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क्या अनुच्छेद 370 की समाप्ति से जुड़े हैं गलवां विवाद के तार? पूर्व राजनयिक रंगाचारी ने दिया ये जवाब

Wed, 17 Jun 2020 04:55 PM IST
Harendra Chaudhary डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 17 Jun 2020 04:55 PM IST
सार

  • भारत-चीन सीमा पर दोनों देशों के बीच जारी गतिरोध के बीच पूर्व राजनयिक टीसीए रंगाचारी से अमर उजाला डॉट कॉम की विशेष बातचीत  
  • पीएम नरेंद्र मोदी सत्ता संभालने के बाद अब तक पांच बार चीन की यात्रा कर चुके हैं        

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Are the strands of the Galvan controversy related to the abolition of Article 370? Former diplomat Rangachari gave this answer
TCA Rangachari - फोटो : for Reference Only

विस्तार

चीन और भारत के बीच गलवां घाटी में जारी गतिरोध की जड़ें अनुच्छेद-370 के विवादित प्रावधानों के उन्मूलन से जुड़ी हो सकती हैं? विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा हो सकता है, क्योंकि 5 अगस्त 2019 को भारत ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले इस कानून के विवादित अंशों को हटा दिया था।

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इसकी समाप्ति के बाद संसद में संबोधन के दौरान केंद्र सरकार ने यह कहा था कि अक्साइ चिन का क्षेत्र भी भारत का अविभाज्य अंग है और भारत इसे पाने की पूरी कोशिश करेगा।
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माना जा रहा है कि केंद्र सरकार के इस रुख ने चीन के कान खड़े कर दिए, जिसका नतीजा आज गलवान घाटी में देखने को मिल रहा है।
 
अमर उजाला डॉट कॉम (www.amarujala.com) के इस सवाल पर चीन में भारत के राजदूत रहे टीसीए रंगाचारी ने कहा कि दो देशों के बीच जब भी इस तरह का गतिरोध होता है तब इस तरह की संभी संभावनाओं पर चर्चा की जाती है।
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लेकिन जब अनुच्छेद 370 के विवादित प्रावधानों का उन्मूलन किया गया था, तब भारत ने इसे अपना आंतरिक मामला बताया था।

इस घटना के बाद 11 अगस्त को दोनों देशों के शीर्ष प्रतिनिधियों के बीच अच्छे माहौल में बातचीत भी हुई थी। 

इसी दौरान पाकिस्तानी राजनयिक ने भी चीन की यात्रा की थी और उसके कुछ ही दिन बाद भारतीय राजनयिक ने चीन के उपराष्ट्रपति से मुलाकात की थी।

उस मुलाकात के बाद चीन ने जो वक्तव्य जारी किया था, उसमें पाकिस्तान के समय दिए गये बयान से काफी अंतर था और वह इस बात का संकेत दे रहा था कि चीन भारत के रुख को समझता है और वह उससे सहमत भी  है। 

उस समय चीन भारत के इस रुख से संतुष्ट दिखा था कि अनुच्छेद 370 में बदलाव भारत का आंतरिक मामला है।

हालांकि, उसके बाद से आज तक उसकी गतिविधयों से उसका वह वक्तव्य मेल नहीं खाता है।
 
पीएम नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने के बाद अब तक पांच बार चीन की यात्रा कर चुके हैं। इसके पहले गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान भी उन्होंने चीन के साथ मजबूत संबंधों को प्रमुखता दी थी।

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी इस दौरान भारत की यात्रा कर चुके हैं। इन यात्राओं से यह छवि बन रही थी कि दोनों देश डोकलाम में अपने सीमावर्ती संबंधों में टकराव के बाद भी आर्थिक, व्यापारिक और वैज्ञानिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं। 

लेकिन इसके बाद भी दोनों देशों में टकराव क्या संकेत देता है? इस सवाल पर रंगाचारी ने कहा कि संभवतया चीन यह मान बैठा था कि आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने की कोशिश में भारत सीमावर्ती विषयों को उतनी प्रमुखता नहीं देगा।

लेकिन यह संभव नहीं है और कोई भी देश इन विषयों की अहमियत को त्याग नहीं सकता है।
 
उन्होंने कहा कि अगर दोनों देशों के बीच जारी गतिरोध जल्दी दूर नहीं होता है, तो अंतत: यह दोनों को ही नुकसान देने वाला साबित होगा। 

अपनी इस बात के समर्थन में रंगाचारी ने कहा कि सुषमा स्वराज के विदेश मंत्री रहने के दौरान भी इसी तरह का एक वाक्य सामने आया था, तब उन्होंने संसद में यह बात कही थी कि अगर इस तरह के मामले युद्ध तक भी पहुंच जाते हैं तब भी युद्ध के बाद आपस में बातचीत करके मुद्दों का हल निकाला जाता है। 

अगर अंतत: बातचीत ही करनी है तो इसे शुरुआत में ही क्यों न अपनाया जाए? उन्होंने कहा कि दोनों देशों के संबंध सामान्य बनाने के लिए हर स्तर पर बातचीत जारी रहनी चाहिए।
 
किस मुद्दे पर निकल सकता है सुलह का फार्मूला?
 
रंगाचारी के मुताबिक 5 मई के पूर्व दोनों देशों की जो स्थिति थी, अगर दोनों देश उसी स्थिति में वापस जाने को तैयार हो जाते हैं तो दोनों देशों के बीच सुलह की गुंजाईश बन सकती है।

लेकिन इसके लिए खुले दिल से विचार करना होगा। इस बीच चीन ने भारत पर सीमा का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है जो कि सरासर गलत है क्योंकि वहां इस समय कोई सीमा नहीं है। 

भारत ने अपनी लाइन ऑफ कट्रोल का उल्लंघन नहीं किया है, जबकि चीन जिस क्षेत्र को अपना होने का दावा करता है उस पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है।

क्या रही है चीन की रणनीति

चीन के विषय के जानकार रंगाचारी ने कहा कि पिछले 10-12 सालों से चीन यह रणनीति अपनाता रहा है कि वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, थोड़ा आगे बढ़ जाने के बाद वह वहां कुछ स्थायी निर्माण करता है और सैनिक जरूरतों की चीजों को इकट्ठा करता है। 

कुछ समय बीत जाने के बाद वह फिर कुछ दूर आगे बढ़कर कब्जा करने की कोशिश करता है। इस तरह की कोशिश से वह इन इलाकों पर अपना कब्जा मजबूत दिखाना चाहता है। उन्होंने कहा कि भारत के मामले में भी वह लगातार इसी रणनीति के साथ आगे बढ़ता रहा है।

क्या अपनी समस्याओं से ध्यान भटका रहा चीन?

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीन जब भी आंतरिक या बाहरी स्तर पर किसी गंभीर समस्या से जूझने लगता है, वह पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद जैसी चीजों को उभार देता है।

इससे उसकी जनता का ध्यान मुख्य समस्या से हटकर दूसरी समस्या पर चला जाता है। 

इस समय भी चीन कई समस्याओं से जूझ रहा है। कोरोना वायरस के प्रसार के मामले में भी दुनिया का दबाव उस पर बना हुआ है। इसी बीच हांगकांग में चीनी सरकार के खिलाफ गुस्सा अपने चरम पर है। पूरी दुनिया में उसके आर्थिक बायकाट की बातें हो रही हैं। 

क्या ऐसे में चीन एक बार फिर अपने उसी पुराने नुस्खे को आजमाना चाहता है? रंगाचारी ने कहा कि इस तरह की बातों पर चर्चा होती है।

इनके पीछे कुछ ठोस आधार हो भी सकता है क्योंकि 1949, 1962 और वियतनाम युद्ध के पीछे इसी तरह की परिस्थितियां जिम्मेदार बताई गई थीं।

क्या भारत की विदेश नीति बदलने की जरूरत?

भारत के पड़ोसी देशों से उसके संबंध लगातार बिगड़ रहे हैं। पाकिस्तान के साथ हमारे संबंध लगातार तनावपूर्ण रहे हैं। चीन से भी समय-समय पर विवाद होता रहा है। लेकिन अब नेपाल भी उसी श्रेणी  में जाता दिख रहा है।

सीएए कानून के दौरान बांग्लादेश भी भारत से नाराजगी प्रकट कर रहा था। क्या ऐसे में भारत को अपनी विदेश नीति बदलने की जरूरत है?
 
इस सवाल पर रंगाचारी का कहना है कि विदेश नीति कभी स्थायी चीज नहीं हो सकती। समय के हिसाब से इसमें परिवर्तन होता रहता है और अपनी जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए इसमें लगातार परिवर्तन करना भी चाहिए।


 
लेकिन जहां तक भारत का अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की बात है, पाकिस्तान को छोड़ बाकी देशों के साथ संबंधों को सहेजा जा सकता है। नेपाल से हमारे रोटी-बेटी के रिश्ते रहे हैं। थोड़ी सी कोशिश से इसे उचित रूप दिया जा सकता है।   
 

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