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संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट: भारत में 4.5 फीसदी घरों को चला रहीं सिंगल मदर्स
Wed, 26 Jun 2019 10:49 AM IST
शिल्पा ठाकुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिल्पा ठाकुर
Updated Wed, 26 Jun 2019 10:49 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : pexels.com
संयुक्त राष्ट्र संघ की जारी हुई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 4.5 फीसदी घरों को सिंगल मदर्स चला रही हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सिंगल मदर की संख्या 1.3 करोड़ है। जबकि ऐसी 3.2 करोड़ महिला संयुक्त परिवारों में रह रही हैं। इस रिपोर्ट का शीर्षक "प्रोग्रेस ऑफ द वर्ल्ड विमेन 2020" है। इसमें पता चला है कि विभिन्न पारिवारिक संरचनाएं महिलाओं और उनकी पसंद को कैसे प्रभावित करते हैं। भारत में 46.7 फीसदी परिवारों में दंपति और उनके बच्चे रहते हैं। 31 फीसदी संयुक्त परिवार में रहते हैं, इसके अलावा सिंगल पेरेंट परिवार 12.5 फीसदी हैं।
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दुनिया में दस सिंगल पेरेंट परिवारों में से आठ को महिलाएं (84.3 फीसदी) चला रही हैं। इस रिपोर्ट में 89 देशों के परिवारों का सर्वेक्षण किया गया। जिसमें पता चला कि दुनिया में 10.13 करोड़ परिवारों में सिंगल मदर अपने बच्चों के साथ रहती हैं। जबकि कई अन्य सिंगल मदर संयुक्त परिवारों में रहती हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि छह साल या इससे कम उम्र के बच्चों के साथ रहने वाले दंपति की तुलना में सिंगल मदर वाले परिवारों में गरीबी का स्तर अधिक है। रिपोर्ट में लिखा है, "भारत में घर चलाने वाली सिंगल मदर वाले परिवार में गरीबी दर 38 फीसदी है, जबकि दंपति द्वारा चलाए जा रहे परिवार में 22.6 फीसदी।" शादी और मातृत्व महिलाओं के श्रम बल की भागीदारी और आय को प्रभावित कर रहे हैं। भारत में 2012 के आंकड़ों के अनुसार 25-54 साल की 29.1 फीसदी महिलाएं नौकरी करती हैं, जबकि इसी आयु वर्ग के पुरुषों में 97.8 फीसदी नौकरी करते हैं। यह रिपोर्ट बढ़ती बुजुर्ग आबादी की जरूरतों की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है।
रिपोर्ट के अनुसार, सभी देशों और धर्मों में औसतन महिलाएं पुरुषों से अधिक जीवन जीती हैं। वैश्विक स्तर पर 2015-2020 के दौरान पुरुषों की जीवन प्रत्याशा महिलाओं की तुलना में 4.6 वर्ष कम होने का अनुमान है। इसमें वरिष्ठ महिलाओं पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता की ओर इशारा किया गया है।
इस रिपोर्ट में कई तरह के उपाय भी बताए गए हैं, जैसे परिवार के अनुकूल नीतियां, जिनमें नकद हस्तांतरण, स्वास्थ्य देखभाल और बच्चों और वृद्ध लोगों के लिए देखभाल सेवाएं शामिल हैं।
यूएन विमेन की डिप्टी डायरेक्टर अनिता भाटिया का कहना है, "हालांकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कुछ प्रगति हुई है, महिलाओं और लड़कियों के साथ भेदभाव किया जाता है और उनके योगदान को कम आंका जाता है। सरकारों को 2030 के एजेंडे और सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप निर्धारित समयसीमा और संसाधनों के साथ प्राथमिकताओं और कार्यों की पहचान करके लैंगिक समानता के लिए अपनी प्रतिबद्धता को नवीनीकृत करना चाहिए।"