूमती है। इसलिए किसी पगड़ी धारी सिख को ही कमान दी जानी चाहिए।
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राहुल गांधी के साथ चरणजीत सिंह चन्नी (फाइल फोटो)
- फोटो : @rssurjewala
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विस्तार
पंजाब में कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री पद देकर वह दांव चल दिया है जो अगर चल गया तो न सिर्फ विपक्षी चित हो सकते हैं बल्कि पंजाब विधानसभा के चुनाव का पूरा समीकरण भी बदल सकता है। इस दांव से कांग्रेस को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के चुनावों में भी फायदा हो सकता है बशर्ते वह उसे राजनीतिक तौर पर भुना पाए।
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पंथिक और जट सिखों की किसान राजनीति के लिए जाना जाने वाला पंजाब कांग्रेस के इस फैसले से सियासत के एक दूसरे दौर में पहुंच गया है। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और दलित चिंतक रविकांत कहते हैं कि पंजाब के चुनाव में इस बार दलित मुख्यमंत्री का मुद्दा सबसे अहम होगा। एक तरह से कांग्रेस ने राज्य में पहली बार किसी दलित को मुख्यमंत्री बनाकर अकाली बसपा गठबंधन को कमजोर किया है तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी की बढ़त को भी रोकने की कोशिश की है। साथ ही पिछले साढ़े चार साल के सरकार विरोधी रुझान यानी एंटी इकंबेंसी की काट दलित सशक्तीकरण के जरिए करने के साथ-साथ पार्टी के भीतरी झगड़ों और सिद्धू कैप्टन विवाद को भी विराम देने की भी एक बड़ी कोशिश है।
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पंजाब की कुल आबादी में 2011 की जनगणना के मुताबिक करीब 32 फीसदी दलित हैं, जिनमें रामदसिया, मजहबी और वाल्मीकि समुदाय के लोगों का बहुल्य है। हालांकि पंजाब की राजनीति में पहले कभी उत्तर प्रदेश या बिहार की तरह जातिवादी ध्रुवीकरण नहीं देखा गया है, लेकिन यह भी सच है पूरे उत्तर भारत में दलित उत्थान के लिए जाना जाने वाला कांशीराम के बहुजन समाज आंदोलन की शुरुआत भी पंजाब से ही हुई और बहुजन समाज पार्टी ने अपना पहला लोकसभा सांसद पंजाब से हरभजन सिंह लाखा को हो जिताकर भेजा था। बसपा संस्थापक कांशीराम स्वयं पंजाब के उसी रोपड़ जिले के थे जहां के चमकौर साहिब विधानसभा सीट से चन्नी चुनाव जीतकर आते हैं। चरणजीत सिंह चन्नी भी उसी रामदसिया समुदाय से हैं जिसके कांशीराम थे। रविकांत कहते हैं कि भले ही पंजाब की राजनीति में अभी तक दलित ध्रुवीकरण किसी एक दल के पक्ष में नहीं दिखाई दिया हो लेकिन अब जब राज्य को पहला दलित मुख्यमंत्री मिल रहा है तो इसका दलित मानस पर किस तरह असर होता है इसे देखना बेहद दिलचस्प होगा। जाने माने पत्रकार आशुतोष के मुताबिक जिस तरह उत्तर प्रदेश में पहली दलित मुख्यमंत्री मायावती की ताजपोशी ने बसपा के पक्ष में दलितों को एकजुट किया था,अगर वैसा ही ध्रुवीकरण पंजाब में कांग्रेस के पक्ष में हो गया तो सबसे ज्यादा नुकसान अकाली बसपा गठबंधन को हो सकता है।
चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला भी बेहद दिलचस्प है। कांग्रेस के सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी की पहली पसंद पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ थे। लेकिन कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी ने कहा कि पंजाब में 1966 के बाद से राज्य विभाजन के बाद कोई भी गैर सिख मुख्यमंत्री नहीं बन सका है क्योंकि राज्य की पूरी राजनीति सिखों के इर्द गिर्द घूमती है। इसलिए किसी पगड़ी धारी सिख को ही कमान दी जानी चाहिए। कुछ इसी तरह का बयान मंत्री सुखविंदर सिंह रंधावा ने दिया और नेतृत्व पर किसी जट सिख को मुख्यमंत्री बनाने का दबाव बढ़ने लगा। तब प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने खुद को मुख्यमंत्री बनाए जाने की दावेदारी पेश कर दी। जबकि निवर्तमान मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिदंर सिंह सिद्धू को रोकने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे और उन्होंने सिद्धू की इमरान खान और जनरल बाजवा से दोस्ती का हवाला देते हुए उन्हें पाकिस्तान परस्त साबित करने का दांव चल दिया। इस खींचतान के कारण रविवार को दिन में 11 बजे होने वाली विधायक दल की बैठक भी टाल दी गई। इसके बाद अंबिका सोनी ने राहुल गांधी और सोनिया गांधी को चरणजीत 2 चन्नी का नाम सुझाया। चन्नी को कभी राहुल गांधी के ही प्रयास से 2014 में अमरिदंर सिंह की इच्छा के खिलाफ विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल का नेता बनाया गया था। इसके बाद पंजाब में पहले दलित मुख्यमंत्री के नफे नुकसान का आकलन हुआ और माना गया कि इस फैसले न सिर्फ पार्टी का भीतरी झगड़ा शांत होगा बल्कि विरोधी भी पस्त हो जाएंगे और चुनावों में दलितों के एक मुश्त समर्थन की उम्मीद भी बढ़ जाएगी। इसके बाद आखिरी वक्त में चरणजीत सिंह चन्नी के नाम पर मुहर लग गई।
तीन बार विधायक बने और मंत्री रहे चरणजीत सिंह चन्नी 49 साल के हैं और उनके सामने राजनीति की लंबी पारी का वक्त है। राजनीतिक विश्लेषक मुकेश कुमार कहते हैं कि कांग्रेस के इस दांव से न सिर्फ पंजाब में बल्कि पंजाब के बाहर भी राजनीति पर असर पड़ेगा। भाजपा ने तीन बार बसपा के साथ गठबंधन करके उत्तर प्रदेश में मायावती को मुख्यमंत्री तो बनवाया लेकिन वह उसकी राजनीतिक मजबूरी थी। जबकि आज तक भाजपा ने अपने पूर्ण बहुमत वाले किसी भी राज्य में किसी दलित को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। कांग्रेस नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम के अनुसार दलितों के नाम पर दुकानदारी तो सब करते हैं लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का साहस सिर्फ कांग्रेस के पास है। दलित चिंतक रविकिशन कहते हैं कि उत्तराखंड में करीब 21 फीसदी दलित हैं और कांग्रेस ने वहां चुनाव की कमान पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को सौंपी है। रावत ही पंजाब के प्रभारी भी हैं और चन्नी को विधायक दल का नेता चुने जाने की खबर मीडिया को उनके हवाले से ही दी गई। यह भी एक रणनीति का हिस्सा है जिससे उत्तराखंड के दलितों में रावत के लिए एक सकारात्मक संदेश जाए। रावत और कांग्रेस उत्तराखंड विधानसभा चुनावों इसका लाभ लेने की पूरी कोशिश करेंगे। कांग्रेस नेताओं को उम्मीद है कि चन्नी के फैसले का कुछ लाभ पार्टी को उत्तर प्रदेश में भी मिल सकता है।
चरणजीत चन्नी के मुख्यमंत्री बनने से नवजोत सिंह सिद्धू के लिए भी फिलहाल मुख्यमंत्री की कुर्सी दूर हो गई है। अब विधानसभा चुनावों में कांग्रेस दलितों के बीच चन्नी का चेहरा लेकर वोट मांगेगी और अगर उसे 2022 में फिर बहुमत मिला तो दलित चन्नी को बदलना टेढ़ी खीर होगा। क्योंकि दलित को कुर्सी पर बिठाना जितना कठिन है आज की राजनीति में उसे बदलना उससे भी ज्यादा कठिन है। और अगर कांग्रेस ने ऐसा करने का दुस्साहस किया तो उसका खामियाजा उसे राष्ट्रीय स्तर पर लोकसभा चुनावों तक में भुगतना पड़ सकता है। इसलिए भले ही कांग्रेस पंजाब में कहे कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते विधानसभा चुनावों में नवजोत सिंह सिद्धू का नेतृत्व होगा, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर चरणजीत सिंह चन्नी के होने से जीत हार का श्रेय दोनों के ही हिस्से में होगा और नतीजों के बाद फैसले भी उसी हिसाब से होंगे। किसी दलित का विरोध करके सिद्धू भी लंबी राजनीति नहीं कर सकेंगे। चन्नी कार्ड से कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के गुस्से को भी काफी हद तक कम करने में कामयाबी पाई है। अमरिदंर ने न सिर्फ चन्नी को बनाए जाने के फैसले का स्वागत किया बल्कि सोनिया गांधी को पत्र लिखकर अपने साढ़े चार साल के कामकाज का ब्यौरा भेजकर अमन चैन बने रहने की उम्मीद भी जताई। इससे कैप्टन की बगावत की आशंका भी कमजोर पड़ी है।
इसके साथ ही चन्नी को मुख्यमंत्री बनाए जाने से एक बात और साफ है कि अब कांग्रेस नेतृत्व विशेषकर राहुल गांधी पार्टी में पुराने नेताओं की जगह नया नेतृत्व विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ चले हैं। शायद उन्हें इसकी प्रेरणा भाजपा द्वारा उत्तराखंड, कर्नाटक और गुजरात में धड़ाधड़ किए गए मुख्यमंत्री बदलने के फैसलों से मिली है। वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं कि यह भी कहा जा सकता है कि एक तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैली ने कहीं न कहीं कांग्रेस के भीतर भी असर डाला है।
लेकिन इस फैसले की कुछ अपनी चुनौतियां भी हैं। भाजपा में जहां नरेंद्र मोदी का दबदबा और वोट दिलाकर चुनाव जितवाने वाली लोकप्रियता हर तरह के असंतोष तो थामे रहता है, वहीं केंद्र की सत्ता की ताकत भी क्षत्रपों और असंतुष्ट नेताओं पर भारी है। लेकिन कांग्रेस की वह स्थिति नहीं है। न तो कांग्रेस के पास केंद्र की सत्ता है और न ही उसके नेतृत्व के पास वोट दिलाकर जितवाने वाला करिश्मा बचा है। इसलिए चन्नी जैसे युवा मुख्यमंत्री के साथ पुराने दिग्गज मंत्री जो खुद भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, किस हद तक तालमेल बिठा पाएंगे। चन्नी उनसे किस तरह बेहतर काम ले सकेंगे जिससे महज पांच महीनों के कम समय में उनकी सरकार कुछ ऐसा कर सके कि लोग उसे दोबारा जिताने का मन बना सकें। दलित मतों के ध्रुवीकरण के साथ-साथ कांग्रेस के परंपरागत जट सिखों और हिंदू मतों के बिखराव को रोकना भी चन्नी की चुनौती है।उन्हें बड़बोले और बेलगाम सिद्धू को भी साध कर रखना होगा। आम आदमी पार्टी और अकाली बसपा गठबंधन की राजनीतिक चुनौती तो कड़ी है ही, भाजपा ने भी उनके खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। कई साल पहले किसी महिला अधिकारी को भेजे गए उनके कथित विवादित संदेश को लेकर लगे आरोप को तूल देकर भाजपा महिलाओं की सुरक्षा का सवाल उठा रही है। चन्नी को इसका भी राजनीतिक जवाब अपनी सरकार के दौरान पंजाब में महिलाओं की सुरक्षा बेहतर करके देना होगा। अगर वह इन चुनौतियों से निबट सके तो न सिर्फ कांग्रेस को संजीवनी मिलेगी बल्कि चरणजीत सिंह चन्नी भी कांग्रेस में बूटा सिंह के बाद दूसरे बड़े दलित सिख नेता बनकर उभर सकते हैं। कांग्रेस नेतृत्व के इस फैसले ने पार्टी और चन्नी दोनों के लिए संभावनाओं द्वार खोल दिए हैं। अब सियासत की इस अग्नि परीक्षा में उन्हें खरा उतरना होगा।