DRDO: भारत के साथ इंजन निर्माण की तकनीक साझा करेगा अमेरिकी जीई, स्वदेशी इंजन बनाने में मिलेगी मदद
परियोजना में देरी के कारण, शुरुआती 113 एलसीए विमान के लिए जीई-404 इंजन और एलसीए मार्क दो के लिए जीई-414 इंजन के लिए राजी होना पड़ा। अधिकारियों के अनुसार, तकनीक के हस्तांतरण का प्रतिशत भविष्य में बढ़ने की उम्मीद है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अमेरिकी जीई इंजन के निर्माण की तकनीक भारत के साथ करने के लिए तैयार है। डीआरडीओ की गैस टरबाइन रिसर्च इस्टैब्लिशमेंट लैब स्वदेशी इंजन के निर्माण में कार्यरत है। एक अधिकारी के अनुसार, प्रयोगशाला भारत में जेट इंजनों के निर्माण के लिए अमेरिकी जीई के साथ सौदे का हिस्सा होगी। इससे देश को विशेषज्ञता हासिल होगी। अधिकारी ने बताया कि अमेरिकी कंपनी इंजन के निर्माण की तकनीक साझा कर रही है, जो लागत के हिसाब से 80 प्रतिशत है। जीटीआरई ने कावेरी इंजन विकसित किया था, जो एलसीए तेजस विमान के वेरिएंट्स को संचालित कर सकता है।
भारत को मिलेगी कई जानकारियां
परियोजना में देरी के कारण, शुरुआती 113 एलसीए विमान के लिए जीई-404 इंजन और एलसीए मार्क दो के लिए जीई-414 इंजन के लिए भारत को राजी होना पड़ा। अधिकारियों के अनुसार, तकनीक के हस्तांतरण का प्रतिशत भविष्य में बढ़ने की उम्मीद है। हस्तांतरण के कारण भारत में पुर्जे बनाए जाएंगे। जीटीआरई क्रिस्टल ब्लेड की कोटिंग और उसके प्रक्रियाओं सहित अन्य जानकारियां प्राप्त होंगी। अधिकारियों के अनुसार, हस्तांतरण अभूतपूर्व है। जीई ने नाटो सहयोगियों को भी इस स्तर की जानकारी साझा नहीं की है।
फ्रांस से बातचीत जारी
भारत के पास उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान के नए संस्करणों के लिए बड़े जेट इंजन भी हैं। इसके लिए हम फ्रांस से लगातार बात कर रहे हैं। हालांकि, अभी तक दोनों देशों की बातचीत की स्थिति स्पष्ट नहीं है।