असम चुनाव के कारण गोगोई के नाम पर बनी सहमति, जेठमलानी भी थे राज्यसभा की दौड़ में
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राज्यसभा में मनोनयन के मामले में भले ही सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने बाजी मारी हो, मगर इस पद की दौर में वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी भी शामिल थे। गोगोई से पहले सरकार में जेठमलानी को राज्यसभा में मनोनीत किए जाने पर शीर्ष स्तर पर चर्चा हुई थी। हालांकि इस बीच अचानक गोगोई का नाम आया और अगले साल असम में होने वाले विधानसभा चुनाव के अलावा कुछ अन्य कारणों से उनका नाम फाइनल हो गया।
सूत्र के मुताबिक सरकार प्रसिद्ध न्यायविद् की श्रेणी में बड़ा नाम चाहती थी। इस क्रम में पहले दिग्गज अधिवक्ता रहे दिवंगत राम जेठमलानी के पुत्र महेश जेठमलानी के नाम पर चर्चा हुई। इसी बीच इसके लिए गोगोई का मन टटोला गया। उनकी हामी भरने के बाद सोमवार को राष्ट्रपति ने इस आशय की अधिसूचना जारी कर दी। उक्त सूत्र के मुताबिक इस फैसले की वजह के पीछे अगले साल असम में होने वाला विधानसभा चुनाव ही नहीं बल्कि गोगोई की अगुवाई में दिए गए ऐतिहासिक फैसले की भी भूमिका है।
आलोचनाओं से सरकार बेपरवाह
सरकार के एक मंत्री के मुताबिक भले ही विपक्ष का एक तबका गोगोई के राज्यसभा में मनोनयन पर सवाल उठा रहा है। परोक्ष रूप से इसे अयोध्या और राफेल मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र किया जा रहा है। मगर सच्चाई यह है कि अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने सर्वसम्मति से राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया था। इसके अलावा राफेल मामले में तीन सदस्यीय पीठ ने विपक्ष के सरकार पर लगाए गए आरोपों को गलत ठहराया था। बतौर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गोगाई दोनों मामलों से जुड़ी पीठ का हिस्सा थे।
आलोचनाओं से इसलिए बेपरवाह
सरकार का आलोचनाओं से बेपरवाह होने के कई कारण है। सरकार के सूत्रों का कहना है कि जब जस्टिस गोगोई समेत सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों ने तत्काली मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस की थी तब इसी विपक्ष के निशाने पर मोदी सरकार थी। अब यही विपक्ष कुछ फैसलों को ले कर जस्टिस गोगोई को कटघरे में खड़ा किया है। जहां तक जजों को राज्यसभा या कोई अन्य पद देने का मामला है तो इसकी शुरुआत कांग्रेस ने की। सुप्रीम कोर्ट के जजों को राज्यसभा में लाने, राज्यपाल बनाने, मुख्य चुनाव आयुक्त को राज्यपाल बनाने का सिलसिला कांग्रेस ने ही शुरू किया है।