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Lok Sabha: 'M फैक्टर' की 22 सीटों पर ओवैसी का यह है 'मास्टर प्लान', INDIA गठबंधन का खेल बिगाड़ेंगे ओवैसी

Sun, 03 Mar 2024 05:42 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Sun, 03 Mar 2024 05:42 PM IST
सार

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने की बात कर गठबंधन के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है। ओवैसी की पार्टी ने उत्तर प्रदेश की जिन पांच सीटों के लिए टिकट की मांग की है दरअसल उससे मुस्लिम समुदाय में एक बड़ा संदेश देने की बात कही जा रही है।

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Asaduddin Owaisi will spoil game of INDIA alliance in Lok Sabha elections
लोकसभा चुनाव की रणनीति। - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

लोकसभा चुनावों में बिछाई जा रही बिसात में यूपी में ओवैसी बड़ा खेल करने जा रहे हैं। दरअसल ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) अपने प्रत्याशी लड़ाने की योजना बना रही है। पार्टी से जुड़े नेताओं के मुताबिक जिन पांच सीटों की मांग की है उसमें मुस्लिम बाहुल्य सीटें शामिल हैं। सियासी जानकारों का मानना है कि ओवैसी की पार्टी चुनाव भले न जीते लेकिन सियासी खेल तो सपा और कांग्रेस का बिगाड़ ही सकती है। हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव में भी ओवैसी  ने अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी थी।

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असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने की बात कर गठबंधन के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है। ओवैसी की पार्टी ने उत्तर प्रदेश की जिन पांच सीटों के लिए टिकट की मांग की है दरअसल उससे मुस्लिम समुदाय में एक बड़ा संदेश देने की बात कही जा रही है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन के नेता हसन रिजवी कहते हैं कि उनकी पार्टी ने पिछले साल भी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में सियासत में ताल ठोंकी थी। वह कहते हैं उनकी पार्टी सीटें भले न जीत पाई हो लेकिन प्रदेश के मुसलमानों के दिल में जगह जरूर बना ली थी। अब जब लोकसभा के चुनाव हो रहे हैं तो उनकी पार्टी अवाम की और लोकतंत्र के लिए सियासी मैदान में तो उतरेगी ही।
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राजनीतिक जानकार ओम प्रकाश मिश्रा कहते हैं कि 2022 के विधानसभा चुनावों में ओवैसी की पार्टी 95 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। लेकिन किसी भी सीट पर वह जीत नहीं सकी। मिश्रा मानते हैं कि लोकसभा चुनाव में मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में जिसमें पश्चिम उत्तर प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा आता है वहां से ओवैसी की पार्टी ताल ठोंक सकती है। जानकारी के मुताबिक ओवैसी की पार्टी में सिर्फ पश्चिम में नहीं बल्कि पूर्वांचल में भी मुस्लिम बाहुल्य इलाके में खासतौर से समाजवादी पार्टी के गढ़ में सेंध लगाने के लिए अपने प्रत्याशी उतारने की तैयारी की
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है। मिश्रा कहते हैं कि ओवैसी की पार्टी भले चुनाव न जीते लेकिन सियासी मैदान में अगर वह उतरते हैं तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का सियासी गणित बिगाड़ सकते हैं। यही वजह है कि ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन के चुनाव लड़ने की सुगबुगाहट पर सियासी हलचल मच रही है।
 
वरिष्ठ पत्रकार नासिर सिद्दीकी कहते हैं कि जो परिस्थितियां उत्तर प्रदेश में बनी है उसमें असदुद्दीन ओवैसी मुसलमानों के बड़े हिमायती बनकर सामने आने की फिराक में है। उनका मानना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और बसपा ने एक साथ मिलकर मुसलमानों के एक बड़े वोट बैंक में हिस्सेदारी ली थी। क्योंकि इस लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने किसी के साथ गठबंधन नहीं किया है इसलिए ओवैसी की इस चुनाव में मुसलमानो के वोटों पर नजर लाजिमी है। उनका मानना है कि उत्तर प्रदेश में तकरीबन 19 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों और लोकसभा क्षेत्र को मिलाकर यह आबादी औसतन 30 फ़ीसदी के करीब हो जाती हैं। वह कहते हैं कि 30 फ़ीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली उत्तर प्रदेश में 22 लोकसभा सीटें आती हैं। "एम" फैक्टर के इसी सियासी गणित को देखते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी पार्टी को उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने के लिए सक्रिय कर दिया है।

 
राजनीतिक जानकारों की मानें तो ओवैसी की ओर से उत्तर प्रदेश में गठबंधन से पांच सीटों की मांग की गई है। अगर यह मांग नहीं मानी जाती है तो उस दशा में ओवैसी की पार्टी उत्तर प्रदेश में जोर आजमाइश कर सकती है। जिसमें पार्टी न सिर्फ पश्चिम बल्कि पूर्वांचल में भी  मुस्लिमों के गढ़ में अपने प्रत्याशी उतार सकती है। ओवैसी की पार्टी के मुताबिक उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने की तैयारियों पर भाजपा का कहना है कि सपा और कांग्रेस तो वैसे भी चुनावो मैदान में कहीं नहीं है। पार्टी के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं की जो पार्टियां जातियों का आधार बनाकर सियासी मैदान में उतर रहीं  हैं वो विकास की बात तो कर ही नहीं सकती। और जो विकास से दूर जातिगत समीकरण का आधार बनाकर मैदान में उतरेगी जनता उसको तो नकार ही देगी।

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