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Buddhadeb Bhattacharjee: बुद्धदेव के साथ ही वामपंथी राजनीति का एक युग समाप्त; विपक्षी ‘बुद्ध बाबू’ बुलाते थे

Thu, 08 Aug 2024 01:41 PM IST
श्वेता महतो एन. अर्जुन, कोलकाता
एन. अर्जुन, कोलकाता Published by: श्वेता महतो Updated Thu, 08 Aug 2024 01:41 PM IST
सार

बुद्धदेव भट्टाचार्य ने 1966 में सीपीएम की शुरुआती सदस्यता ली। 1972 में, उन्हें सीपीएम की राज्य समिति के सदस्य के रूप में चुना गया। पहली बार 1977 में वे विधानसभा चुनाव में उतरे और उनकी जीत का सिलसिला 2011 के विधानसभा चुनाव तक जारी रहा।

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An era of leftist politics ended with Buddhadeb Bhattacharjee opposition called him Buddha Babu hindi news
बुद्धदेव भट्टाचार्य - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने गुरुवार को निधन हो गया। लेकिन वे अपने पीछे एक बड़ी विरासत को छोड़ गए। कोलकाता में दो कमरों के फ्लैट में सादा जीवन जीने वाले बुद्धदेव ने कभी जीवन में समझौता नहीं किया। वे अपने पीछे पत्नी और एक बेटा छोड़ गए हैं। उनका बंगाल की राजनीति में करिश्मा ही था कि यहां तक कि विपक्षी भी ‘बुद्ध बाबू’ ही कह कर पुकारते थे। एक शिक्षक के रूप में जीवन शुरू करने वाले बुद्धदेव बंगाल के मुख्यमंत्री बने और दस वर्षों तक इसी पद पर रहे। गुरुवार को बुद्धदेव भट्टाचार्य अपने घर में अंतिम सांस ली। उनके जाने के साथ ही, वामपंथी राजनीति का एक युग समाप्त हो गया है।
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राजनीतिक जीवन के पाँच लंबे दशक। सबसे पहले, वह काशीपुर-बेलगछिया निर्वाचन क्षेत्र के विधायक थे। फिर 1987 में वे जादवपुर केंद्र से चुनाव में खड़े हुए। बुद्ध बाबू 2011 तक लगातार यहीं से विधायक रहे। बुद्धदेव भट्टाचार्य का जन्म 1 मार्च 1944 को कलकत्ता में हुआ था। कवि सुकांत भट्टाचार्य उनके चाचा थे। आजीवन वामपंथ में विश्वास रखने वाले इस शख्स की रूचिबोध को लेकर आज भी चर्चा होती है। राजनीति के साथ-साथ बुद्ध बाबू की साहित्य में भी उतनी ही रुचि थी। शैलेन्द्र सरकार विद्यालय से अपना स्कूली जीवन पूरा करने के बाद, उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज (अब प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय) में बंगाली साहित्य का अध्ययन किया। उसके बाद वह सरकारी स्कूलों में पढ़ाने लगे।
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1966 में ली सीपीएम की सदस्यता
बुद्धदेव भट्टाचार्य ने 1966 में सीपीएम की शुरुआती सदस्यता ली। 1972 में, उन्हें सीपीएम की राज्य समिति के सदस्य के रूप में चुना गया। पहली बार 1977 में वे विधानसभा चुनाव में उतरे और उनकी जीत का सिलसिला 2011 के विधानसभा चुनाव तक जारी रहा। उन्होंने राज्य में विभिन्न कार्यालय संभाले हैं। सूचना संस्कृति विभाग से लेकर पर्यटन, शहरी विकास तक - कभी पूर्ण मंत्री तो कभी अस्थायी तौर पर विभाग संभाला।
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...और 2000 में बने बंगाल के मुख्यमंत्री
1996 के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य गृह मंत्री रहे। 1999 में वह उप मुख्यमंत्री बने। ज्योति बोस के रिटायर होने के बाद 2000 में बुद्धबाबू मुख्यमंत्री बने। वह 34 साल के वामपंथी शासन के अंत में 10 साल तक बंगाल के मुख्यमंत्री रहे।

10 वर्षों में बने ‘ब्रांड बुद्ध
बुद्ध बाबू सफेद धोती-पंजाबी उनकी पहचान थी। बाईं ओर कंघी किए हुए बाल। वे शब्दों के चयन में हमेशा सावधानी बरतते थे। आवाज का गंभीर स्वर, स्पष्ट उच्चारण के साथ बंगाली बोलना,  ने उन्हें 10 वर्षों में 'ब्रांड बुद्ध' बना दिया। वह अपने जीवन के अंत तक एक ब्रांड बने रहे। राजनीति के साथ-साथ विवाद भी पैदा होते हैं, लेकिन उन्होंने उन्हें दूर धकेल दिया और हमेशा के लिए 'बुद्ध बाबू' बने रहे। यह शायद 'ब्रांड बुद्धा' का करिश्मा है। किसी भी विपक्षी राजनेता ने उन्हें 'बाबू' के अलावा कभी संबोधित नहीं किया, भले ही भाषा के बाणों से उन्हें छलनी करने की कोशिश की गई हो।


दो कमरों के फ्लैट में जीया सादा जीवन
अपने अंतिम दिनों तक दक्षिण कोलकाता के पाम एवेन्यू में दो कमरों के फ्लैट में एक सादा जीवन व्यतीत किया। पिछले कुछ सालों में उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती कराया गया है। बार-बार उन्होंने वह लड़ाई जीती और वापस आये। वह कभी अस्पताल नहीं जाना चाहता थे। गुरुवार को बुद्धदेव भट्टाचार्य अपने घर में अंतिम सांस ली। उनके जाने के साथ ही, वामपंथी राजनीति का एक युग ख़त्म हो गया है।
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