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विशेष टिप्पणीः विकल्पहीनता को मजबूत करता अविश्वास
जयदीप कर्णिक
Updated Sat, 21 Jul 2018 04:44 PM IST
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पता नहीं राहुल गांधी के लिए पटकथा कौन लिख रहा है... पर जो भी लिख रहा है उसे ना तो कांग्रेस का ना ही राहुल गांधी का हितैषी माना जा सकता है। इतने शीर्ष मसले को लेकर ऐसी सतही स्क्रिप्ट?? जिस दिन से ये अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में पेश और मंजूर हुआ, उसी दिन से ये तय था कि ये आंकड़ों की जीत हार से परे 2019 की भूमिका तैयार करने का मसौदा है।
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देश के मौजूदा माहौल को भुनाते हुए सरकार को कटघरे में खड़ा करने की तैयारी है। किसानों, महिलाओं, दलितों, बेरोजगारी और भीड़तंत्र के मुद्दे पर एक तथ्यपरक बहस सुनने के लिए पूरा देश आतुर था। इन मुद्दों पर 2019 के आम चुनावों की मजबूत जमीन तैयार की जा सकती थी।
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इसी मौके को सत्ता पक्ष द्वारा अपने हित में भी भुनाया जा सकता है इस खतरे को भांपते हुए जबर्दस्त तैयारी की आवश्यकता थी। ये प्रस्ताव बूमरेंग ना हो ये तय करने के लिए राजनीतिक परिपक्वता और कौशल की आवश्यकता थी।
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कुल मिला कर यह कि ये पूरी लड़ाई मोदी बनाम राहुल ना हो इसका ध्यान रखे जाने की आवश्यकता थी। क्योंकि व्यक्तित्वों के इस टकराव ने ही 2014 के लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक हुए तमाम अन्य चुनावों में मुद्दों को गौण कर दिया। राज्यों के विकास से लेकर नोटबंदी, जीएसटी, किसानों और रोजगार के मुद्दे कोने में कराहते नजर आए।
अगर शुक्रवार को लोकसभा में 12 घंटे चली बहस में इस पूर्व पीठिका को ध्यान में नहीं रखा गया है तो समूचा विपक्ष और खास तौर पर कांग्रेस इसके लिए सबसे ज्यादा दोषी है। खुद राहुल गांधी जो सदन में 15 मिनट बोलने पर भूकंप लाने की चेतावनी दे चुके थे, उन्हें पूरा देश देख रहा था कि वो ऐसा कर पाते हैं या नहीं। लेकिन उन्होंने निराश ही किया।
2014 कि जबर्दस्त मोदी लहर के बाद आज अगर जनता का एक तबका “मोदी का कोई विकल्प नहीं है, क्या करें” अगर ऐसा कह रहा है तो निश्चित ही समूचे विपक्ष और खास तौर पर राहुल गांधी के लिए ये बड़ा अवसर था। ये अवसर था 2014 के आम चुनावों के ठीक पहले एक अंग्रेजी चैनल के बड़े नामी पत्रकार को दिए साक्षात्कार में हुए ‘सेल्फ गोल’ के धब्बे को दूर करने का। पर अफसोस कि वो 2019 के ऐन पहले एक और सेल्फ गोल कर बैठे!
अगर उन्होंने डोकलाम, राफेल और नोटबंदी जैसे मुद्दे उठाए थे तो उन्हें पूरी गंभीरता से तथ्यों और तर्कों के साथ बहस को बस उन्हीं पर फोकस रखना था। ना खुद को पप्पू कहने की जरूरत थी और ना ही मोदीजी से गले मिलने की कवायद करनी थी और ना ही आंख मारने वाली बचकाना हरकत। अगर आप खुद को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करने का दम भरते हैं तो आपको बहुत अधिक परिपक्वता, गंभीरता और जवाबदेही दिखानी होगी। ऐसा नहीं कि आप हंसी-मजाक नहीं कर सकते, पर उसके मौके और होते हैं।
प्रस्ताव को प्रस्तुत करने वाली तेलुगु देशम जहां अपने राज्य के मुद्दों तक ही सिमट गई वहीं अन्य सांसदों ने भी इस सुनहरे अवसर को गंवा दिया। वहीं भाजपा के सभी नेताओं ने अपनी बात पूरे दमखम से रखी और मोदी हर बार की तरह अपना मास्टर स्ट्रोक खेल गए। उन्होने सभी मुद्दों पर जवाब दिया। हालांकि नोटबंदी और अर्थव्यवस्था पर उनसे और तफसील की उम्मीद थी पर वो जानते थे कि उनके पास बहुत शस्त्र हैं विपक्ष के हमलों को नेस्तानाबूद करने के लिए। राहुल तो उनके सामने बेबस ही नजर आए।
मोदी ने टेलीविजन के प्राइम टाइम का भरपूर और बेहतर उपयोग किया अपनी बात रखने में। उन्होने ये साबित कर दिया कि आप विकल्प तलाश रहे हैं ये आपकी समस्या है, मुझे अवसर मिला है और मैं खड़ा भी हूं और अड़ा भी हूं। 126 पर खड़े विपक्ष को अब 325 पर बैठे सत्तापक्ष को चुनौती देने के लिए गहरा आत्ममंथन करना होगा।
कल दिन भर की बहस के बाद एक अफसोस ये भी हुआ कि जिस संसद में कई शानदार और तर्कपूर्ण बहस सुन चुके हैं वहां चर्चा का स्तर किस कदर गिर गया है। जहां नेहरू, लोहिया, जेपी, इंदिरा, अटलजी, सोमनाथ चटर्जी, चंद्रशेखर, गुजराल और आडवाणी जैसे बौध्दिक नेताओं की ओजपूर्ण वाणी गूंजती थी, वहां आज न भाषा का वो स्तर है ना विषय की पकड़।